Thursday, April 14, 2011

वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता

        आज सुबह अखबार के पन्ने पलट रहा था एक खबर पर नजर पड़ी,खबर थी देहव्यापार में लिप्त कोलकाता की दो कालगर्ल्स पुलिस के हत्थे चढ़ी...नई बात या फिर खास समाचार नही था फिर भी लिखने वाले ने खबर में तेज़ तडका डालकर काफी मसालेदार बना दिया था...छत्तीसगढ़ के अमूमन अधिकाँश शहरो में जिस्म के कारोबार को रुपयेवालो ने पोषक तत्व दे रखा है तभी तो देश के बड़े महानगर कहलाने वाले दिल्ली,मुंबई.कोलकाता जैसे राज्यों से गर्म गोस्त की आवक तेजी से बढ़ी है...खबर को पढने के बाद मुझे संसद प्रिया दत्त की पिछले महीनो की वो बाते याद आ गई जिसमे उन्होंने वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देने की वकालत की है...   
                                                                    कांग्रेस की सांसद प्रिया दत्त ने वेश्यावृत्ति को लेकर एक नई बहस छेड़ रखी  है, जाहिर तौर पर उनके विचार को गौर करें तो  विचार बहुत ही संवेदना से उपजा हुआ है। उन्होंने अपने बयान में कहा है कि "मेरा मानना है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता प्रदान कर देनी चाहिए ताकि यौन कर्मियों की आजीविका प्रभावित न हो।" प्रिया के बयान के पहले भी इस तरह की मांगें उठती रही हैं। कई संगठन इसे लेकर बात करते रहे हैं। खासकर पतिता उद्धार सभा ने वेश्याओं को लेकर कई महत्वपूर्ण मांगें उठाई थीं। हमें देखना होगा कि आखिर हम वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहनाकर क्या हासिल करेंगें? क्या भारतीय समाज इसके लिए तैयार है कि वह इस तरह की प्रवृत्ति को सामाजिक रूप से मान्य कर सके। दूसरा विचार यह भी है कि इससे इस पूरे दबे-छिपे चल रहे व्यवसाय में शोषण कम होने के बजाए बढ़ जाएगा। आज भी यहां स्त्रियां कम प्रताड़ित नहीं हैं। सांसद दत्त ने भी अपने बयान में कहा है कि - "वे समाज का हिस्सा हैं, हम उनके अधिकारों को नजरअंदाज नहीं कर सकते। मैंने उन पर एक शोध किया है और पाया है कि वे समाज के सभी वर्गो द्वारा प्रताड़ित होती हैं। वे पुलिस और कभी -कभी मीडिया का भी शिकार बनती हैं।"
सही मायने में स्त्री को आज भी भारतीय समाज में उचित सम्मान प्राप्त नहीं हैं। अनेक मजबूरियों से उपजी पीड़ा भरी कथाएं वेश्याओं के इलाकों में मिलती हैं। हमारे समाज के इसी पाखंड ने इस समस्या को बढ़ावा दिया है। हम इन इलाकों में हो रही घटनाओं से परेशान हैं। एक पूरा का पूरा शोषण का चक्र और तंत्र यहां सक्रिय दिखता है। वेश्यावृत्ति के कई रूप हैं जहां कई तरीके से स्त्रियों को इस अँधकार में धकेला जाता है। आदिवासी इलाकों से लड़कियों को लाकर मंडी में उतारने की घटनाएं हों, या बंगाल और पूर्वोत्तर की स्त्रियों की दारूण कथाएं ,सब कंपा देने वाली हैं। किंतु सारा कुछ हो रहा है और हमारी सरकारें और समाज सब कुछ देख रहा है। समाज जीवन में जिस तरह की स्थितियां है उसमें औरतों का व्यापार बहुत जधन्य और निकृष्ट कर्म होने के बावजूद रोका नहीं जा सकता। गरीबी इसका एक कारण है, दूसरा कारण है पुरूष मानसिकता। जिसके चलते स्त्री को बाजार में उतरना या उतारना एक मजबूरी और फैशन दोनों बन रहा है। क्या ही अच्छा होता कि स्त्री को हम एक मनुष्य की तरह अपनी शर्तों पर जीने का अधिकार दे पाते। समाज में ऐसी स्थितियां बना पाते कि एक औरत को अपनी अस्मत का सौदा न करना पड़े। किंतु हुआ इसका उलटा। इन सालों में बाजार की हवा ने औरत को एक माल में तब्दील कर दिया है। मीडिया माध्यम इस हवा को तूफान में बदलने का काम कर रहे हैं। औरत की देह को अनावृत्त करना एक फैशन में बदल रहा है। औरत की देह इस समय मीडिया का सबसे लोकप्रिय विमर्श है। सेक्स और मीडिया के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है । फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चेनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों पर पसरा पड़ा है। प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए ‘प्लेबाय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था, अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है। अखबारों में ग्लैमर वर्ल्र्ड के कॉलम ही नहीं, खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का कैटवाग खासी जगह घेर रहा है। वह पूरा हल्लाबोल 24 घंटे के चैनलों के कोलाहल और सुबह के अखबारों के माध्यम से दैनिक होकर जिंदगी में एक खास जगह बना चुका है। शायद इसीलिए इंटरनेट के माध्यम से चलने वाला ग्लोबल सेक्स बाजार करीब 60 अरब डॉलर तक जा पहुंचा है। 

                                                                     मोबाइल के नए प्रयोगों ने इस कारोबार को शक्ति दी है। एक आंकड़े के मुताबिक मोबाइल पर अश्लीलता का कारोबार भी पांच सालों में 5अरब डॉलर तक जा पहुंचेगा ।बाजार के केंद्र में भारतीय स्त्री है और उद्देश्य उसकी शुचिता का उपहरण । सेक्स सांस्कृतिक विनिमय की पहली सीढ़ी है। शायद इसीलिए जब कोई भी हमलावर किसी भी जातीय अस्मिता पर हमला बोलता है तो निशाने पर सबसे पहले उसकी औरतें होती हैं । यह बाजारवाद अब भारतीय अस्मिता के अपहरण में लगा है-निशाना भारतीय औरतें हैं। ऐसे बाजार में वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहनाने से जो खतरे सामने हैं, उससे यह एक उद्योग बन जाएगा। आज कोठेवालियां पैसे बना रही हैं तो कल बड़े उद्योगपति इस क्षेत्र में उतरेगें। युवा पीढ़ी पैसे की ललक में आज भी गलत कामों की ओर बढ़ रही है, कानूनी जामा होने से ये हवा एक आँधी में बदल जाएगी। इससे हर शहर में ऐसे खतरे आ पहुंचेंगें। जिन शहरों में ये काम चोरी-छिपे हो रहा है, वह सार्वजनिक रूप से होने लगेगा। ऐसी कालोनियां बस जाएंगी और ऐसे इलाके बन जाएंगें। संभव है कि इसमें विदेशी निवेश और माफिया का पैसा भी लगे। हम इतने खतरों को उठाने के लिए तैयार नहीं हैं। विषय बहुत संवेदनशील है, हमें सोचना होगा कि हम वेश्यावृत्ति के समापन के लिए काम करें या इसे एक कानूनी संस्था में बदल दें। हमें समाज में बदलाव की शक्तियों का साथ देना चाहिए ताकि एक औरत के मनुष्य के रूप में जिंदा रहने की स्थितियां बहाल हो सकें। हमें स्त्री के देह की गरिमा का ख्याल रखना चाहिए, उसकी किसी भी तरह की खरीद-बिक्री को प्रोत्साहित करने के बजाए, उसे रोकने का काम करना चाहिए। प्रिया दत्त ने भले ही बहुत संवेदना से यह बात कही हो, पर यह मामले का अतिसरलीकृत समाधान है। वे इसके पीछे छिपी भयावहता को पहचान नहीं पा रही हैं। हमें स्त्री की गरिमा की बात करनी चाहिए- उसे बाजार में उतारने की नहीं.... 

Wednesday, April 13, 2011

उम्मीदों की मौत

देश-दुनिया में हादसे और उनमे होने वाली मौतों की खबर हर किसी के लिए आम खबर की तरह होती है,लेकिन वो लोग,वो परिवार टूटकर बिखर कर जाते है जिनके यहाँ हादसे मौत की शक्ल लिए पहुँचते है...एक तरफ हम अपनी तरक्की के पन्नो को पलटते नही थक रहे वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इंसानियत के चेहरों की कई तस्वीरे पेश कर जाती है...पत्रकारिता के पेशे से हूँ इसलिए थोड़ी बहुत जानकारियों को अपने दिमाग में डाले रखता हूँ,न जाने कौन सी जानकारी कहाँ काम आ जाये..? जानकारी का ही नतीजा रहा की मंगलवार की सुबह जब मैंने देश-दुनिया से बाखबर होने के लिए टी.वी.ऑन किया तो लाल पट्टी पर सफ़ेद रंग से लिखी ब्रेकिंग न्यूज चल रही थी...लिखा था चार दिनों से घर में बंद भिलाई में रहने वाले एक परिवार के पांच सदस्यों ने जहर खा लिया है...खबर सुबह ६ बजे सुबह की थी,सभी की हालत गंभीर बनी हुई है...करीब डेढ़ घंटे बाद जो खबर आई वो इंसानियत की हार का प्रमाण दे गई...परिवार के ४ लोग मौत के गाल में समा चुके थे और जिसे जिन्दा बचाने की कोशिशे की जा रही थी उसका सब कुछ लुट चुका था...बिस्तर पर बदहवास वो शख्स इस बात से बाखबर था की उसकी माँ और तीन बहने दुनिया से रुखसत हो चुकी है...लोगो के लिए जो महज एक खबर थी वो एक परिवार को ख़त्म कर चुकी है....
                                                     मंगलवार को जब उम्मीदों की मौत हुई तो सरकार,भिलाई इस्पात सयंत्र समेत विपक्षियो की आँखों में भिन-भीना रहा कीचड़ बहकर मुह के पास आ गया...सब बोलने लगे...सरकार ने जांच के आदेश जारी कर दिए,बी.एस.पी.प्रबंधन ने अमानवीय चमड़ी को बचाने का बहाना खोज लिया वहीँ कांग्रेसियों को मौत पर राजनीती करने का घर बैठे एक मुद्दा मिल गया....उम्मीद की मौत ने एक परिवार के चार सदस्यों को साथी बना लिया...मै मानता हूँ की हार चुकी इंसानियत के पास अब पाना तो दूर खोने के लिए भी कुछ नही बचा...कहते है परिवार का पांचवा और इकलौता सदस्य सुनील ठीक है...शायद ऊपर वाले को रहम आ गया होगा...सुनील ने अपनी माँ,तीन बहनों की चिता को आग दी...शायद किस्मत में यही लिखा था....
                                                      मै आज जिस न भूलने वाली घटना के बारे में लिख रहा हूँ वो कुछ इस तरह की है...भिलाई के सेक्टर-४,स्ट्रीट-३४,आवास क्रमांक-८-ऐ में रहने वाले सुनील साहू ने २ मांगो को लेकर ८ अप्रैल से माँ मोहिनी देवी,बहन शीला,शोभा और रेखा समेत खुद को घर में कैद कर लिया था...सुनील का कहना था भिलाई इस्पात सयंत्र में कार्यरत उसके पिता ने ख़ुदकुशी नही की थी बल्कि उनकी हत्या कर लाश फेंक दी गई थी...पिता की मौत के बाद अनुकम्पा नियुक्ति और उस घर को खाली नही करवाए जाने की गुहार लगाते लम्बा वक्त बीत गया था...यक़ीनन १७ साल का इन्तेजार कम नही होता...सरकार से लेकर इस्पात सयंत्र के तकरीबन हर जिम्मेदार अफसर से गुहार लगा चूका सुनील जब परिवार समेत घर में बंधक बन बैठा तो सबने उसे गीदड़ भभकी समझा...लोगो को उम्मीद ही नही थी की एक परिवार मौत को गले लगा लेगा...करीब १७ बरस का इन्तेजार जब ख़त्म हुआ तो मौत से रिश्ता बनाना बेहतर समझा बजाय इसके की उम्मीद में ना जाने और कितने बरस बीत जाये....देश में इस्पात नगरी के रूप में जाना-जाने वाला भिलाई इस्पात सयंत्र इतना बेरहम होगा किसी को नही पता था...? इस घटना से अब लोग यकीन कर लेंगे,मै ऐसा मानता हूँ....
                                                               अब मरने  वाले परिवार के बचे  सदस्य को लोग धाडस बंधा रहे है...कुछ लोग भीड़ लगाकर साथ  होने का यकीन दिला रहे है, तो कुछ ने बीएसपी के खिलाफ  झंडा उठा लिया है...मै सोचता हूँ अब कोई किसी भी ढंग से मानवीयता का परिचय देने की कोशिश करे परिवार के बगीचे का माली और फूल अब नही लौटा सकता....

Saturday, April 9, 2011

आजादी की दूसरी जंग जीत गए


 आज मै बहुत खुश हूँ,मै ही क्यों पूरा देश आज ख़ुशी मना रहा है...हम सब सोच रहे है आजादी की दूसरी जंग जीत गए है...अंग्रेजो से गाँधी ने छुटकारा दिलाया,भ्रष्टाचार से अन्ना ने जीत दिला दी...उम्मीद की किरण तो शुक्रवार की रात को ही निकल गई थी पर रौशनी आज सुबह नजर आई जब अन्ना ने सरकार से जीत मिलने के बाद अनशन ख़त्म करने का एलान कर दिया..
                     खबर ये है की जनलोकपाल विधेयक को लेकर सरकार और अन्ना हज़ारे के बीच शुक्रवार की रात को हुए समझौते के बाद अन्ना हज़ारे ने शनिवार की सुबह अपना आमरण अनशन तोड़ दिया... अन्ना ने पहले उन लोगों का अनशन तुड़वाया जिन्होंने उनके साथ व्रत रखा था और उसके बाद अपना अनशन तोड़ा...अन्ना ने एक छोटी बच्चों के हाथों पानी पीकर अपना अनशन तोड़ा. लोगों को संबोधित करते हुए अन्ना ने कहा, "ये मेरी नहीं आप सबकी जीत है.इस आंदोलन में युवा शक्ति का शामिल होना उम्मीद की किरण है. अब हमारी ज़िम्मेदारी बढ़ गई, हमें लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करना है ये पहली चुनौती है. दूसरा संघर्ष है मसौदा बनने के बाद मंत्रिमंडल इसे मंज़ूर करे. तीसरा संघर्ष है लोक सभा में मंज़ूर करवाना. सत्ता का विकेंद्रीकरण की माँग हमारा एक और लक्ष्य है.".अन्ना ने शुक्रवार रात को घोषणा की थी कि वे शनिवार सुबह अपना अनशन समाप्त कर देंगे. हालांकि उनका कहना था कि सरकार के आदेश की कॉपी देखने के बाद ही वे ऐसा करेंगे. अनशन तोड़ने की ख़बर के मिलते ही जंतर-मंतर में जमा लोगों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई....इस अवसर पर स्वामी अग्निवेश ने कहा, "लोगों ने एकजुटता का परिचय दिया है. इस जीत का सारा श्रेय लोगों को जाता है. लेकिन लड़ाई ख़त्म नहीं हुई है बल्कि शुरु हुई है. सरकारी अधिसूचना तो कागज़ का टुकड़ा है इसमें अपने संघर्ष से जान डालनी पड़ेगी."
                     समझौते के अनुसार नए लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने के लिए सरकार 10 सदस्यीय संयुक्त समिति बनाएगी. इसमें पांच लोग नागरिक समाज के प्रतिनिधि होंगे और पांच लोग सरकार की तरफ़ से होंगे. चेयरमैन का पद सरकार के पास रहेगा तो वाइस चेयरमैन नागरिक समाज का होगा....सरकार की तरफ़ से प्रणब मुखर्जी, मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल, क़ानून मंत्री वीरप्पा मोईली, गृह मंत्री पी चिदंबरम और जल संसाधन मंत्री सलमान ख़ुर्शीद शामिल हैं.....आंदोलनकारियों की तरफ़ से ख़ुद अन्ना हज़ारे के अलावा अरविंद केजरीवाल, कर्नाटक के लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और पूर्व केंद्रीय क़ानून मंत्री शांति भूषण शामिल होंगे.शांति भूषण संयुक्त समिति के सह अध्यक्ष भी होगें...जल्द है संयुक्त समिति की बैठक होगी और उम्मीद है कि सरकार संसद के मॉनसून सत्र में इस बिल को संसद में पेश करेगी. 

इस समझौते में सरकार की ओर से सबसे अहम भूमिका निभाने वाले केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ये भारत के लोकतंत्र की ताक़त को दर्शाता है...सिब्बल ने कहा, '' मुद्दा ये नहीं है कि किसकी जीत और किसकी हार हुई है. इससे पता चलता है कि भ्रष्टाचार की लड़ाई में पूरा देश एक साथ हैं''...उन्होंने बताया कि कोशिश होगी कि 30 जून तक मसौदा तैयार करने का काम ख़त्म कर लिया जाएगा...इस अभियान में अन्ना के क़रीबी सहयोगी रहे पूर्व केंद्रीय क़ानून मंत्री और शांति भूषण ने कहा कि लोकतंत्र में कितनी शक्ति होती है ये अन्ना हज़ारे और उनके समर्थकों ने साबित कर दिया है....उन्होंने कहा,''77 के बाद से ये पहली इतनी बड़ी जीत है. अगर जनता अपनी शक्ति पहचान ले और शांतिपूर्ण तरीक़े से अपनी बात रखे तो सरकार को झुकना ही पड़ेगा."
                   इस पूरे मामले ने ये तो साफ़ कर दिया है की भ्रष्टाचार अब बर्दाश्त नही किया जायेगा...जनता इस मसले पर एकजुट हुई तो सरकार के पसीने छूट गए..सरकार को लगा वक्त रहते अन्ना की मांगे नही मानी गई तो जंतर-मंतर कही तहरीर चौक में न तब्दील हो जाये..."तहरीर" मतलब परिवर्तन की आंधी आये इससे पहले सरकार जन-लोकपाल विधेयक लागू करने पर राजी हो गई...लोकतन्त्र ने शनिवार को आजादी की दूसरी लड़ाई जीत लेने का जगह-जगह जश्न मनाया...पूरा देश तन्त्र"सरकार"की हार से जितना खुश नही था उससे कहीं ज्यादा ख़ुशी भविष्य के सुनहरे सपने को लेकर था..

Friday, April 8, 2011

उम्मीदें जाग गई हैं...

उम्मीदें जाग गई हैं...सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या हमारे यहाँ भी तहरीर चौक होगा?माहौल पूरा है. थोड़ा दिल्ली के जंतर मंतर पर, थोड़ा इधर-उधर के शहरों में और सबसे ज़्यादा टेलीविज़न के स्क्रीनों पर... अख़बारों ने भी माहौल बनाने की पूरी कोशिश की है,लेकिन जनता अभी थोड़ी दूर से देख रही है... सोच रही है कि शायद हमारे यहाँ भी तहरीर चौक हो जाएगा...जो लोग अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन के समर्थन में निकल रहे हैं उनकी संख्या अभी हज़ारों में पहुँची है....हमारी आबादी के नए आंकड़े अभी-अभी आए हैं. एक अरब 21 करोड़ यानी लगभग सवा अरब... इस सवा अरब लोगों में से अभी कुछ हज़ार लोग जंतर मंतर या इंडिया गेट पर इकट्ठे हो रहे हैं...वह कहावत चरितार्थ होती दिख रही है, देश में भगत सिंह और गांधी पैदा तो हों, लेकिन पड़ोसी के घर में...मिस्र की आबादी से तुलना करके देखें, वहाँ की कुल आबादी है आठ करोड़ से भी कम. यानी आंध्र प्रदेश की आबादी से भी कम,लेकिन वहाँ तहरीर चौक पर एकबारगी लाखों-लाखों लोग इकट्ठे होते रहे. उन्हें वहाँ इकट्ठा करने के लिए किसी नेता की ज़रुरत नहीं पड़ी...वे ख़ुद वहाँ आए क्योंकि उन्हें लगा क्योंकि परिवर्तन उनकी अपनी ज़रुरत है...भारत की जनता के लिए अन्ना हज़ारे को आमरण अनशन पर बैठना पड़ा है,फिर भी इकट्ठे हो रहे हैं कुछ हजार लोग... जिस देश में अधिसंख्य जनता सहमत है कि देश में भ्रष्टाचार असहनीय सीमा तक जा पहुँचा है...सब कह रहे हैं कि नौकरशाहों से लेकर राजनेता तक और यहाँ तक न्यायाधीश तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. हर कोई हामी भर रहा है कि इन राजनेताओं को देश की चिंता नहीं...भ्रष्टाचार के आंकड़ों में अब इतने शून्य लगने लगे हैं कि उतनी राशि का सपना भी इस देश के आम व्यक्ति को नहीं आता....इस देश में जनता इंतज़ार कर रही है कि इससे निपटने की पहल कोई और करेगा...ख़ुद अन्ना हज़ारे कह रहे हैं कि जितना भी समर्थन मिल रहा है, उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी. वह तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को भी नहीं थी और न विपक्षी दलों को...लेकिन जितने भी लोग निकल आए हैं उसने लोगों को जयप्रकाश नारायण से लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह की याद दिला दी है...लोग तहरीर चौक को याद कर रहे हैं, बिना ये समझे कि वहाँ परिस्थितियाँ दूसरी थीं...लेकिन वे मानने लगे हैं कि तहरीर चौक यानी परिवर्तन...अन्ना हज़ारे ने एक लहर ज़रुर पैदा की है. लेकिन अभी लोग उन लहरों पर अपनी नावें निकालने को तैयार नहीं हैं...भारत का उच्च वर्ग तो वैसे भी घर से नहीं निकलता. ज़्यादातर वह वोट भी नहीं देता. ग़रीब तबका इतना ग़रीब है कि वह अपनी रोज़ी रोटी का जुगाड़ एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ सकता...बचा मध्य वर्ग. भारत का सबसे बड़ा वर्ग. और वह धीरे-धीरे इतना तटस्थ हो गया है कि डर लगने लगा है...सरकार के रवैये से दिख रहा है कि वह देर-सबेर, थोड़ा जोड़-घटाकर लोकपाल विधेयक तैयार करने में अन्ना हज़ारे एंड कंपनी की भूमिका स्वीकार कर लेगी...उस दिन अन्ना हज़ारे का अनशन ख़त्म हो जाएगा. अन्ना हज़ारे रालेगणसिद्धि लौट जाएँगे. पता नहीं इन सवा अरब बेचारों का क्या होगा..?

सरकारी लोकपाल और जनता का लोकपाल...

राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं, लेकिन इस देश में लोकपाल के लिए 42 साल से इंतजार चल रहा है। किसी भी कौम के जीवनकाल में 42 साल एक लंबा वक्त होता है। जिस कानून को आजादी के वक्त ही अस्तित्व में आ जाना चाहिए था, उसको लेकर वर्ष 1969 से लगातार लुका-छिपी का खेल चल रहा है। अब जाकर उसके लिए ठोस हलचल हुई है।
स्वतंत्र भारत में पहली बार किसी कानून के लिए इतना बड़ा जन समुदाय उठ खड़ा हुआ है। अब बहस इस बात पर नहीं हो रही है कि लोकपाल कब स्थापित हो। अब तो केवल यह तय करना बाकी है कि लोकपाल कैसा हो। वह सरकारी विधेयक में प्रस्तावित एक कमजोर संस्था हो या फिर जन लोकपाल विधेयक द्वारा प्रस्तावित एक सर्वशक्तिमान निकाय हो।
ऊंचे पदों पर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासनिक सुधार आयोग की ओर से वर्ष 1967 में लोकपाल की स्थापना का सुझाव आया था। 1969 में उसे लोकसभा ने पारित भी कर दिया, लेकिन उसके बाद से अब तक वह मृग मरीचिका ही साबित हुआ। इस दौरान छोटी-बड़ी कुल चौदह कोशिशें की गयीं। आठ बार सरकारी विधेयक के रूप में और छह बार गैर सरकारी विधेयक के रूप में इसे स्थापित करने की कोशिश की गयी, लेकिन किसी न किसी बहाने उसमें रोड़ा अटकाया जाता रहा है।
शुरू में प्रधानमंत्री को इसके दायरे में रखे जाने को लेकर मतभेद थे, किंतु ऊंचे पदों पर आसीन लोगों से जुड़े भ्रष्टाचार के प्रकरण इस प्रकार उजागर हो चुके हैं और उनका आभामंडल इतना क्षीण हो चुका है कि सार्वजनिक जीवन का कोई भी पदधारक अब अपने को जांच के दायरे से अलग रखने की सिफारिश करने का साहस नहीं कर सकता।
लोकपाल की स्थापना के लिए मशहूर समाजसेवी व गांधीवादी नेता अन्ना हजारे की मौजूदा पहल ऐसे समय पर हुई है, जब देश की जनता भ्रष्टाचार से आजिज आ चुकी है। मामला केवल कॉमनवेल्थ खेलों या टूजी स्पेक्ट्रम घोटालों तक ही सीमित नहीं है। जहां कहीं भी पाखंड का सुरक्षा कवच थोड़ा-सा दरकता है, उसके नीचे भ्रष्टाचार का काला समंदर नजर आने लगता है। अदालतों से जुड़े भ्रष्टाचार के प्रकरणों के उजागर होने के बाद अब जनता के धैर्य का बांध टूटने लगा है।
अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य ने भी इस मुहिम को मजबूती दी है। मिस्र जैसे देशों में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मुबारक सरकार को कुछ समय पहले ही गद्दी छोड़नी पड़ी है। ऐसे समय में लोकपाल पर होने वाली बहस कई मामलों में बिल्कुल अलग है। अब यह बहस सिर्फ कानून बनाने तक नहीं सीमित है, बल्कि उस कानून के स्वरूप को लेकर है। लोग सरकारी विधेयक को नाकाफी मानकर उसका विरोध कर रहे हैं। उसकी जगह जन लोकपाल विधेयक का एक वैकल्पिक प्रारूप तैयार किया गया है।
सरकारी विधेयक का अधिकार क्षेत्र केवल राजनेताओं तक सीमित है। सरकारी अधिकारियों के लिए सतर्कता आयुक्त जैसी संस्थाएं हैं, जो अब तक निष्प्रभावी साबित हुई हैं। न्यायपालिका के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए कोई संस्था नहीं है। जनता के लिए राजनेता के भ्रष्टाचार, सरकारी कारकूनों की रिश्वतखोरी और न्यायाधीशों की बेईमानी में कोई अंतर नहीं है। इस पृष्ठभूमि में जन लोकपाल विधेयक के उपबंध सरकारी विधेयक की तुलना में ज्यादा प्रभावी और प्रासंगिक हैं।
लोकपाल की गठन प्रक्रिया और उसके काम करने के तरीके के मामले में सरकारी और जन लोकपाल विधेयक में बहुत बड़ा फर्क है। अब तक के सभी विधेयकों में लोकपाल के लिए जरूरी था कि वह सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश रह चुका व्यक्ति हो। उसकी नियुक्ति की प्रक्रिया भी संतोषजनक नहीं थी। उसकी नियुक्ति कुछ मंत्रियों, दोनों सदनों के अध्यक्षों और नेता प्रतिपक्ष की एक समिति की अनुशंसा पर की जानी थी।
लोकपाल के चयन को केवल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों तक सीमित कर देने के कई नुकसान हैं। इससे उस पद के लिए उपयुक्त व्यक्ति की तलाश का दायरा बहुत सीमित हो जाता है। लोकपाल जैसे पदधारक के लिए सत्यनिष्ठा का गुण सबसे अहम हैं। सत्यनिष्ठ व्यक्तियों के मामले में न्यायपालिका या किसी भी एक संस्था का एकाधिकार नहीं हो सकता, इसलिए उसके लिए योग्य पात्र की तलाश करते समय पूरे समाज के अच्छे लोगों को मौका मिलना चाहिए।
लोकपाल का काम मुख्य रूप से आरोपों की जांच करना होगा, इस काम में न्यायिक अनुभव से कोई खास मदद नहीं मिलती। इसलिए जन लोकपाल विधेयक के वे उपबंध स्वागत योग्य हैं, जिनमें लोकपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की बात की गयी है और समाज में अच्छी साख रखने वाले किसी व्यक्ति को उस पद का पात्र माना गया है।
दरअसल लोकपाल की मौजूदा मुहिम सरकारी नाकामी के खिलाफ एक जन प्रतिक्रिया है। लोग सरकारी हीला-हवाली से ऊब चुके हैं। जनता अब ऊंचे पदों पर बैठे लोगों की पैंतरेबाजी से भी धीरे-धीरे वाकिफ होती जा रही है। जन विधयेक के माध्यम से ऐसी संस्था की परिकल्पना की गयी है, जो एक स्वतंत्र तथा अलग निकाय हो। उसके पास जांच करने का व्यापक अधिकार हो और अपनी मर्जी से भ्रष्टाचार की जांच वाले प्रकरण चुनने का अधिकार हो। उसका अपना पूर्णकालिक स्टाफ हो, उसकी जांच के निष्कर्ष और उसकी संस्तुति सरकार पर बाध्यकारी हो।
यदि लोकपाल भ्रष्टाचार के आरोपों को सही पाता है, तो दोषी व्यक्ति को बरखास्त कर दिया जाए। इसके अलावा व्हिसल ब्लोअर यानी भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंतरिक रूप से शंखनाद करने वाले लोगों को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी भी लोकपाल की ही हो।
अन्ना हजारे की मौजूदा मुहिम को मिल रहे जन समर्थन से एक बात साफ हो गयी है कि जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त हो चुकी है। सरकार की नीयत पर उसका भरोसा नहीं रहा। अन्ना हजारे जैसे लोगों के बेदाग लोकजीवन से उसे उनकी बातों पर भरोसा है, लेकिन यदि जनता यह सोचती है कि लोकपाल के पद पर बैठ जाने मात्र से ही कोई व्यक्ति ऐसा देवतुल्य हो जाएगा कि वह कभी कोई गलती नहीं करेगा, तो वह कहीं न कहीं गलती कर रही है। इस पर ठंडे दिमाग से विचार करने की जरूरत है। व्यावहारिक धरातल पर हर संभावना का आकलन करने की आवश्यकता है, ताकि दोषों को कम किया जा सके।