Saturday, April 7, 2012

आदिशक्ति माँ महिषासुर मर्दिनी का दरबार...


आदमी मुसाफिर है,सफ़र दर सफ़र इंसान अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा है....इंसान का सफ़र किसी यात्रा से कम भी नही है ! हर कदम पर कोई नई बात,नई चाह,नई कवायद सफ़र की दूरी का एहसास नही होने देती ! हर इंसान के रास्ते अलग है,मंजिल जुदा है मगर कर्मो का लेखा-जोखा यहीं चुकाकर जाना है ! इस हकीकत से वाकिफ इंसान फिर भी गलत रास्तो को अपनी मंजिल बना लेता है,जिस राह के आखिरी मुकाम का हासिल कुछ भी नही उस राह पर ना जाने क्यूँ लोग दौड़ लगा रहे है ! हमारी मंजिल तय है,रास्ते का पता है तभी तो हम आपको यात्रा के जरिये हर बार एक ऍसी मंजिल पर लिए जाते है जहां की खुबसूरत वादियाँ भटके मन को ठहराव देती है ! एक एसा मुकाम हर बार आपके सामने होता है जिसके दीदार मात्र से जीवन के कष्टों में कमी जाती है ! छत्तीसगढ़ का कोरबा जिला कुछ ऍसी ही धरोहरों को अपने भीतर समेटे हुए है जिनका इतिहास सदियों पुराना है ! आज यात्रा की इस कड़ी में जिस मुकाम पर हम आपको ले जा रहे है वो एतिहासिक रूप के अलावा धार्मिक मान्यताओ का सदियों पुराना गढ़ है ! कोरबा से कटघोरा,पाली होकर एक रास्ता चैतुरगढ़ की ओर जाता है ! आज हम वहीँ के लिए निकले है ! कोरबा से करीब -करीब ८५ किलोमीटर दूर जिस चैतुरगढ़ का जिक्र मै कर रहा हूँ वो कभी लाफागढ़ की जमीदारी में शामिल था ! छत्तीस गढ़ों को अपने में समाहित रखने की वजह से इस सूबे को छत्तीसगढ़ के नाम ने जाना गया ! कहते है राज्य में लाफागढ़ रियासत का इतिहास बेहद सम्रिध्शाली रहा है ! आज भी लाफा इलाके से खुदाई के दौरान प्राचीन मूर्तियों के अलावा ऐसे कई प्रमाण मिलते है जो इतिहास के पन्नो को पलटने पर मजबूर कर जाते है
                      ऊँची-नीची पहाड़ियों के बीच से काटकर बनाई गई राह उस शिखर पर ले जाती है जहां आदिशक्ति माँ महिषासुर मर्दिनी का दरबार है ! कोरबा से करीब ढाई घंटे का सफ़र तय कर हमारी टीम चैतुरगढ़ पहुंची,हम अभी अपनी मंजिल से अभी तीन हजार सात सौ मीटर नीचे है ! गर्मी बहुत है और ऊंचाई काफी ! वक्त की कमी हमें सीधे माँ के दरबार की ओर कदम बढ़ाने को कह रही है ! करीब डेढ़ दशक पहले मै कुछ साथियों के साथ आया था तो ये राह पथरीली थी,अब विकास की गिट्टी,रेत और सीमेंट की परत कदमो को लड़खड़ाने का मौका नही देती ! हम चल पड़े है आदिशक्ति माँ महिषासुर मर्दिनी के दीदार को ! माँ ने बुलाया है इस कारण ये राह भी आसान है और ऊंचाई कुछ भी नही
                      माता के जयकारे लगते हम कई हजार मीटर ऊंचाई पर पहुँच गए है,कई बार शार्ट-कट भी लिया ताकि घुमावदार रस्ते की दूरी कम हो जाए ! मै और मेरी टीम के साथी भी इसी राह पर खतरे से खेलते ऊपर चढ़ गए,सबकी साँसें फुल गई है ! कभी पानी तो कभी एक दुसरे की हांफती सूरत ऊंचाई का एहसास कम करवाती रही ! ४५ मिनट के बाद हम माँ के दरबार के सामने थे ! पहाड़ पर बैठी माता के भव्य रूप  को सामने से देखते ही एक अजीब सा सकून,शांति का अहसास हुआ ! मैंने जगत जननी के दर पर शीश नवाकर कुछ मांग लिया ! इंसानी फितरत है जहां बिन मांगे सब मिल जाता है वहां भी मुह खोले बिना चैन नही आता,सो मैंने भी सुख,शांति,वैभव का आशीष मांग लियाआदिशक्ति माँ महिषासुर मर्दिनी का मन्दिर हजारो साल पुराना है !मन्दिर के गर्भ गृह में आदिशक्ति माँ महिषासुर मर्दिनी की मूरत है ! कहते है इस मूरत के बारह हाथ है,चूँकि गर्भ गृह में प्रवेश वर्जित है इस कारण हमें भीतर तक नही जाने दिया गया
         साल भर माता के दर पर मुरादो की चिठियाँ आती है,भक्तो के कदमताल से ऊँची पहाड़ी गूंजती रहती है ! हर कोई इस दर पर झोलिय फैलाये आता है और मन की मुरादे लिए ख़ुशी-ख़ुशी लौटता है ! इस दर पर मांगी गई हर मुराद पूरी होगी इस बात की आस्था आज भी लोगो के जहन में है ! साल के बारहों महीने भक्त आत है,नवरात्री में मेला लगता है ! जिसपर आदिशक्ति माँ महिषासुर मर्दिनी की कृपा हो गई वो हजारो मीटर ऊपर  तक दौड़े चला आता है ! मन्दिर के बाहर ११ वीं शताब्दी की कुछ मुर्तिया रखी हुई है जो आने आलो को इतिहास के मायने और उसके गौरव को बताने के लिए काफी है
यहाँ   एक किला हुआ करता था जिसे ११ वीं शताब्दी में कलचुरी शासक पृथ्वी देव प्रथम ने बनवाया था ! चारो ओर अब किले के अवशेष मात्र देखने को मिलते है ! यहाँ के किले में प्रवेश करने के लिए तीन मुख्य द्वार बनाये गये थे ! मेनका,हुन्करा और सिंहद्वार के अवशेष आज भी देखने को मिलते है ! जीर्ण-शीर्ण हाल में दिखाई पड़ते इन मुख्या प्रवेश द्वारों में से हुन्करा द्वार पर लगी एक देवी प्रतिमा पर आज भी कलचुरी शासक जाजल्वदेव का नाम खुदा हुआ है ! इतिहास को जानकार लाफागढ़ रियासत के वैभव का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है ! बात-बात में मै ये भूल ही रहा हूँ की अभी दो किलोमीटर दूर जंगल के रास्ते पैदल ही शंकर गुफा जाना है ! सूर्य देवता ढलने को है वक्त दूर तक जाने की गवाही नही देता मगर साथियों की हिम्मत और दृढ इच्छा मुझे आगे बढ़ने को कह गई !  आदिशक्ति माँ महिषासुर मर्दिनी के दर पर फिर एक बार मत्था टेक मै अपनी टीम के साथ शंकर गुफा की ओर बढ़ चला,जंगल के रास्ते से हम सब वाकिफ नही थे ! जिस राह पर कदमो के निशा मिलते गए हम उसी राह पर कभी धीरे तो कभी ढलते सूरज को देख दौड़ लगाने लगे !वक्त की कमी और शाम की धुंधलाहट कई बार जंगली जानवरों की आमदरफ्त का एहसास करा रही थी ! पर हम सबके साथ आदिशक्ति माँ महिषासुर मर्दिनी थी ! पथरीले रास्ते,उबड़-खाबड़ पहाडियों के रास्ते हम शंकर गुफा की ओर तेजी से बढ़ रहे थे ! एक बार फिर हजारो मीटर पहाड़ उतरना है,सब हांफ रहे है मगर त्रिकाल के दर्शन भी जरूरी है ! रुकते,हाँफते हम करीब ५० मिनट बाद शंकर गुफा के सामने थे, हजारो साल पुरानी ये गुफा इतिहास को अपने भीतर समेटे बैठी है ! इस विशाल चट्टान पर कई शिलालेख आज भी कल्चुरिकालीन गौरव को बताते है
                 यहीं पर एक छोटी सी गुफा है जिसके भीतर महादेव का वास है ! साल भर यहाँ ज्योति का प्रकाश पुंज आस्थावानों को पुकारता है ! हमने भीतर जाकर कैलाश के दर्शन किये ! हम भीतर गए तो कुछ चमगादड़ो की नींद में खलल पद गया वो निकलकर दूसरी ओर गए ! कैलाश की पूजा रोज होती है,ठीक बगल में एक और गुफा है जहां महिषासुर का वध किया गया था,यहाँ भी पूजा की जाती है ! यहाँ कभी पहाड़ियों की ऊँची चोटियों से बहकर पानी आया करता था जो इस जगह पर झरने की शक्ल में नजर आता था मगर प्रकृति के साथ खिलवाड़ का नतीजा ये हुआ की अब वो प्राक्रतिक झरना बहना बंद हो गया ! यहाँ सावन में कांवरियों की भीड़ देखते बनती है ! बोल बम के उद्घोष से पूरा इलाका महादेव मय हो जाता है ! यहाँ पुरातत्त्व विभाग ने इतिहास को सहेजने की कोशिशे शुरू जरूर की है मगर धरातल पर उसकी चाल कछुए से ज्यादा नही है ! वक्त काफी हो चला है ,शाम हो गई है अँधेरे ने जंगल के वीरानेपन में दर पैदा करना शुरू कर दिया है फिर हमको अपने कुछ साथियों का भी ख्याल रखना है जिन्हें हम कई तकलीफों के बावजूद ले आये है ! हम अब लौट रहे है मगर इन जंगलो में शेर तेंदुआ भालू जैसे खतरनाक जानवर भी रहते है ! किसी रास्ते मोर नजर जाये या फिर किसी ओर से चीतलो का कोलाहल सुनाई पड़ जाए,ये सब सोचते-सोचते हम हजारो मीटर ऊँची चट्टानी पहाड़ी को चढ़ रहे थे ! रात हो चुकी थी जब हम उस जगह पर पहुंचे जहां से  आदिशक्ति माँ महिषासुर मर्दिनी के दर्शनों को आतुर हम चलना शुरू किये थे !  

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