Sunday, November 28, 2010

"कंगाल निगम" करोडपति इंजीनियर...

राजकिशोर नगर स्थित माणिक का निवास
करोड़ो का असामी इंजिनीयर माणिक 
बैंक सा सील लाकॉर जिससे ४० तोला सोने के जेवरात मिले
 वैसे तो नगर निगम की माली हालत काफी ख़राब है...कर्मचारियों को बाँटने के लिए रूपये नही है...शहर का  विकास भी तभी संभव होगा जब निगम के पास पर्याप्त राशि हो....इन दो लाइनों को पढ़कर आप भी निगम की खस्ताहाल स्थिति का आंकलन कर सकते है..."कंगाल"... जी हाँ...अगर मै ये कहू की नगर निगम कंगाल है और कंगाल निगम का कर्मचारी करोडपति है तो शायद आपको आश्चर्य हो सकता है...पर इस सच को जानकर आप और भी आश्चर्य करेगे की नगर निगम का केवल एक सब इंजीनियर ही करोडो का आसामी है...२५ नवंबर को एंटी करप्शन ब्यूरो की टीम ने सब इंजीनियर चंद्रकांत माणिक के राजकिशोर नगर स्थित आवास पर छापा मारकर करीब  साढ़े तीन  करोड़ की अघोषित संम्पति  का खुलासा किया है...सब इंजीनियर ने शहर में लाखो रूपये कीमत का आलीशान घर बनवाया,लाखो के जेवरात,कई जगह जमीन और ना जाने क्या-क्या....माणिक तो एक छोटा सा प्यादा है...इससे बड़े-बड़े मगरमच्छ है जिन्होंने नगर निगम के खजाने को अपने बाप की बपोती  समझ ली है....जनता के रुपयों से आलीशान  घर,जेवरात और ना जाने क्या-क्या बनवाने वालो की एशोअराम  भरी जिन्दगी वास्तव में देखने लायक होती है....निगम का एक बड़ा वर्ग मेहनत के बदले महीने की पगार पाने कई बार इन्ही की चोखट पर दस्तक देता है...महीने भर मेहनत करने वाले को निगम का खजाना फ़िलहाल खाली होने का बहाना कर लौटा दिया जाता है..  ऐसे कई मामले है जो साबित करते है कि नगर निगम कितनी फकीर हो चली है ? सरकार है की मदद के नाम पर कुछ करती नही,ऐसे सवालो में उलझे लोगो के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा मारते है माणिक जैसे लोग...पिछले छः-सात बरस में निगम कंगाल हो गया,विकास के नाम पर आई रकम ऊपर से लेकर नीचे तक, ओहदे के हिसाब से बाँट ली गई...शहर विकास की पूंजी भ्रष्ट अफसरों के विकास और उनके परिवार के एशोआराम पर खर्च हो गई...शहर गर्दो-गुबार की धुंधली चादर से ढका है,लोग गड्ढो में गिरकर अस्पताल के बिस्तर पर कराह रहे है,गन्दी और जाम पड़ी नालियां संक्रामक बीमारिया परोस रही है और भ्रष्टाचार के पेड़ पर अमरबेल की तरह लिपटे अफसर करोडो के मालिक बने बैठे है....एंटी करप्शन ब्यूरो ने निगम के एक प्यादे के गिरेबान को पकड़ा तो करोडो की चल-अचल संपत्ति बेनकाब हो गई...बिलासपुर नगर निगम में कई ऐसी भ्रष्टाचार की मजबूत शाखे   है जो एक विशाल पेड़ की शक्ल ले चुके है... वैसे कुछ अफसरान मलाई चाटकर प्रदेश की दूसरी जगह नए सिरे से जनता और सरकारी रूपये  अपने खातो में जमा करने की बुनियाद तैयार कर रहे है....
                                  नगरनिगमों में कई माणिक है जिन्हें  सरकार और जनता के खून-पसीने की कमाई  बिना डकार लिए हजम करने  की आदत पड़ चुकी है....जनता विकास की बाट जोह रही है,जोहती रहे...निगम के कर्मचारी मेहनत का वाजिब हक़ लेने भटक रहे है,भटकते रहें...खैर एंटी करप्शन के अधिकारियो ने चद्रकांत माणिक के यहाँ मिले जेवरात,नगद रकम  कोषालय में जमा करवा दिया है...माणिक जैसे भ्रष्ट कई सरकारी अफसरों की वैसे तो सही जगह जेल की चारदिवारी है लेकिन भारत में अब तक  करोड़ो डकारने वाले कितने बेईमान जेल गए अपने आप में बड़ा सवाल है.......

Wednesday, November 24, 2010

विकास की जीत


मैं करीब १२ साल पहले बिहार गया था...रांची में मेरे मामाजी रहते है...उस वक्त रांची बिहार का हिस्सा था...बाद में रांची बिहार से अलग होकर झारखण्ड की राजधानी बन गया...पर मै उस रांची शहर में चार दिनों तक रहा, जहाँ लालू राज था.....पत्रकारिता के मैदान का एकदम नया खिलाडी था,इस वजह से कुछ ज्यादा जानने,समझने की ललक थी....मैंने बिहार के उस रांची शहर को देखा था जहाँ लालू यादव की तूती बोलती थी....थोडा अँधेरा होते ही सड़क पर चलने वालो की जात और नियत बदली-बदली नजर आने लगती थी...सड़क के नाम पर गर्दो गुबार और गड्ढो का जाल बिछा नजर आता था....भय,आतंक,भ्रष्टाचार की सरकार {लालू}मानने को तैयार नही थी की बिहार विकास की बाट जोह रहा है...मै यहाँ-वहां घूमकर वापस बिलासपुर लौट आया...उसके बाद फिर कभी ना रांची जाना हुआ,ना बिहार के किसी शहर...हाल ही में बिहार में विधानसभा के चुनाव हुए,इस दौरान टीवी पर बिहार के बारे में काफी कुछ देखा,अखबारों में पढा...जैसा देखा,सुना काश मैं कह पाता कि नीतीश के बिहार में सब कुछ बदल चुका है और बिहार भी शाइनिंग इंडिया की चमक से दमक रहा है....परेशानियां अभी भी है,लोगों की शिकायतें भी है लेकिन काफी कुछ नया भी था जिसे जनता टीवी पर बिना "ललुआ" के डरे कह रही थी...मैंने इस चुनावी घमासान में लोगो,राजनेताओ और समीक्षकों को जितना सुना उस लिहाज से अर्थव्यवस्था तरक्की के संकेत दे रही थी.... हर दूसरा व्यक्ति कानून व्यवस्था को खरी खोटी सुनाता हुआ या अपहरण उद्दोग की बात करता नहीं सुनाई दिया.......लोगो ने खुलकर कहा अब हमारे घर की बहू,बेटिया रात के नौ-दस बजे रात तक खड़े होकर चोपाटी पर आराम से गोल्ग़पे और चाट खाती है....मतलब नितीश ने कुछ तो ऐसा किया था जिसको लोग खुलकर बताना चाहते थे....मौका भी था,जनता के पाले में एक बार फिर गेंद थी....चुनावी पिच पर लालू,नितीश की पार्टी बैटिंग के तैयार थी .....छह चरण में चुनाव बिना किसी बड़ी हिंसक वारदात के सम्पन्न हुए और आज{२४ नवम्बर}मै सुबह से ही टीवी ऑन कर नतीजे जानने बैठ गया...करीब दो घंटे के बाद बिहार की जनता जनार्दन का जनादेश देश के सामने था...नितीश की विकास आंधी लालू,पासवान को उड़ा ले गई....राबड़ी,साधू का पता-ठिकाना ही नही लगा....दावे और लालू का यशगान करने वाले औंधे मुह गिर गए....जब बिहार में विकास की  हवा चलने का नतीजा सामने आया तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को भी कहना पड़ गया की बिहार से ज्यादा उम्मीदे नही थी,नतीजे बत्ताते है की कांग्रेस को बिहार में नए सिरे से कोशिशे करनी होंगी....तीन चौथाई बहुमत लेकर नितीश ने साफ कर दिया की जनता विकास चाहती है,जो जनता की उम्मीदों पर खरा उतरेगा वोट उसी को मिलेगा...पिछले पांच साल में इतना तो वक्त बदला की लोग अब  मरीज़ों को देखने घर से बाहर निकल सकते है... उन्हें अब ये डर नहीं रहेगा कि निकलते ही कोई उन्हे अगवा कर लेगा...किसान अब खेती में पैसा लगाने से झिझकेगे नहीं क्योंकि बेहतर सड़क और बेहतर क़ानून व्यवस्था अच्छे बाज़ारों तक उसकी पहुंच बढ़ाएगी.....चारो ओर नितीश के जयकारे लगने लगे,दूसरी ओर ललुआ राबड़ी के साथ ये कहने को मजबूर हो गया की बिहार में आलू भरा समोसा तो मिलेगा लेकिन अब ना लालू होगा,ना और राबड़ी ना साधू की चलेगी....  
इस बार बिहारियों के लिए दांव पर थी उम्मीद, उम्मीद कि शायद अब बिहार का राजनीतिक व्याकरण उनकी जात नहीं विकास के मुद्दे तय करेगी, उम्मीद इस बात की भी कि बिहारी होने का मतलब सिर्फ़ भाड़े का मजदूर बनना नहीं रहेगा, उम्मीद कि भारत ही नहीं दुनिया के किसी भी कोने में बिहारी कहलाना अब मान की बात होगी...........

Friday, November 19, 2010

पुण्यतिथि और आदिवासी

बरों के इर्द-गिर्द घूमती जिन्दगी को हर दिन कुछ नया करने,सीखने और जानने की आदत पड़ चुकी है .....पिछले सोमवार को मालूम हुआ की मंगलवार {16 navmbar 2010} को  जिले की सबसे चर्चित विधानसभा मरवाही के बदरोदी गांव में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और अविभाजित मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह आ रहे है...."दिग्गी राजा" स्वर्गीय भवर सिंह पोर्ते जो की आदिवासियों के बड़े नेता रहे है उन्हें श्रधासुमन अर्पित करने पहुचेंगे .....राज्य गठन के बाद या यूँ कहू की करीब एक दशक बाद "दिग्गी राजा"को कव्हर करने का मौका मिल रहा था....मैंने अपने दफ्तर में जिम्मेदार व्यक्ति से बातचीत करने के बाद शहर से १८० किलोमीटर दूर ग्राम बदरोदी पहुँचने का कार्यक्रम बनाया.....उम्र और तजुर्बे के साथ-साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में काफी अनुभवी कमल दुबे जी{मेरे बड़े भाई,सगे नही लेकिन सगे भाई से बढकर} के साथ मै मंगलवार की सुबह "दिग्गी राजा" को कव्हर करने उन्ही की कार में मरवाही के लिए निकल पड़ा.....दुबेजी को दूरदर्शन के अलावा कुछ और राष्ट्रीय चैनलों को ये खबर देनी थी,इस कारण सफ़र और दिनों की तुलना में कुछ अलग सा था....कुछ  परेशानियों को पार कर जब हमने पेंड्रा पहुंचकर "दिग्गी राजा" का लोकेशन लिया तो पता चला की वे कुछ ही देर बाद वापस दिल्ली के लिए निकल जायेंगे........सफ़र अभी करीब ३० किलोमीटर का बाकी था,मंजिल काफी दूर लग रही थी, जिस मार्ग {सिवनी}से कार्यक्रम स्थल तक पहुंचना था उस पर ठीक से पैदल चलना भी दूभर था लेकिन दुबेजी की हिम्मत के आगे मानो वक्त ठहर सा गया था...... दुर्गम रास्ते पर उछलती-कूदती कार में जब हम गाँव पहुंचे  तो पेड़ पर लगे  लाउडस्पीकर से आती आवाज सुनकर हम दोनों की जान में जान आई...सामने बने मंच से सांसद चरणदास महंत स्व.पोर्ते के विषय में बोल रहे थे....स्वर्गीय भंवर सिंह की १७ वीं पुण्यतिथि पर केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया और उनके बड़े भाई दिलीप सिंह भूरिया ने भी उनके योगदान और राजनीतिक पृष्ठभूमि का बखान किया.....दिग्गज नेतावो की भीड़ में क्षेत्र के विधायक और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी कही नजर नही आ रहे थे....मंच पर मौजूद जोगी के सुपुत्र अमित जोगी ने बताया की स्वस्थ्गत कारणों से उनके पिता{अजीत जोगी} को केरल जाना पड़ गया है....खैर तमाम लोगो को सुनने के बाद जब बारी दिग्विजय सिंह की आई तो मै मंच के पीछे से हटकर सामने की ओर आकर खड़ा हो गया....सबसे पहले "दिग्गी" चिर-परचित अंदाज में मुस्कुराये फिर कहा छत्तीसगढ़ से उन्हें काफी प्यार-दुलार मिला.....शायद दिग्गी राजा विद्याचरण शुक्ल के घर{राज्य गठन के तुरंत बाद रायपुर में झुमा झटकी} मिली इज्जत को अब तक नही भूल पाए थे.... दिग्गी की बातो को सुनकर भोले-भाले आदिवासियों ने मंच के पास से आये इशारे को देख तालिया भी बजा दी....सबसे पहले दिग्गी ने स्वर्गीय भवर सिंह पोर्ते को श्रधांजलि दी,इसके बाद उनसे अपने रिश्तो की प्रगाढ़ता का जमकर बखान किया.....स्वर्गीय पोर्ते को अपना बड़ा भाई बताने वाले कांग्रेस महासचिव ने ये भी कहा की स्व.पोर्ते के साथ कांग्रेस में अन्याय हुआ था....दिग्गी राजा ने कहा आदिवासियों की पीड़ा,उनकी जरूरत को उन्होंने  स्व. पोर्ते से ही सीखा है...स्व.पोर्ते से पारिवारिक रिश्तो की मिसाल देते-देते दिग्गी राजा राजनैतिक बयानबाजी पर उतर आए...उन्होंने कांग्रेस पार्टी को आदिवासियों की पीड़ा समझने वाली पार्टी बताया,दिग्गी ने कहा नेहरू,इंदिरा के बाद किसी ने आदिवासियों की पीड़ा और जरुरत को समझा है तो वो है सोनिया और राहुल गाँधी...सोनिया गाँधी ने वन अधिकार कानून बनवाया, वही उद्योगों की मार से हमेशा प्रभावित होने वाले आदिवासियों के लिए कई और जरुरी  कानून बनाये गए है....दिग्गी ने आदिवासियों की वकालत करते-करते ये भी कह दिया की जिन जगहों पर खनिज कंपनिया उद्योग खोलेगी वहाँ प्रभावित होने वाले आदिवासियों को खनिज का बाजार मूल्य का एक हिस्सा देना होगा,साथ ही प्रभावित आदिवासी को ३५ बरस तक १५ से ३५ हजार रूपये प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवजा भी देना पड़ेगा....इस बयान पर भोले आदिवासियों की बांछे कुछ देर के लिए जरुर खिल उठी लेकिन आदिवासियों के हिमायती बन रहे दिग्गी राजा शायद  भूल गए की अविभाजित और विभाजित मध्यप्रदेश की सियासत पर १० बरस तक उन्होंने भी राज किया है....इस देश में सर्वाधिक वक्त तक सियासी कुर्सी उन्ही की पार्टी {नेहरू,इंदिरा,सोनिया}के पास रही...फिर क्यों आदिवासी आज भी नंगे,भूखे और बुनियादी जरुरतो के मोहताज है ? खुद को आदिवासियों का रहनुमा बताने वालो को आधी सदी बीत जाने के बाद भी उस व्यक्ति का ख्याल नही रहा जिसकी वकालत वे अक्सर सियासी मंच से करते रहे है....पुण्यतिथि के बहाने खुद को आदिवासियों का शुभ-चिन्तक बताने वाले राजा बाबु ने भले ही किसी को एहसास ना होने दिया हो लेकिन वो जोगी विरोधी खेमे के लिए बंजर हो चुकी सियासी जमीन को सींचने आये थे...जोगी विरोधी खेमे की बात करे या फिर काग्रेस को नमस्ते कर चुकी हेमवंत पोर्ते की....कही ना कही जोगी के किले में सेंधमारी की कोशिश बड़े ही सुनियोजित तरीके से की गई....दिग्गी बाबु के बारे में कम ही लोग जानते है की वो मृदुभाषी और विनम्र सियासी जमात के लोगो में खासी पैठ रखते है....कुछ पीड़ा,कुछ सवाल मेरे जहन में कौधने लगे...मैंने अपने आप से सवाल किया  दिग्गी बाबु १० साल तक मुख्यमंत्री रहते आपने कितने आदिवासी गांवो को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा ?आप तो उस समय भी सीएम थे जब छत्तीसगढ़ अलग राज्य नही बना था, उस वक्त कितने आदिवासियों की जरुरतो का आपने ख्याल रखा ? अरे भोले भाले आदिवासी तो बरसो से अपने हित संवर्धन की बाते सुनते आये है परन्तु आदिवासियों का विकास नही हुआ,वो तो आज भी जमीन पर बैठकर सुनहरे भविष्य के सपने देख रहे है...
                                                                                                        सियासी मंच के जरिये,पुण्यतिथि के बहाने एक बार फिर आदिवासी याद आये ....भाषण खत्म हुआ तो दिग्गी,भूरिया और महंत के अलावा कुछ और नेताओ ने बंद कमरे में साथ बैठकर खाना खाया......खाने के बाद कुछ लोगो से भेंट मुलाकात की कोरी ओपचारिकता पूरी करते-करते दिग्गी राजा हेलीपेड पहुँच गए...चारो ओर सुनहरे भविष्य के सपने संजोये आदिवासी अपने कथित रहनुमा को जाते देख रहे थे....कुछ ही देर में आदिवासियों का रहनुमा आकाश की उचाइयो को छूने लगा और जमीन पर खड़े आदिवासी सिर उठाये विकास की बारिस का इंतजार करने लगे........

असल भारत "पीपली लाइव"में...


१३अगस्त को "पीपली लाइव" रिलीज हुई, मैंने फिल्म का प्रोमो देखा और लोगो की जुबानी काफी कुछ सुना....कुछ लोगो को फिल्म अच्छी लगी,कुछ ने इंटरवल के पहले ही टॉकीज से वापसी कर ली...."महंगाई डायन" को देखने की कई बार इच्छा हुई लेकिन वक्त की बेवफाई हमेशा मेरे पीछे साये की तरह होती....काम की वयस्तता कहे या फिल्म के लिए अलग से मुहूर्त नही निकाल पाया... आख़िरकार कुछ दिनों बाद "महंगाई डायन"परदे से उतर गई....पूरे तीन महीने सात दिन बाद {१९नव्म्बर} मै बिना काम के दफ्तर में बैठा था,कोई ऐसा था नही जिससे बातचीत करता मै तत्काल पड़ोस की सीडी दुकान पर गया और कुछ घंटे की उधारी पर "नत्था" को ले आया.....अपने लैपटॉप पर ही मैंने बड़े परदे का मजा लेने की कोशिश की.....'पीपली लाइव' को देखकर लगा जैसे वो  पत्रकारिता पर चोट करती है, फिर लगा है कि शायद अफ़सरशाही इसके निशाने पर है या फिर राजनीति....सच कहू तो यह फ़िल्म पूरी व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है........ऐसी व्यवस्था जिसके पास मरे हुए किसान के लिए तो योजना है लेकिन उसके लिए नहीं जो जीना चाहता है.......ये उन पत्रकारों पर तमाचा है जो लाइव आत्महत्या में रुचि रखते हैं ,तिल-तिल कर हर रोज़ मरने वाले में नहीं..........फ़िल्म न तो नत्था किसान के बारे में है और न ही किसानों की आत्महत्या के बारे में. ये कहानी है उस भारत की जहां इंडिया की चमक फीकी ही नहीं पड़ी है बल्कि ख़त्म हो गई है....उस भारत की जो पहले खेतों में हल जोतकर इंडिया का पेट भरता था और अब शहरों में कुदाल चलाकर उसी इंडिया के लिए आलीशान अट्टालिकाएं बना रहा है...फिल्म में जहां तक नत्था के मरने का सवाल है जिसे केंद्र में रख कर आमिर ख़ान ने पूरा प्रचार अभियान चलाया है,उसके बारे में इतना ही कहूंगा कि नत्था मरता नहीं है उसके अंदर का किसान ज़रुर मरता है जो आज हर भारतीय किसान के "घर-घर की कहानी"बन चुकी है.......अनुषा रिजवी निश्चित रूप से बधाई की पात्र हैं जो उन्होंने ऐसे मुद्दे पर फ़िल्म बनाई. अंग्रेज़ी में जिसे ब्लैक ह्यूमर कहते हैं...उसकी भरमार है और यही इसकी थोड़ी कमज़ोर स्क्रिप्ट का अहसास नहीं होने देती.......यह फ़िल्म एक बार फिर इस बात का अहसास दिलाती है कि हम कैसे भारत में रह रहे हैं. वो भारत जो न तो हमारे टीवी चैनलों पर दिखता है और न ही हमारे नेताओं की योजनाओं में...
                                         मुद्दा ग़रीबी नहीं है...मुद्दा जीने का है..चाहे वो मिट्टी खोदकर हो या मर कर. क्या फ़र्क पड़ता है गांव की मिट्टी खोद कर मरें या कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए मिट्टी खोदते-खोदते ........फ़िल्म को अंतरराष्ट्रीय सर्किट में पसंद किया जा रहा है और किया जाएगा. हो सकता है लोग कहें कि इसमें भारत की ग़रीबी को ही दिखाया गया (जैसा कि स्लमडॉग मिलियनेयर के बारे में कहा गया था) मैं तो यही कहूंगा कि यही सच्चाई है........पत्रकार, अफ़सर और राजनेता ये फ़िल्म ज़रुर देखें और अपनी कवरेज योजना और व्यवहार में थोड़ी सी जगह इस असली भारत को दें तो शायद अच्छा होगा.

Wednesday, November 17, 2010

शादी की उम्र

मै ये मानता हू की बदलते वक्त के साथ युवा वर्ग की सोच में भी बदलाव आया है खासकर शादी के मामले को लेकर....आज शादी की उम्र और उसके बारे में युवावो की राय बिलकुल ही भिन्न है,हालांकि दो दशक पहले यह उम्र सीमा और भी कम थी। अगर आजादी के पहले की बात करें तो उस समय हमारे यहां बाल-विवाह की प्रथा थी। आज भी कई इलाकों में यह प्रथा विद्यमान है। ऐसे में तमाम लोगों को बड़ी उम्र में शादी की बात सुनना अटपटा-सा जरूर लगता हैं। लेकिन समाज का एक वर्ग बड़ी उम्र में शादी को स्वीकार रहा है। लोग 30-35 की उम्र में शादी को आम मानने लगे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि बड़ी उम्र में शादी करनी उनकी मजबूरी है या शौक। शहरी परिवेश में बड़ी उम्र में शादी करना लोगों का शौक तो नहीं कह सकते बल्कि समय के बदलने के साथ लोगों की सोच में भी बदलाव आया है।
कुछ लोग पढ़ाई के बाद अपने कैरियर पर पूरा ध्यान देते है। ऐसे में कुछ कर दिखाने की होड़ में शादी के बारे में सोचने का भी वक्त नहीं होता। यह वर्ग अपने व्यवसाय और सामाजिक गतिविधियां में इतना व्यस्त है कि उनके पास विवाह के लिए सोचने के लिए समय ही नहीं है। शादी करना न करना हर किसी का व्यक्तिगत फैसला हो सकता है। आज के परिवेश में शादी की सही उम्र बताना बहुत कठिन है। युवावर्ग के पास करियर बनाने की आपाधापी में विवाह के लिए सोचने का वक्त ही नहीं बचता।
आज के युवा शादी के बंधन में बंधने से डरते भी हैं। लड़कों की मानसिकता यह होती है कि अभी ऐश-मौज कर लें, फिर पूरी जिदंगी तो पारिवारिक बंधन में बंधना ही है। वहीं लड़कियां इस बात से डरती है कि उन्हें नए घर में जाना है, पता नहीं वहां का माहौल कैसा होगा। लड़के एवं लड़कियां दोनों ही इसके चलते लम्बी उम्र तक शादी नहीं करना चाहते। वे अपने को किसी बंधन में डालने से कतराते हैं। लड़कियों के लिए शादी का मसला उनके  करियर से भी जुड़ा होता है। वे आशंकित होती हैं कि ससुराल वाले पता नहीं किस सोच के होंगे। कहीं शादी के बाद मुश्किल से मिली जॉब छोड़नी न पड़े।
आज की युवा पीढ़ी पढ़ी-लिखी है। वह अपने जीवन से जुड़े निर्णय खुद लेने लगी है। इसमें अपने साथी का चुनाव भी शामिल है। इसी के चलते लिव-इन-रिलेशनशिप का नया चलन चला है। लोग अपने जीवन साथी का चुनाव खुद करते हैं। इसमें अपने साथी को सोचने-समझने के लिए वक्त मिल जाता है। यह एकदम शादी जैसा ही है। इसमें दोनों एक साथ ही रहते है, बस शादी के बंधन में बंधना नहीं चाहते। साथ रहने के दौरान यदि उन्हें लगता है कि हमारी जिदंगी एक-दूसरे के साथ गुजर सकती है तो फिर वे शादी कर लेते हैं।
युवावर्ग को समझना होगा कि करियर के बारे में सोचना अच्छी बात है लेकिन शादी में देरी से कई परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। देर से शादी से जहां पुरूष में पिता बनने की क्षमता में कमी होती दिख रही है वहीं महिलाओं को भी मां बनने में परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं। शादी के बाद पुरूष तथा महिलाओ में शारीरिक बदलाव आता है। लेकिन बड़ी उम्र में शादी करने से शरीर को इन बदलावों से तालमेल बिठाने में दिक्कत होती है। शादी की कामयाबी का एक अहम तत्व पति-पत्नी के बीच का तालमेल भी होता है। लेकिन अधिक उम्र में शादी करने के बाद पार्टनर से तालमेल बिठाना आसान नहीं होता क्योंकि बढ़ती उम्र में अपनी सोच में बदलाव लाना काफी कठिन होता है।
समाज में हमेशा से बदलाव होता रहा है। आज आर्थिक युग में युवावर्ग के लिए करियर सर्वोच्च प्राथमिकता है। जिसके चलते शादी की उम्र का बढ़ना लाजमी है। ऐसे में मां-बाप को भी चाहिए कि उनका साथ दे। जो मां-बाप अपने बच्चों को कम उम्र में या उसे अपना करियर बनाए बिना शादी की बात करते है उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए मां-बाप को भी अपने सोच में बदलाव लाना चाहिए। 

जागा मंत्रालय ...

केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने दो टीवी रियलिटी शोज पर गाज गिरा दी है। कलर्स चैनल पर प्रसारित होने वाले ‘बिग बॉस’ और एनडीटीवी इमैजीन पर आने वाले ‘राखी का इंसाफ’ को रात 11 बजे से पहले और सुबह 5 बजे के बाद कभी भी प्रसारित करने से मना किया गया है। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इन कार्यक्रमों के निर्माताओं को निर्देश दिए हैं कि वे  कार्यक्रम के दौरान एक पट्टी भी चलाएं, जिस पर लिखा हो कि यह कार्यक्रम बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं है.......मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि दोनों शो आम दर्शकों के लिए नहीं हैं और उनका प्रसारण देर रात में ही किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन शो को फिर से भी नहीं दिखाया जा सकता और न ही न्यूज चैनल खबरों में इसके फुटेज का इस्तेमाल कर सकेंगे। इसके अलावा मंत्रालय ने अश्लीलता के आरोप में एसएस म्यूजिक चैनल पर 7 दिनों के लिए प्रतिबंध लगा दिया है........इन दो ‘एडल्‍ट’ शो को लेकर हाल में विवाद काफी बढ़ गया था। शो में भड़काऊ, उत्‍तेजक और अश्‍लील दृश्‍य दिखाए जाने व संवादों का इस्‍तेमाल करने का आरोप लगता रहा है। यही नहीं, टीआरपी के लिए तमाम हथकंडे अपनाए जाने और रियलिटी शो बता कर सब कुछ प्रायोजित दिखाने के आरोप भी लगते रहे हैं।
                                                                       राखी का इंसाफ और बिग बॉस कई कारणों से चर्चा में आ चुके हैं। राखी का इंसाफ में राखी सावंत होस्ट की भूमिका में लोगों को ‘इंसाफ’ दिलाने का दावा करती हैं। लेकिन इसमें नाच-गाना, मारपीट, गाली-गलौच, अश्‍लील टिप्‍पणी सब कुछ दिखाया जा चुका है.......उत्‍तर प्रदेश में झांसी के एक परिवार ने तो यहां तक आरोप लगाया कि शो में गए उनके परिजन को राखी सावंत ने ‘नामर्द’ कह दिया, जिसके बाद वह अवसादग्रस्‍त हो गया और अंतत: उसकी जान चली गई। राखी पर इस सिलसिले में मुकदमा भी दर्ज हो चुका है ........बिग बॉस में भी जमकर अश्लीलता परोसी जा रही है और कलाकार कई मौकों पर अभद्र भाषा का प्रयोग करते देखे गए हैं...........चलिए देर से ही सही कम से कम सूचना प्रसारण मंत्रालय ने ये तो मान ही लिया कि "बिग बॉस" और "राखी का इंसाफ" परिवार के साथ बैठकर देखने लायक प्रोग्राम नही है....मंत्रालय की आँखे कब तक खुली रहती है ये तो वक्त बताएगा लेकिन एक व्यक्ति की मौत और तमाम विवादों के बाद कुछ लोगो ने जागरूकता जरुर दिखाई है.........

Saturday, November 13, 2010

ये क्या जगह है दोस्तों ?

" जिंदगी आ तुझे कातिल के हवाले कर दूं, मुझसे अंजामे तमन्ना नहीं देखा जाता" ये दास्तां उन जिंदगियों की है जिनके नाम रोज बदलते हैं। ये कहानी उनकी है जिनका पता उनकी पहचान बताता है, उनका पेशा बयां करता है। ये वह बस्ती है जो अरसे से मौजूद होकर भी कभी बसी नहीं। यहां रहनेवाला हर बाशिन्दा और यहां आनेवाला हर मुसाफिर बस एक ही सवाल पूछता है..................ये क्या जगह है दोस्तों ?
आपने अखबारों के इश्तिहार में गुमशुदा लोगों के नाम देखे होंगे, लेकिन क्या कभी किसी बस्ती के लापता होने की बात आपने सुनी है।छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बाद संस्कारधानी,न्यायधानी यानि बिलासपुर का ही नाम आता है.......पिछले एक दशक में काफी कुछ बदला,जमीन पर नजर आने वाली इमारते आकाश चूमने लगी,सडक पर यातायात का दबाव कई गुना बढ़ा पर इसी चकाचौंध के पीछे एक ऐसा दाग भी है जो कई दशक से संस्कारधानी के लिये ही नही पूरे जिले के लिए नासूर बना हुआ है और वह है जगह-जगह अघोषित  रेड लाईट एरिया........शहर के तालापारा का नाम भी कुछ उसी रूप में लोग जानते है...वक्त के साथ ठिकाने जरुर बदले,छोटी-छोटी खोलियो की जगह फ्लेट्स,काले शीशे लगी गाडियों और फार्म हॉउस ने ले ली... देश की आज़ादी के पहले अंग्रेजों के जमाने में  मुजरे सुनने का चलन था.... उस समय जिस्म का कारोबार सीमित ठिकानो पर संचालित था...मुंगेली के पड़ाव चौक की तंग गलियों की बात हो या फिर शहर के तालापारा की ८बाई ८ की खोलिया..
दुनिया के सबसे पुराने पेशे जिस्मफरोशी के कारोबारी बरसों से कारोबार कर रहे हैं। यहां से कभी नाबालिग तो कभी जबरन लाई गई लड़कियां जिस्म बेच रही हैं और सफ़ेद पोश तबका इन  इलाको  में जाने से भी कतराता है। पर इतना तय है कि इस अंधेरे कोने को कभी भी रोशनी नसीब नहीं हुई.......कहते हैं जिस्म रूह का लिबास है, लेकिन जब जिस्म पेशा बन जाता है तो उसके जख्म रूह से भी रिसने लगते हैं........... फिर बस ये आरजू रह जाती है कि मंजिल न दे चिराग न दे हौसला तो दे तिनके का ही सही कोई आसरा तो दे...... कुछ पते ऐसे होते हैं जो नाम को गुमनाम बना देते हैं.... ऐसे ही कुछ पते इस शहर और आस-पास के इलाको में.... यहां बस्ती तो है लेकिन जिंदगी यहां सिर्फ कटती है बसती नहीं......ये कहानी यहां रह रहे किसी बाशिन्दे के नाम से शुरू होती तो भी कहानी कुछ ज्यादा अलग नहीं होती .... मान लीजिए एक का नाम है रोशनी........नाम नकली है लेकिन दर्द असली.............22 साल पहले रोशनी को पति ने घर से निकाल दिया था। बच्चे को पालने की मजबूरी उसे जिस्म के बाजार में ले आई....... 22 साल से खिड़की से हाथ बाहर निकालकर सड़क पर चल रहे अजनबी मुसाफिरों के साथ चंद पल बिताने को अगर जिंदगी कहते हैं तो जिंदगी रोशनी ने भी जी......तिल- तिल कर सुलगती जिंदगी काठ हो गई और अब उम्र है कि कटती नहीं काटने को दौड़ती है। कहां जाएं ? क्या करें ? 22 साल पुराना सवाल एक बार फिर रोशनी को डरा रहा है। एक वक्त था कि निगाहें किसी का इंतजार करती थीं, फिर थक गई सड़कें और दूर तलक जाके एक दिन लौट आई......अब न ख्वाब रहे, न दर्द और न ही दर्द का एहसास, रोशनी ने मौत की मानिंद जीना सीख लिया। रोशनी की जिंदगी में अब रोशनी नहीं, उसका इंतज़ार भी नहीं। पल- पल का हिसाब मांगती जिंदगी से शर्मसार रोशनी के जेहन में है तो बस एक सवाल कि ये क्या जगह है दोस्तों ?
जिस बाजार में जिस्म बिकता है वहां सिर्फ इंसानियत नहीं बिकती, यहां छिन जाती है बच्चों की अनमोल मासूमियत......... यहां रहनेवाले और पलनेवाले बच्चों का अक्सर न कोई वर्तमान होता है और न ही कोई भविष्य........बच्चों के साथ पिता का नाम नहीं जुड़ा होता.... सिर्फ 4- 5 साल पहले तक ये एक बड़ी मुसीबत थी....... भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसके आदेश से अब सिर्फ मां के नाम से भी बच्चों को स्कूलों में दाखिला मिल जाता है..... वरना 5वीं के बाद बिन बाप के बच्चों के सपने दो कमरे के स्कूल में ही दम तोड़ देते..... इस ओर किसी एनजीओ की कोशिशे सराहना के लायक नजर नही आई.... स्कूलों में अघोषित  कोठों की ज़िंदगी से निकले बच्चों को जगह नहीं मिल पाती ऐसे में सैकड़ों बच्चों की तक़दीर या तो कोठों में या फिर सड़कों पर दम तोड़ देती है..........जिस नरक की बात अक्सर कहानियों में सुनते आए हैं उसे देखने के लिए कहीं और जाने की जरूरत नहीं। वह नरक शहर के ब्रहस्पति बाजार,शनिचरी बाजार,तालापारा की कई गलियों में ही मौजूद है.....एक ऐसा नरक जिसमे हर दिन सैकड़ों सैक्स वर्कर्ज़ करती हैं अपने जिस्म का सौदा.....एक जमाना था गांव के  जमींदार हर शाम महेफिल सजवाया करते थे.....पैर में बंधे घुंघरू की आवाज उस महिला या यु कहें की उस तवायफ के दर्द को जेहन से बाहर निकलने ही नही देती थी....वक्त बदला,लोग बदले तो फिर तवायफो का अंदाज कैसे नही बदलता.....धीरे- धीरे जिस्म के कारोबार में बदली जिंदगी के वही जख्म आज शहर का  नासूर बन कर सामने है......अब तो लगता है कई कमसिन लडकियों,महिलाओ को जिस्म बेचकर रूपये कमाना सबसे आसान तरीका लगता है.....मैंने देखा है कई सफेदपोश,इज्ज़तदारो को जो बाजार में उपलब्ध बेटी की उम्र की लडकियों से सौदा करते है.....रूपये की गर्मी उन्हें उम्र के लम्बे अन्तराल का अहसास नही होने देती.....बाजार में अलग-अलग ठिकानो पर दिखाई दे जाने वाली सेक्स वोर्करस को लोग देखते ही शब्दों के बाण चलाने लगते है....लेकिन उनके दिल में जो दर्द छुपा है उस को कोई मानने या समझने को तैयार ही नहीं है....वजह है कालगर्ल्स ......महंगे मोबाईल सेट,कार या फिर दोपहिया वाहनों पर अयासियो के लिए फर्राटे भरती वो कालगर्ल्स लोगो की खास और आसानी से उपलब्धता का सामान बन चुकी है....यहाँ-वहां ग्राहक की तलाश तो उसे होती है जिसके घर का चूल्हा जिस्म बिक जाने के बाद ही जलता है .......उनकी  ज़िंन्दगी में बस एक ही सच है,लोगों की हवस को निगल कर भी खुश रहने और जीवन जीने का सच.... जिस्म के बाज़ार में लोगों के अरमानों की केवल बोलियां लगती हैं.......फिर चाहे उसका नाम राधा हो या शबनम...... किसी के अपने नहीं रहे ,तो किसी के अपनो ने धोखा दे दिया और फिर पेट की भूख इन्हें खींच लाई जिस्म के बाज़ार में.......इतना कुछ खोने और झेलने के बाद भी उन्हें विश्वास हैं दुनिया बनाने वाले पर.......शायद इसीलिए उनके घर की दीवारों  पर कैटरीना, करीना, प्रीती ज़िन्टा के साथ भगवान की तस्वीर भी दिखाई देती है...... किसी भी त्योहार का इनके लिए कोई मायने नहीं है ......शायद यही विश्वास है जो उन्हें हर वक्त की घुटन भरी जिन्दगी के बावजूद जिन्दा दिल बनाये रखता है......उसी होसले ने  इन्हें और इनके मासूम बच्चों को ज़िन्दा रखा है.....इन तमाम जिल्लतो के बावजूद अगर खुदा के आगे इनके हाथ उठते हैं तो केवल इस दुआ के लिए कि............. "मेरे बच्चे कभी इन गलियों का हिस्सा न बनें"

राखी तुने ये क्या किया रे...

टीवी चैनल्स अब किसी भी स्तर तक  गिर सकते  है...हालत इतनी बिगड़ चुकी है की टीवी प्रोग्राम अब लोगो की जान तक लेने लगे है.... प्रोग्राम के जरिये अश्लीलता परोसने वालो को शायद वो सब कुछ अच्छा लगता है और जनता भी वो सब खुशी-ख़ुशी देखती है या ये कहे की जनता अब वो ही देखना चाहती है जिसमे सब दिखे....शायद इसीलिए अश्लीलता पसंद लोगो को इन दिनों "राखी का इंसाफ''काफी लुभा रहा है....अश्लील बाते,गन्दी गालिया सुनकर लोग ठहाके लगा रहे है....प्रोग्राम में इंसाफ की देवी {राखी सावंत} को तंग कपड़ो में देखने वालो की ख़ुशी का ठिकाना नही होता...पिछले पाँच साल में राखी ने अलग-अलग हथकंडो के जरिये खूब पब्लिसिटी बटोरी,फिर वो मिका के किस का मामला हो या फिर "राखी का स्वयम्बर"....इस आइटम गर्ल ने वो सब कुछ किया जो भारतीय संस्कृति एक औरत को करने की छुट नही देती...बाजार में नग्नता पसंद लोगो की खास पसंद बनी राखी अब इंसाफ की देवी बन बैठी है...."राखी का इंसाफ"कुछ इस तरह का होता है की लोग आपस में मारपीट तक करते देखे जा सकते है...पिछले दिनों एक एपिसोड में राखी के  इंसाफ ने प्रेमनगर[भिंड] के लछमण अहिरवार को मौत की नींद सुला दिया...एपिसोड में लक्षमण  की मर्दानगी पर सवाल खड़े कर दिए गए,राखी के इंसाफ में "इंसाफ" मिलने की उम्मीद लिए पंहुचा लछमण अब इस दुनिया में नही है.....मौत के दो दिन बाद लक्ष्मण  की माँ ने थाने में राखी के खिलाफ अपराध दर्ज करवाया ....विभिन्न धाराओ   के तहत पुलिस ने मुकदमा भी दर्ज कर लिया ...मगर सवाल यहाँ ये खड़ा होता है की क्या सम्बंधित चैनल उस व्यक्ति की मौत के लिए  जिम्मेदार नही है ? क्या इस समाज को ऐसे कार्यक्रमो के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा नही खटखटाना चाहिए जो लोगो की जान लेने तक को उतारू हो गए है  ?
                                             सवाल कई है लेकिन जवाब कोई खुलकर नही देना चाहता....एक वक्त था जब टीवी पर "जनता की अदालत" और किरण बेदी की " कचहरी " लगती थी....उन कार्यक्रमों ने कई ज्वलंत मुद्दों को बेबाकी से उठाया,लोगो का विश्वाश टीवी और इंसाफ के उन कार्यक्रमों से बढ़ा ....हालाँकि मै जिस " जनता की अदालत" और "कचहरी" का जिक्र कर रहा हू उसकी तुलना " राखी के इंसाफ " से करना गलत होगा....राखी नाम की आइटम गर्ल इंसाफ के नाम पर अश्लीलता परोस रही है,लोग टीवी के सामने मजमा लगाये इंसाफ का नंगा नाच देख रहे है...इंसाफ,न्याय जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर न्यायिक व्यवस्था पर करारा तमाचा मारने वाले कई टीवी प्रोग्राम धडल्ले से चल रहे है और सूचना प्रसारण मंत्रालय है की सब कुछ जान कर भी अनजान बनने  का नाटक कर रहा है....बदन पर सब कुछ दिखा देने वाले कपडे,घडी की सुई की तरह चेहरे के बदलते भाव बताते है राखी आखिर क्या है?....खुद का स्वयम्बर रचाने से लेकर कथित पति को छोड़ने तक राखी ने काफी कुछ ड्रामा किया....टीवी  पर स्वयम्बर रचाने वाली आइटम गर्ल ने चंद दिनों में ऐलान भी कर दिया की उसका पति कुछ ऐसा करने को कहता है जो वो नही कर सकती,राखी ये भी कहती है की उसमे[पति]काफी कमी थी....राखी की अपने चंद दिनों के पति के खिलाफ इस तरह की बेबाक टिप्पणी मैंने स्टारन्यूज़ पर देखी थी.... खुद के घर परिवार की उलझी कड़ीयो को आज तक ना सुलझा पाने  वाली राखी अब लोगो के टूटे आशियाने को बसाने,परिवार की उलझी कड़ीयो को सुलझाने के लिए इंसाफ की कुर्सी पर बैठी है, जहाँ से  इन्सान को कथित इंसाफ की देवी ऐसी मानसिक  यातना देती है जिससे ग्रसित इन्सान "लक्ष्मण" की तरह मौत को गले लगा लेता है.....
                                                                                    सबसे बड़ी बात ये रही की एक व्यक्ति मानसिक यातना से टूटकर जान दे देता है और मानवधिकार की रक्षा के लिए लड़ने वाले,टीवी चैनल्स ख़ामोशी से सब बर्दाश्त कर जाते है....प्रेमनगर में  जिस दिन  लक्ष्मण की मौत का मातम होता  है उस दिन भी टीवी चैनल पर "राखी का इंसाफ"चल रहा होता है...लोग आधुनिक वस्त्रो या यू कहें की अर्धनग्न आइटम गर्ल को जज के रूप में देखकर तालिया पीटते रहे,अपने मुंह में ऊँगली डालकर सिटी मारने वाले अश्लीलता पसंद लोगो की जुबान पर ये नही आया " राखी तुने ये क्या किया रे....."

Monday, November 8, 2010

एक सपना...




मैंने जंगल को काफी करीब से देखा है....वहाँ रहने वाले बैगा आदिवासियों की बात हो या फिर दूसरी  जनजातियो के लोग....तंग कपड़ो से ढका बदन,चेहरे पर मासूमियत की लकीरे उनके सीधे,सरल जीवन की कहानी बयाँ करती है...पिछले बरस अचानकमार के उन आदिवासियों को जंगल से खदेड़ दिया गया जो बाघ प्रोजेक्ट वाले एरिया में आते थे...विस्थापन के नाम पर आदिवासियों को खूब छला गया....सुख-सुविधावो की बनावटी तस्वीर दिखर आदिवासियों को अचानकमार के जंगलो से निकालकर लोरमी के पास बसाया गया है.....विकासखंड मुख्यालय से लगे उस इलाके मे आदिवासी नई राह तलाश रहे है...वहीं कुछ भू-मफियायो की नजरे उन सरकारी जमीनों पर लग गई है जिस पर आदिवासियों के आशियाने बनाये गये है....विस्थापन से लेकर पुनर्वास के बीच की तमाम कोशिशो में कुछ लोगो को ख़ास फायदा भी हुआ...मैंने उस सच  को जब चेनल के जरिये दिखाया तो कुछ लोगो को काफी पीड़ा हुई ....दरअसल पीड़ा जनित वो  लोग अधिकारी वर्ग की चौखट पर हर रोज या यूँ कहें की ईमान बेच चुके लोग है...चंद रूपए के लिए ईमान बेचने वालो की छाती जितनी चौड़ी नजर आती है,उनकी नाक भी उतनी ही बेशर्मी से ऊँची होती है....समाज में खुद को पत्रकार बताकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले उन लोगो की कीमत दरअसल लोग भी जान  चुके है...शायद इसीलिए हर खबर को करने,खबर छिपाने की एवज वो लोग रुपयों के इशारे पर नग्न होने तक को तैयार रहते है...तभी तो आदिवासियों के विस्थापन से लेकर पुनर्वास तक की खामियों को अखबारों,चैनलों में बीट नाम की दुकानदारी चलाने वालो ने ना देखा,ना सुना.....सबसे बड़ी बात ये रही की विस्थापित गाँवो से लेकर पुनर्वास स्थल तक विभाग के अधिकारियो के साथ घूमकर कुछ बीटधारी पत्रकारों ने वही देखा जो रुपयों की छलनी से दिखाया गया....खैर आदिवासियों के दर्द और हकीकत को जितना हो सका हमने करीब से  देखने की कोशिश की है...... 

Friday, November 5, 2010

विस्थापन का दंश...

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इस ठण्ड में गरीबी कितनी ठिठुरेगी मै नही जानता,लेकिन इस गुलाबी ठण्ड में सुबह के वक्त अनायास ही मुझे उन आदिवासियों का ख्याल आ गया जिन्हें पिछले बरस ही जंगल की पुस्तैनी जमीन से बेदखल कर दिया गया था....कई पीढियों से जंगल में रहते आये आदिवासियों को उन शेरो के लिए विस्थापित कर दिया गया जिनकी वास्तविक संख्या का पता वन महकमे के अधिकारियो को भी नही है...कडकडाती ठण्ड में पिछले बरस आदिवासी अचानकमार अभ्यारण्य से खदेड़ दिए गए....आदिवासियों का परिवार लोरमी के पास  खुले आसमान के नीचे घास फूस की झोपड़ियो में रहने को मजबूर हो गया ...बरसो पुराने  जंगल के बीच बसे आशियाने के छूटने का मलाल,ठण्ड में कपकपाता बदन फिर आग उगलती गर्म हवाओ की मार,बाकी फजीहत बारिश में हुई ....ऐसा नही है की जंगल के आशियानों में ठण्ड,गर्मी और बारिश का असर नही होता था..लेकिन पुस्तैनी झोपड़ियो की छाँव मौसम की मार का असर नही होने देती थी.... नई जगह पर स्कूल,खेत,बिजली,अस्पताल होने का सपना दिखाकर आदिवासियों को बिना नए घर बने खुले आसमान के नीचे ले जाकर छोड़ दिया गया....६ गाँवों के आदिवासी एक साथ जंगल से बिना किसी व्य्स्वस्था के खदेड़ दिए गए.... जैसे-तैसे वक्त बीत गया,अब कुछ आदिवासी ईंट,रेत,सीमेंट के बने पक्के आशियानों में जिन्दगी की नई राह,नई रौशनी की उम्मीद में दिन काट रहे है...... विस्थापन की तमाम कवायदों के बीच वन महकमे के अधिकारियो ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशो की खुलेआम धज्जिया उड़ाई गई...लेकिन सरकारी रुपयों की बन्दर बाट में सब सफाई से ढँक दिया गया.....इस वीडियो में उन आदिवासियों के दंश को साफ देखा जा सकता है.......

Monday, November 1, 2010

१० बरस का छत्तीसगढ़

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एक नवम्बर को छत्तीसगढ़ १० बरस का हो गया....पूरे राज्य में जश्न राज्योत्सव के रूप में मनाया गया....बिलासपुर में भी तीन दिनों तक जश्न  का माहोल रहा.....सरकार की विकास यात्रा का जमकर बखान किया गया.....हर विभाग की अलग-अलग सरकारी दुकाने[पंडाल]सजाई गई...सच की उड़ती धूल को कारपेट से ढँक दिया गया था ....जमीन पर अकसर  कम नजर आने वाली हकीकतो को सरकार के नौकरों  ने बड़ी ही सफाई से पेश किया.....हजारो लोगो की भीड़ में वो चेहरे एक बार फिर छिप गए,जिनका घर केवल और केवल भ्रष्टाचार की कमाई से चलता है....आवाम के हक़ की कमाई को बपोती समझने वालो को बार फिर बेनकाब होते देखा गया....कई हकीकते पंडाल के सामने थी लेकिन जश्न के माहोल में सब छिप गया.....बाल श्रम कानून की खुलेआम धज्जिया  उडती रही, अन्नपूर्णा दाल -भात के पंडाल में लोग पूड़ी-सब्जी खाते देखे गए.......कई ऐसी सच्चाइयो को मैंने खबर के जरिये दिखाया...इस वीडियो को देखकर आप खुद अंदाज लगाइए की सरकार और सरकारी तंत्र की वास्तविकता क्या है..........