Wednesday, December 29, 2010

हम पर तरस खाओ

साल २०१० ख़त्म होने में करीब ३६ घंटे का समय बाकी है...सोचा जाते साल को अच्छे से बिदा करूँ उससे पहले  मन कुछ लिखने का मन हो गया...इस बार मन उन्ही चैनलों के बारे में लिखने का हुआ जिसमे से एक चैनल मुझे भी मेहनत के बदले रुखी-सुखी खा लेने लायक मेहनताना दे देता है...सच कहूँ तो इस महंगाई में उस मेहनताने से एक जून की रोटी जुगाड़ना भी मुश्किल है लेकिन घर छोड़कर बाहर ना जाने की जिद्द में खुद शोषण का शिकार हो रहा हूँ....खैर हर दिन तो किसी ना किसी के बारे में लिखता ही हूँ,किसी ना किसी को मेरी खबरों से पीड़ा तो होती ही है क्यों ना इस बार अपने गिरेंबान को झाँक लूं ...जिन टीवी चैनलों के आगे से लोगो की नजरे नही हटती खासकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया की आज क्या हालत है वो जरुर मेरे मन को भारी किये हुए है....सोचता हूँ अब तक हिंदी न्यूज़ चैनलों पर काफी कुछ लिखा जा चूका है...तमाम बुराइयों की आलोचना हो चुकी है और तमाम बुराइयों को अच्छा बताने की दलीले भी दी जा चुकी है....अब टीवी की आलोचना का हाल राजनैतिक भाषा में कहूँ तो कांग्रेस और भाजपा की आलोचना सा हो गया है....हर दलील का जवाब देती एक दलील ....आज जो स्वच्छ चरित्र की बात करते है उनके चेहरे पर भी दाग खोज लिया गया है,जिन्हें मलीन बताया जा रहा है टीवी की खूबसूरती का मेकअप उनके यहाँ भी मिलता है....मतलब साफ़ है प्रतिस्पर्धा इस कदर हावी हो चुकी है की लोग अपनी बात रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार है....पत्रकारिता के स्तर और उद्देश्य को लेकर बरसो से चर्चा हो रही है...हर बार हमारा कोई अगुआ इसके स्तर को बदलते समाज के सापेक्ष बता देता है....हमको कह दिया जाता है लोग जो देखना पसंद करते है वही दिखाओ...मैं जानता हूँ की भारत जिसे अक्सर मैं महान कहने से नही चुकता वो असल मायनों में महान है...भारत सामाजिक रूप से एक भ्रष्ट देश है...मुमकिन है एक अफसर इमानदारी से टैक्स देता हो मगर अस्पताल जाकर वो अपनी पत्नी की कोख में पल रहे शिशु का लिंग परिक्षण जरुर करवाता है....मुमकिन है एक साठ साल का आदमी भाजपा,कांग्रेस से इमानदारी की उम्मीद रखता हो मगर बेटे की शादी में परिवार वालो के साथ बैठकर दहेज़ की सूचि बना रहा होता है...ऐसी कई बाते मुमकिन है जो अक्सर मेरे मन में कौंधती रहती है....मै तो यही कहूँगा की सापेक्षिक ईमानदार और सापेक्षिक बेईमान नागरिको वाले इस समाज में व्यवस्था को चुनौती देने वाली खबरों को लोग दिलचस्पी से देखते हो, लगता नही है....अब तो हालत ये है की गंभीर खबरों को लेकर भी टीवी चैनल चीखते है....लगभग हर शादी दहेज़ से होती है तब क्या ऐसे लोग ड्राइंग रूम में बैठकर दहेज़ हत्या पर बडबडाते रिपोर्टर और एंकर को सुनना पसंद करते है,यक़ीनन नही.....ऐसी खबरों के आते ही वो लोग या तो चैनल बदल देते है या फिर बहुरानी को किचन में चाय बनाने भेज देते है.....ऐसी कई बाते पिछले कई बरस से सोच रहा हूँ...मै वही का वही सोचता बैठा रहा और साथ काम करने वाले कुछ लोग मुझसे आगे निकल गए....हालाँकि उनकी आगे बढने की रफ़्तार और तरीका दोनों मेरे वसूलो के आड़े आ जाता है.....
                                                           कहते है पत्रकार सरकार गिरा सकता है मगर टीवी चैनल की टी.आर.पी.के खिलाफ नही लड़ सकता...टी.आर.पी.उस बला का नाम है जो पत्रकार के आदर्शो को वक्त आने पर मुर्गा बना देती है...मतलब मालिक के आदेश पर अक्सर ईमान और वसूल बिकता सा लगने लगता है....राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल वालो ने तो अब साप्ताहिक टी.आर.पी.निकालनी शुरू कर दी है....एस.एम्.एस.के जरिये लोगो से प्रतिक्रिया मांगी जाती है....मतलब खबरों को कितना मसालेदार बनाना है सम्पादक प्रतिक्रिया के जरिये भांप लेता है....जो काम बड़े बड़े सुरमा नही कर पाए वो काम हम चुटकी में कर लेने का दंभ भरते है.....मगर सच कहूँ तो अब टीवी न्यूज़ चैनल की आलोचना बंद होनी चाहिए...हम पर तरस खाया जाना चाहिए...हम मजबूर लोग है....हम पर दया किजीये...अगर मजबूर ना होते तो ऐसी पत्रकारिता रच देते की दुनिया देखती...अब तो ऐसा लगता है की हमारे भीतर अच्छा कहने-सुनने का साहस भी नही बचा है...हमारे समाज का एक चरित्र है...आदर्श की बात करेंगे तो हजारो सवाल आपकी तरफ पत्थर में लपेटकर फेंके जायेंगे....इसलिए मेरी तो एक गुजारिश है हम टीवी पत्रकारों के प्रति लोगो की सहानभूति होनी चाहिए.................

Tuesday, December 28, 2010

ये राजगोपाल हैं ...

     "खादी का कुरता-पायजामा,पैर में साधारण सी सैंडिल और काफी सरल स्वाभाव"....जो नही जानता उसके लिए वो शख्स कुछ भी नही है...मै जानता था टीवी,अखबारों और किताबो के जरिये,इस कारण मेरे लिए ऐसी शख्सियत से मुलाकात कई मायनो में ख़ास थी....सीधा,सरल लेकिन आदिवासियों के हक़ के लिए संघर्ष का तेवर बड़ा ही सख्त....इस ख़ास शख्सियत का नाम राजगोपाल पी.व्ही.है...जितना सुना था उससे कही ज्यादा है राजगोपाल जी...प्रेस क्लब में आज आये और प्रेस कांफ्रेंस के जरिये जल,जंगल,जमीन पर खूब बोले....आदिवासियों के हक के लिए पिछले २ दशक से संघर्ष करते राजगोपाल साफ़ कहते है की सरकार वन अधिकार कानून का पालन करे...वैसे तो राजगोपाल के संघर्ष की कहानी तब से शुरू होती है जब मै इस दुनिया में आया ही नही था...राजगोपाल जी के करीबियों की माने तो जिस वक्त मध्यप्रदेश के चम्बल में डाकुओ का आतंक था वो एस.एन. सुब्बाराव नाम के शख्स के साथ किशोर अवस्था से जुड़ गए....ये वही सुब्बाराव थे जिनकी पहल पर ७०० डाकुओ ने आत्मसमर्पण किया था... सुब्बाराव के साथ काम करने वाले राजगोपाल ने वर्ष १९७२ के बाद फिर कभी मुड़कर नही देखा....संघर्ष यात्रा का सफ़र काफी लंबा है,हौसले इतने बुलंद है की सफर की दूरी का पता ही नही चल रहा है....मैंने राजगोपाल जी को जितना पास से आज देखा उतने ही गौर से करीब ३२ मिनट तक सुनता रहा....आदिवासियों के हित संवर्धन के लिए बढ़ते कदमो को इस बार भी सफलता मिलेगी तय है.....आज राजगोपाल जी ने प्रेस क्लब में जो कहा उसमे प्रमुख रूप से वनवासियों को उनका वाजिब हक़ सरकार दे.....राजगोपाल जी कहते है २००७ से २०१० के बीच केंद्र सरकार ने आदिवासियों के विकास पर ४२०० करोड़ रूपये खर्च किये.....करोडो रुपयों का खर्च आज तक आदिवासियों के तन पर ठीक से लंगोट भी नही दिला पाया....भ्रष्टाचार की जड़ो से निकली साखो ने आदिवासियों का हक़ छीन लिया....राजगोपाल जी मानते है की कंक्रीट के जंगलो ने आदिवासियों की जमीने लील ली....आदिवासियों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर दिया गया जो कानूनन गलत है....जल,जंगल,जमीन के लिए आने वाले बर्षो की कार्ययोजना भी तैयार है....वर्ष २०१२ में आदिवासियों की लड़ाई लड़ने वाले ग्वालियर से दिल्ली के लिए कूच करेंगे.....अहिंसात्मक सत्याग्रह के जरिये  सरकार पर दबाव बनाने पदयात्रा की जाएगी.....राजगोपाल जी और उनके असंख्य साथियो का सफ़र जारी है....आदिवासियों,किसानो को उनका वाजिब हक़ दिलाने के लिए हजारो किलोमीटर का लम्बा सफ़र तय करते राजगोपाल जी भारत सरकार द्वारा प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बने राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद् के सदस्य भी है....उम्मीद करता हूँ जिस मकसद को लेकर यात्रा जारी है उसकी मंजिल जल्दी मिल जाएगी......
                                                                                       छत्तीसगढ़,मध्यप्रदेश,उड़ीसा,झारखण्ड जैसे राज्यों में आदिवासियों की हालत काफी खराब है....इन बातो को बड़ी ही दमदारी से कहते राजगोपाल जी नक्सलवाद पर भी काफी कुछ  कह गये....उन्होंने साफ़ कहा की छत्तीसगढ़ में न्याय और रोटी नही मिलने का नतीजा है नक्सलवाद....सरकार से खिन्न और असंतुष्ट लोगो ने हिंसा का रास्ता अख्तियार कर रखा है....वो ये भी कहते है कि सरकारों के कामकाज से कई संगठन भी असंतुष्ट है लेकिन अहिंसा,सत्याग्रह का रास्ता अपनाकर मांगो को मनवाने की कोशिश की जा रही है....राजगोपाल जी ने ये तो कह ही दिया की नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़कर अहिंसा की राह पकडे और सरकार भी अपनी भूल सुधार कर असंतुष्टो की रोटी,न्याय के लिए ठोस योजना बनाए.....
                                                 राजगोपाल जी से हम दूध के धुले होने की उम्मीद नही रखते लेकिन राजगोपाल जैसे लोगो ने कम से कम गांधी के रास्ते से समाज के आखरी आदमी के लिए लड़ाई तो शुरू की है....राजगोपाल जैसे लोग हमारे जैसे लोगो के लिए अँधेरे में जल रही एक कंडील की तरह है जिनसे उम्मीद जगती है अभी सब कूच ख़त्म नही हुआ है....दुनिया को सुन्दर बनाने के लिए कुछ लोग अब कोशिश कर रहे है....हमारे जैसे लोग उस टिटिहरी के साथ है जिसके अंडे समुन्दर बहा ले गया है और वह उसी दिन से रेत ला-ला कर उस समुन्दर को भरने की कोशिश कर रही है.....

अब कुत्तो की बारी


अचानकमार में कुत्तो का आतंक .......जो लोग अचानकमार अभ्यारण्य को नही जानते उनके लिए ये खबर चौकाने वाली नही  होगी...मेरे लिए और उन सब के लिए ये खबर जरुर कई मायनो में ख़ास है...हमने अचानकमार इलाके को काफी करीब से देखा और जाना है...बात कल ही की तो है...मै अपने दफ्तर में बैठा अखबार के पन्ने पलट रहा था..."अचानकमार में कुत्तो का आतंक"...इस शीर्षक पर नजर पड़ी तो खबर पढने का मन हुआ...पूरा पढने के बाद मै सोचने लगा अभयारण्य के भीतर बड़ी संख्या में कुत्ते आखिर आये कहाँ से...जंगल में कुत्ते है,या खबर के जरिये कुत्तो का आतंक फैलाया जा रहा है....सच तो वही बताएगा जिसने बिना कुत्तो के आतंक झलकाती तस्वीर के आतंक फैलाने की कोशिश की है....ये खबर उनके लिए भी चौकाने वाली हो सकती है जो अचानकमार को "शेरो"के नाम से जानते है...केवल जानते है....जी हाँ पिछले १० बरसो में मैंने तो शेर नही देखा...वन महकमे के अधिकारियों से जितना सुना उसके मुताबिक जंगल में २६ "टाइगर" है...हाँ वो आंकड़े वाले शेर वी.वी.आइपी को जरुर दिख जाते है...उसके लिए वन महकमा पहले से मुनादी करवाता है और वी.वी.आइपी को शेर दिखा दिया जाता है...जिस अचानकमार अभ्यारण्य में २६ शेर है वहाँ कुत्तो का आतंक ? बड़ा अटपटा सा लगता है...मैंने सोचा मेरे ही एक साथी ने खबर छापी  है जरुर कुछ तो ख़ास होगा...फिर ख़याल आया कोई नई बात थोड़े ही है,वन महकमे का अधिकारी जब चाहता है अखबार में शेर दिख जाता है...जब उसकी इच्छा होती है जंगल में कुत्ते आतंक मचाने लगते है....जरूर इस बार कुत्तो की बारी लगती है ऐसा सोच कर मैंने अखबार के पन्ने को पलट दिया....अरे जिस अचानकमार अभयारण्य को अधिकारी की काबिलियत पर बिना शेर की गड़ना हुए "टाइगर रिजर्व" बना दिया गया हो,जहाँ करोडो रूपये उन शेरो के संरक्षण पर खर्च कर दिए गए हो जिनकी वास्तविक संख्या का पता आज तक नही चल सका है,वहाँ कुत्तो का आतंक मचा हो नया नही लगता...हर साल शेरो की गिनती होती है,उनके पगचिन्ह खोजे जाते है ....वन अधिकारी चाहते भी है हर साल शेरो की गड़ना हो,शेरो के संरक्षण पर सरकार ध्यान दे...शेरो के संरक्षण पर सरकार ध्यान देगी तभी तो वन अधिकारियों के चेहरे शेरो की तरह दहाड़ते नजर आयेंगे.....ऐसे में कुत्तो की अचानक जंगल में इंट्री विभाग के काबिल अधिकारियों की आगामी योजना का खाका खीच देती है....शेरो के नाम पर करोडो का वारा-न्यारा करने वाले अब मुंह का स्वाद बदलना चाहते है....तभी तो यकाएक कुत्ते जंगल में आतंक मचाने लगे........अब चीतल,हिरन जैसे वन्य प्राणी आसानीसे अधिकारियों और उनके ख़ास मेहमानों के मुह का स्वाद बदलेंगे क्योकि कुत्ते आतंक जो मचा रहे है....? अब कुत्तो को जंगल से खदेड़ने या फिर मारने के नाम पर सरकारी फंड आएगा.....कुछ कुत्तो पर खर्च होगा कुछ मेरी बिरादरी वालो पर और बाकी बचा जंगल का बड़ा साहेब बिना डकार लिए पचा जायेगा....कुत्तो का आतंक ख़त्म हो ना हो जंगल से अब शेरो का झूठा खौफ जरुर ख़त्म हो गया है....

Thursday, December 23, 2010

झूठ को सच बनाने की कोशिश








     इन अखबारों की लगी कतरन और उसमे छपे पुलिस
     के तमाम बयानों को गौर करे तो पत्रकार सुशील
     के कातिल उनके कब्जे में है...दावे उस वक्त कमजोर
     हो जाते है जब क़त्ल करने वाले हथियार को जब्त
     करने की बारी आती है...पुलिस किस तरह से झूठ
     की बुनियाद पर तैयार कहानी को सच बताने की कोशिश कर रही थी देखिये इस वीडियो में....                 
                       
       

Wednesday, December 22, 2010

वो दबंग बना रहा और...

 एस.पी.नकारा है....पुलिस किसी काम की नही रही...जब से थोरात आया है तब से अपराधियों के हौसले कुछ ज्यादा ही बुलंद हो गए है...ऐसी तमाम बाते इन दिनों शहर के हर आदमी की जुबान से सुनाई दे जाती है...ये चर्चा स्वाभाविक भी है... शहर को पिछले कुछ महीनो से अशांत करने की कोशिश होती रही और जिले का पुलिस कप्तान आँखे मूंदे बैठा रहा...शायद यही वजह रही की लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की एक मजबूत ईंट को रविवार {१९दिसम्बर}की रात कुछ दहशतगर्दो ने गोली मारकर धराशायी कर दिया...दैनिक भास्कर के पत्रकार और प्रेस क्लब के सचिव सुशील पाठक की गोली मारकर ह्त्या कर दी गई...वारदात के करीब ४८ घंटे बाद तक पुलिस केवल हत्यारों की परछाई तलाशती रही...इधर अमन के शहर में रहनेवालो ने जमकर आक्रोश दिखाया तो कुछ संदेहियो को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई लेकिन नतीजा सिफर रहा...पत्रकारों और शहर के आवाम ने नकारे एसपी को हटाने के लिए जोरदार आवाज तो उठाई साथ ही सुशील के कातिलो को शीघ्र गिरफ्तार करने की मांग को लेकर आज {२२ दिसंबर}नेहरू चौक पर धरना भी दिया....सबने माना शहर काफी अशांत हो चुका है और उसके लिए जिम्मेदार केवल पुलिस महकमा है...अक्षम पुलिस कप्तान की टीम के सारे खिलाड़ी भी ऐसे जिनसे आवाम की हिफाजत की उम्मीद करना बेमानी है....सुशील की मौत की गूंज पूरे प्रदेश में थी इस कारण शासन,प्रशासन सकते में था....नेहरू चौक पर सैकड़ो लोगो की भीड़ इस बार दूसरे मूड में थी,हर कोई असुरक्षित महसूस कर रहा था इस कारण आवाज में ख़ास तरह की गुर्राहट थी...पुलिस कुछ समझ नही पा रही थी,जिनको पकड़ा उनसे कुछ ख़ास सुराग नही मिला...पुलिस वाले इस बार बुरे फंसे थे...इस बार पूरे शहर की नजरे थी आखिर खाकी कातिल तक कब और कैसे पहुंचती है...शहर के अमन-चैन को लौटाने की वकालत करते लोगो की भीड़ में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी,उनकी धर्मपत्नी कोटा विधायक डॉक्टर रेणु जोगी भी थी....मंच एक था,लोगो की पार्टिया और गुट जरूर अलग-अलग थे...शाम करीब ३ बजे तक धरना-प्रदर्शन चलता रहा....दूसरे दिन यानि २३ दिसंबर को मशाल जुलूस निकालकर लोग आगे की रणनीति तय करते ठीक उससे पहले ही निकम्मे कप्तान को हटाने का फरमान सरकार ने दे दिया...दरअसल जिस एसपी को हटाने की मांग आज की जा रही थी उसे करीब तीन महीना पहले ही हटा दिया जाता लेकिन कुछ ऐसा हुआ जिसके कारण बिगड़ी बात बन गई...ये वही एसपी था जिसके फ़िल्मी शौक ने एक टॉकीज के सुरक्षा कर्मी की जान ले ली थे...परदे पर सलमान की दबंगई का नशा इस अधिकारी पर ऐसा छाया की इसे इस बात का इल्म ही नही रहा की शहर दहशतगर्दो के आतंक से सहमा हुआ है....जिले के पुलिस कप्तान ने  सलमान अभिनीत फिल्म दबंग देखी जिसमे एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी का किरदार शायद इसे खूब भाया...वैसे पोस्टिंग काफी महँगी थी इस कारण वसूली पर साहेब ने ज्यादा ध्यान दिया...वो कानून व्यवस्था को भगवान्-भरोसे छोड़कर नोट बटोरने में लगे रहे...इधर आतंक की काली छाया शहर को घेरती रही....नतीजा एक पत्रकार की गोली मारकर ह्त्या कर दी गई और पुलिस केवल हवा में हाथ पैर मारती रही...आखिरकार लोगो को संस्कारधानी में अमन के लिए सड़क पर उतरना पड़ा...जनाक्रोश का ख़याल सरकार ने रखा और दबंग बने थोरात को हटाकर अजय यादव को जिले की कानून व्यवस्था का जिम्मा सौपा गया है....उम्मीद की जा रही है की नए सिरे से व्यवस्था बनेगी और अशांत होते शहर का अमन जल्दी ही लौट आएगा.....

Monday, December 20, 2010

हमारा "घुन्घरालू"

"घुन्घरालू",जी हाँ कुछ इसी नाम से मै और मेरे कुछ पत्रकार मित्र उसे बुलाते थे...थे इसलिए कहना पड़ रहा है क्योकि अब वो हमसे काफी दूर जा चूका है...घुन्घरालू नाम मैंने इसलिए रखा था क्योकि उसके करली बाल बेहद आकर्षित करते थे....वो मेरी किसी भी बात पर कभी नाराज नही होता था,अक्सर प्रेस क्लब में वो मुझसे मिलता,देखते ही बोल पड़ता "क्या बात है पांडेयजी बड़े छाए हो टीवी पर,और क्या चल रहा है........"हाँ कभी-कभी हमारे बीच मनमुटाव भी होता लेकिन एक कप चाय की प्याली सारे गिले-शिकवे मिटा देती थी.... हमेशा उसके चेहरे पर खुशियों की लालिमा नजर आती...सभी से कुछ ना कुछ कहते रहना और अपनी बात को बड़ी ही दमदारी से रखना उसकी आदत में शुमार हो चूका था...मेरे घुन्घरालू का असल नाम सुशील पाठक था जिसे लोग "मटरू" के नाम से पुकारते थे...सबका मटरू मेरे लिए घुन्घरालू था,हमेशा रहेगा...कल  {19 दिसम्बर} की रात उन सबके लिए मनहूस रही होगी जो मटरू यानि मेरे घुन्घरालू को जानते थे....रोज की तरह वो दफ्तर से काम निपटा कर रात करीब साढ़े १२ बजे घर के लिए निकला...घर यानि सरकंडा चटर्जी गली पहुँचते-पहुंचते करीब २ बज गए...रोज की तरह घर से कुछ ही दूरी पर अपनी कार पार्क कर मटरू नीचे उतरा ही था की पास घात  लगाये बैठी मौत ने उसे घेर लिया...कुछ लोगो ने मटरू पर गोलिया दाग दी...उसने भागकर जान बचाने की कोशिश भी की,लेकिन घर की दहलीज से चंद कदमो की दूरी पर ही घुन्घरालू की सांसो ने उससे बेवफाई कर दी....घर में मटरू के आने की उम्मीद में दोनों बच्चे और भाभी सो रहे थे...इधर डोली लेकर आई मौत घुन्घरालू को इस जहाँ से बिदा कराकर ले जा चुकी थी....मटरू की लाश औंधे मुह जमीन पर पड़ी थी और कुछ ही दूरी पर पुलिस रात गश्त के नाम पर अलाव जलाकर वक्त काट रही थी....वारदात की जगह से पुलिस के गस्त पॉइंट की दूरी महज ५० मीटर की रही होगी....इसी बीच एक पत्रकार मित्र का उसी रास्ते से गुजरना हुआ,वो भी अखबार की डियूटी कर घर लौट रहा था....रास्ते में औंधे मुह पड़े एक व्यक्ति को देख उस पत्रकार मित्र ने तफ्तीश की तो पाया की मरनेवाला कोई और नही बल्कि सुशील भाई है....इसके बाद सुरेश पाण्डेय ने मोबाईल पर लगभग सभी को ये विचलित कर देने वाली खबर दी....सब मौके पर जुट गए,खबर की गंभीरता को भाप कर पुलिस के आला अफसरों की तत्परता भी देखने लायक थी....जैसे-तैसे मनहूस रात गुजरी,सुबह जिसे-जिसे खबर मिलती गई वो मटरू को आखरी बार देखने पहुँच गया...इस पूरे वाकये ने जहाँ मिडिया जगत को हिलाकर रख दिया वहीँ बिलासपुर शहर के लोग भी कानून व्यवस्था को कोसते रहे....मटरू की हत्या कोई छोटी-मोटी घटना नही थी,इस बार दहशतगर्दो ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मारकर पुखता प्रमाण दे दिया था की कानून व्यवस्था दहशतगर्दो की चौखट पर सलामी दे रही है....  बदन पर खाकी वर्दी ओढ़े कुछ अफसर और कर्मचारी बीके ईमान की रोटी खाते है ये सुना भर था,देखने का मौका मटरू की मौत के बाद मिला....
  मटरू दैनिक भास्कर में काम करता था...वहां  कम ही लोग होंगे जो मटरू के अंदाज में नौकरी करते रहे होंगे, बिंदास और बेबाकपन की नौकरी कम ही लोग करते है....करीब डेढ़ दशक पत्रकारिता के मैदान में कलम के दम पर कई जंग फतह करने वाले घुन्घरालू को एक विदेशी हथियार के शोर ने भले ही खामोश कर दिया हो लेकिन मटरू कहूँ या मेरे घुन्घरालू के पीछे चलने वालो के बुलंद हौसले अब भी बरक़रार है.....ज्यादा कुछ लिखा नही जाता इसलिए यही रुककर अपने घुन्घरालू को श्रधा सुमन अर्पित करता हूँ और इश्वर से कामना करता हूँ कि मटरू के  परिवार के लोगो को दुःख की बेला में साहस और संबल प्रदान करे...........

Wednesday, December 15, 2010

वो हरी डायरी...

 स्वीर जितनी धुंधली दिख रही है,यादे उतनी पुरानी नही हुई है...हरे रंग की इस डायरी

        में कई यादो की महक अब भी बाकी है...मुझे डायरी लिखने का कभी शौक नही रहा..
        लोगो को डायरी लिखता देख मै कभी सोचता था आखिर लोग ऐसा क्या लिखते
        होंगे...कई बरस बाद मुझे आज अपने सहयोगी की हरे रंग की एक पुरानी डायरी देखने
        का मौक़ा मिला...आज दिलीप {मेरा सहयोगी} काफी खुश और शायराना मूड में
        था....उसने सुबह दफ्तर पहुचते ही मुझे अपना लिखा कुछ सुनाया...डायरी पुरानी थी
        इस वजह से कई पन्ने अलग-थलग हो गए थे....चंद कविताये,कुछ शेर और पुरानी
        प्रेमगाथा का कई पन्नो पर जिक्र डायरी लिखने के शौक को बयाँ कर रहा है...वक्त के
        साथ पुरानी हो चुकी डायरी के पन्नो से लिखावट की स्याही भले ही धुधली पड़ गई हो
        लेकिन यादो की महक अब भी खुशबू बिखेरती है....सबसे मजे की बात तो मुझे काफी
        देर बाद पता चली,पन्ना-दर-पन्ना बचपन से लेकर जवानी के हसीं लम्हों को पढने की
        कोशिश में तब खलल पड़ गया जब बीच में वास्तु-नियम का एक पन्ना आ गया...मूड
        खराब तो हुआ लेकिन पढने की इच्छा ख़त्म नही हुई...मैंने पन्ना पल्टा तो दिशावो के
        विषय में कुछ लिखा दिखा...मुझे लगा बेकार में डायरी पढ़ रहा हूँ...फिर भी दूसरे पन्ने
        को ताकने लगा...किसी मोटी और मार्कर नुमा कलम से बड़े-बड़े अक्षरों में आड़ी-तिरछी
        लिखावट नजर आई...पढ़कर अच्छा  लगा,पूछने पर दिलीप ने बताया बिटिया के बारे
        में लिखा है...बचपन,जवानी और बाप बनने की ख़ुशी कागज के पन्ने पर आकर ले
        चुकी    थी...हाँ बीच में वास्तु का एक पन्ना मूड को खराब जरुर कर गया था...
         मैंने सोचा भी नही था की आगे कई और दिलचस्प बाते जानने को मिलेंगी...किसी पन्ने में फ़िल्मी गीतों का संग्रह,तो  
        किसी पेज पर देवी माता का जिक्र....बड़ी अजीबो-गरीब है ये डायरी. दिलीप ने बताया की इस डायरी के कुछ पन्ने उसकी शादी में हुए खर्च का ब्यौरा भी सहेजे हुए है...मतलब मेरे सहयोगी की शादी में क्या खाना बनाया गया,क्या-क्या सामान बाजार से लाया गया,सब लिखा था,जितना मैंने जाना उस लिहाज से ये यकीन से कह सकता हूँ  मेरे दोस्त ने अपनी यादो की उस डायरी को भी सिन्धी की दूकान बना दी जहाँ सब कुछ मिलता है....आपको एक और मजे की बात बताऊँ दिलीप "सिन्धी" है...खैर मुझे उसके सिन्धी होने का मलाल नही है,डायरी पढने के बाद जो मलाल रहेगा वो ये की मेरे सिन्धी दोस्त ने यादो को पन्नो में समेटने की कोशिश भी "सिन्धी" अंदाज में की है.......

Monday, December 13, 2010

उसे लोग संस्कारधानी...

 जिस शहर में मै रहता हूँ उसे लोग संस्कारधानी या फिर न्यायधानी के नाम से जानते है...कभी सुनकर गर्व होता था,अब तो अजीब से ख़यालात आते है.....जिस शहर को अमन-ओ-चैन का टापू कहा जाता था वो अब इतना अशांत और डरावना नजर आने लगा है,मानो कब क्या हो जाये...जैसे-जैसे शहर की सूरत संवरती दिखी वैसे-वैसे अपराध की काली छाया से इस शहर की आबो-हवा दहशतगर्दी फ़ैलाने लगी...कई ऐसे अपराध हुए जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल था...दिन दहाड़े हत्या,लूट,डकैती,उठाईगीरी,जैसे अपराधो के बारे में सुनकर लोगो का कान अब  पक गया...शहर बढ़ा,अपराध बढ़ा,स्वाभाविक है लोगो के पास दौलत भी उसी अनुपात में बढ़ी...जो कल तक सड़क के आदमी थे वो अब बड़े आदमियों की गिनती में आ चुके है ...बदलते वकत ने कुछ लोगो को रसुखीयत की कतार में लाकर खड़ा तो कर दिया लेकिन खानदानी अंदाज की कमी चेहरे पर साफ दिखाई पड़ जाती है ...कुछ ऐसे ही नवेले रईसों की बिगड़ी औलादे पिछले  दिनों  एक होटल में पार्टी के बहाने इकठी हुई,पार्टी जन्म दिन की थी,स्वाभाविक था बिना शराब सब कुछ अधुरा-अधुरा सा लगता....मंहगे और आधुनिक ज़माने के वस्त्रो से ढके नव-धनाडयो के नवाबजादो के मुह शराब क्या लगी पता ही नही चला कितनी अंदर गई,कितनी पैमाने में छूट गई....वक्त अपनी रफतार से सुबह की ओर कदम बढा रहा था और वो रईसजादे थे की मुह लग चुकी शराब को छोड़ना नही चाहते थे....कदमो ने 
साथ देने से इंकार कर दिया लेकिन अंगूर की बेटी भी उन रईसजादे की शायद असल औकात देखना चाहती थी...नशा कुछ इस तरह चढ़ा की वो रईसजादे अपनी असल औकात में आ ही गए...कुछ ही देर में शरीर पर चढ़े कपडे जमीन पर थे, बिना कपडे "कभी मुन्नी याद आती तो कभी शीला की जवानी पर लड़खड़ाते कदम बार-बार जमीन पर गिरा देते .....दरअसल गिरे हुए लोग रुपये की चादर से उस हकीकत को ढंकने की कोशिश कर रहे थे जो शराब की घूंट अन्दर जाते ही उड़कर दूर फीका गई.....मस्ती में झूमते नवेले रईसों से होटल के कर्मचारियों की झड़प हो गई...देखते ही देखते शराफत और रईसी कुछ इस तरह नंगी हुई की देखने वाले अवाक् रह गए....नए-नवेले होटल की सूरत कुछ ही देर में काफी बिगड़ी नजर आने लगी,होटल नया था,ग्राहक भी नव धनाडय थे...ये बात होटल से निकलकर थाने तक पहुंची...जैसे-तैसे रात गुजर गई...सुबह होटल मालिक के रिश्तेदार,परिचित और कुछ मिडिया वालो की भीड़ मौके पर जमा हो गई....मिडिया वालो की भीड़ में मै भी था....सब कुछ होटल मालिक और उनके रिशतेदारो ने विस्तार से बताया....पूरी घटना में होटल वाले खुद को कही-से-कही तक गलत मानने को तैयार नही थे...इधर पूरे वाकये को हम सुन ही रहे थे की अचानक पुलिस वालो की बड़ी संख्या देखकर थोड़ी देर के लिए हैरानी जरूर हुई लेकिन तारबाहर थाने के पूरे खाकी वालो की सक्रियता देखकर हम मामले की गंभीरता को समझ गए...जितने खाकी वाले सक्रिय और संख्या बल में दिखाई दे रहे थे उसको देखकर कोई भी होटल में हुई मारपीट की घटना को गंभीरता से लेता..जिस थाने के साहेब और कर्मचारी बड़ी से बड़ी वारदात को हलके में लेते हो उनका पूरे कर्मचारियों के साथ यू मौके पर तफ्तीश करना बता रहा था की घी के लड्डू दोनों हाथो में है.....मतलब  रिपोर्ट लिखने से लेकर केस कमजोर करने तक के फासले में सैकड़ो रईसजादे थे.....पुलिस ने दोनों पक्षों की सुनी,एक दूसरे के खिलाफ अपराध दर्ज कर पुलिसवाले होटल में घंटो कुछ इस तरह तफ्तीश में जुटे थे मानो दो-चार लोगो का मर्डर हो गया हो ....खैर ये तो रही हाल ही में रईस बने लोगो और उनके पीछे लालच भरी नजरो से घूमती पुलिस की सच्चाई...वैसे कुछ मेरी  बिरादरी वाले भी जूठन चाटने तैयार थे...
                          इस पूरे मामले में जो मेरी समझ में आया वो ये था की होटल मालिक खुद को हरिश्चंद्र बता कर वो सच छिपा रहा था जिसकी आड़ में रूपये कमाए जा रहे है...शहर में ऐसे कई होटल है जहाँ जुआ,सट्टा और शराबखोरी से लेकर जिस्म का कारोबार बड़े पैमाने पर होता है....इन ठिकानो की खबर पुलिस को नही है कहना सफ़ेद झूठ से कम नही होगा...कारवाही इसलिए नही होती क्योकि ऊपर से नीचे तक औकात  के मुताबिक हिस्सा बंधा है...यही हिस्सा शहर के अमन चैन पर अब उस काले बदल की तरह मंडरा रहा है जिसके हर वक्त बरसने का खतरा बना रहता है......आने वाले दिनों में हालत और बिगड़ेगे,तय है...  जिन अपराधो की कल्पना इस शहर ने नही की थी वो सब कुछ ऐसे देख रहा है जैसे इसे अब आदत सी हो चली है...कोई देर रात तक खुली शराब की दुकानों का विरोध करने सड़क पर नही उतरता,कोई इस बात को लेकर अपनी आवाज  बुलंद  नही करता कि अमन के इस शहर में अशांति फ़ैलाने वालो को बखशा नही जायेगा...कोई चिल्लाये भी तो क्यों,अरे तमाम मुद्दों पर हल्ला मचाने वाले कोई और नही वही चेहरे तो है,जिन्हें मौका मिलते ही शराब,शबाब और कबाब की जरुरत पड़ती है.......इधर पुलिस ने सक्रियता दिखाई और कुछ ही घंटो में दोनों पक्षों से १० लोगो को गिरफ्तार किया और मुचलका जमानत पर छोड़ भी दिया...एक बार फिर पुलिस रसूखदारो के आगे पानी भरती नजर आई...ऐसे में इस शहर की आबो-हवा में  अमन की छांव तलाशना जरा मुश्किल सा लगता है....

Friday, December 10, 2010

बड़ी "पोलिटिक्स" है भाई...

मुझे नफ़रत हैं ऐसे लोगों से लेकिन क्या करें, कुछ लोगों की दुकानदारी ही ऐसे चलती है... वो उस मछली के किरदार में होते हैं जो पूरे तालाब को गंदा कर देती है... जिनका स्वार्थ ही दूसरों को छोटा साबित करके ख़ुद को बड़ा बनाना है.....और आख़िर में अपनी आदत से मजबूर होकर वो अपने ज़मींदोज़ होने का मार्ग प्रशस्त कर लेते हैं....हालाँकि उस मार्ग में बढ़ते कदमो की आहट सुनाई नही पड़ती...
आप किसी भी सरकारी या गैर सरकारी दफ़्तर में काम करते हों....ज़रा बताइए, कितने लोग हैं आपके दफ़्तर में जो अपनी नौकरी से संतुष्ट हैं.....अरे, लोग जिसकी नौकरी करते हैं, उसी को गाली देते फिरते हैं..... जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं.... मेरे दफ्तर में ऐसे दो चेहरे वालो की फेहरिस्त लम्बी है...लोग परस्पर किसी भी मुद्दे पर असहमत हों लेकिन अपनी नौकरी और बॉस को लेकर कामोबेश सभी एक दूसरे से सहमत होते हैं.....सभी का ‘संस्थागत मानसिक स्तर’ ख़तरे के निशान से ऊपर ही रहता है....सरकारी नौकर अपने अधिकारी से परेशान और प्राइवेट वाले अपने बॉस से......वैसे मेरे दफ्तर में मालिक को छोड़ दे तो सभी अपने-अपने स्तर पर बास होने का दावा करते है...मै तो पिछले कई बरस से यही समझने की कोशिश कर रहा हूँ आखिर बास है कौन ?
मैं आज तक नहीं समझ पाया कि ऑफ़िस में लोगों को अपना बॉस हिटलर का बेवकूफ़ क्लोन क्यों नज़र आता है? कर्मचारियों का मानना होता है कि बॉस तो कर्मचारियों को मज़दूर समझता है.... दफ़्तर के सर्वाधिक नाकारे लोग बॉस को गाली देते फिरते हैं....जिनके पास काम होता उन्हे बॉस और सहकर्मियों को गाली बकने का समय नहीं मिल पाता, लिहाज़ा वो घर आकर अपनी व्यस्तता का गुस्सा अपने बीवी-बच्चों पर निकलाते हैं....बॉस कितना भी अच्छा क्यूं ना हो कभी प्रशंसा का पात्र नहीं बन पाता.....पता नहीं क्यूं, हर तरह का कर्मचारी अपने को शोषित मानता है......जो कुछ काम नहीं करते वो कहते फिरते हैं कि मेरी प्रतिभा को यहां कुचला जा रहा है, मुझे मौक़ा ही नहीं दिया जाता, मौक़ा मिलते ही मैं तो जंप मार जाऊंगा.... कोई और धंधा पानी शुरू करूंगा... और जिनसे काम लिया जाता है, वो भी यही कहते घूमते हैं कि मेरा शोषण हो रहा है, वेरी वॉट लगा रखी हैं, गधों की तरह मुझसे काम लिया जाता है, मौक़ा मिलते ही मैं तो जंप मार जाऊंगा....

ना जाने क्यूं कुछ लोग अपने जिस दफ़्तर को जहन्नुम बताते फिरते हैं, उसे ये जानते हुए भी नहीं छोड़ना चाहते कि उनके ना रहने से कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं.... वो जन्म भर की तरक्की की उम्मीद वहीं रहकर करते हैं, उनकी प्रतिभा भी पहचान ली जाए, सारे महत्वपूर्ण काम उन्ही से कराए जाएं, उनकी तनख्वाह भी उनके मन मुताबिक हर साल बढ़ा दी जाए, उनके अलावा किसी और को भाव ना दिया जाए..... अरे भाई, आप इतने ही प्रतिभावान हैं तो कहीं और किस्मत क्यों नहीं आज़माते.....ऐसे लोग अपनी नौकरी को गाली भी बकेंगे और रहेंगे भी वहीं.....ये भी ख़ूब है......वैसे ऐसे लोग बेवकूफी का स्वांग रचकर संस्था की आड़ में बाजार से जैसे हो सके नोट बटोरते है....इस खास प्रजाति के लोगो की असल औकात २ समोसे से शुरू होकर ५००-१००० रुपये तक दम तोड देती है....कभी जाल में कोई बुरा फंस गया तो ये लोग औकात से बड़ी बात करने से भी नही चूकते.....वैसे भी मेरी बिरादरी के चर्चे २जी स्पेक्ट्रम तक पहुँच गए है..... सच कहू प्रतिष्ठा भी इस खास प्रजाति के लोगो की ज्यादा नजर आती है....इन्हें  घर से लेकर अपनी जरुरत पूरी करने के लिये हर दिन किसी ना किसी की चाटुकारिता का नाटक करना पड़ता है,ये जिसे उस दिन का बकरा समझते है वो इनसे ज्यादा होशियार और चालक होता है....वो कथित बकरा हलाल{रूपये देने}होने से पहले सब कुछ अपने हिसाब से करवा लेता है...इस बीच अगर आपसे कुछ गलती हुई तो मोबाईल की घंटी बजने में भी वक्त नही लगता,फिर सफाई देने से लेकर दुबारा गलती ना होने की गारंटी भी वो पत्रकारिता का मुखौटा लगाये लोग लेते है...ऐसे में आप सोच सकते है की वो लोग दूसरी जगह जाकर मेहनत करेंगे ?बेवकूफ ही होगा कोई जो महीने की बधी-बधाई कमाई छोड़कर दूसरी जगह जायेगा...फिर भी कुछ लोगों को हमेशा लगता है कि सबसे ज़्यादा काम तो वही करते हैं, फिर भी उनकी तनख़्वाह कितनी कम है और बाक़ी सारे तो बस गुलछर्रे उड़ाने की सैलरी पाते हैं....  वो लोग सोचते है की काम मैं करता हूं और पैसे दूसरों को मिलते हैं.....छोड़ूंगा नहीं.....ऐसे कितने ही प्रतिभावान लम्मपट दूसरों की तरक्की में टंगड़ी लड़ाने के चक्कर में अपनी ही छीछालेदर करवाते है लेकिन उनकी बेशर्म बांछे हमेशा खिली नजर आती है....चलिए यही रुक जाता हूँ वरना नवसिखिये कलमकारों को ढक्कन भर शराब में लोटा भर पानी मिलाना पड़ जायेगा....

Wednesday, December 8, 2010

"रिपोर्ट यहाँ दर्ज करावें"



पने कई जगहों पर लिखे स्लोगन पढ़े होंगे जिन पर 
लिखा होता है "मोबाईल यहाँ पर रिचार्ज होता है,दूध-दही-मक्खन यहाँ मिलता है,देसी मुर्गी के अंडे मिलने का एक मात्र स्थान...." जैसी  कई और बातें...अब आप बिलासपुर के किसी भी थाने में जायेंगे कुछ उसी अंदाज में एक बोर्ड पर लिखा मिलेगा"रिपोर्ट यहाँ दर्ज करावें"...मतलब दुकानदारी या यूँ कहूँ की जिस तरह से ग्राहक फ़साने के लिए दुकान के बाहर आकर्षक स्लोगन लिखा होता है वैसा ही कुछ थानों में लिखकर पीड़ित की परेशानी को कम करने का प्रयास किया गया है...अब किसी भी पीडीत को थाने पहुंचने के बाद रिपोर्ट लिखवाने के लिए भटकना नही पड़ेगा...एक निर्धारित जगह पर बैठे खाकी वर्दी वाले साहेब से मिलकर बस आपको अपनी व्यथा सुनानी है..ये बात अलग है की आप जब थाने जाये तो जरुरी नही की वो साहेब आपको मिल जाएँ..हाँ सबको जी हुजुर बोलने के झंझट से आम जनता को छुटकारा जरुर मिल जायेगा...हर बात के लिए {"रिपोर्ट यहाँ दर्ज करावें"}इस बोर्ड के नीचे लिखे साहब से संपर्क करिए..व्यवस्था नई है,हो सकता है महंगाई के मुताबिक फीस बढ गई हो पर समस्या हल होगी ऐसा विभाग के अधिकारी भी कहते है...पुलिस अधिकारी शहर के थानों में हरियाली लाने पौधारोपण कर रहे है,कई थानों का कायाकल्प हो रहा है...नई साज-सज्जा के साथ कई थानों में थानेदार से लेकर रंगरूट तक नये है...लगता है खाकी अब नये अंदाज में जनता को उल्लू बनाने की फ़िराक में है... शहर में
पिछले तीन चार महीनो में अपराध का ग्राफ जितनी तेजी से बढा है उससे तो यही लगता है की ऊपर से लेकर नीचे तक सब अपराधी की परछाई को पकड़ने के लिए पैदल चल रहे है...अपहरण,हत्या,चोरी,लूट जैसी वारदात अब खुलेआम और बेखोफ हो रही है...वारदात के बढे ग्राफ से साहेबानो को भी खास फर्क नही पड़ता...साहेब लोग अपने में मस्त है और अपराधी अपने कारनामो में...वैसे बिलासपुर जिले की कानून व्यवस्था का हाल भगवान भरोसे उसी दिन से हो गया जिस दिन से थोरात साहेब बतौर एसपी यहाँ आये...हर दस दिन बाद थानों में फेरबदल,यहाँ-वहाँ जवानो की बेजा कसरत और पुलिस के वास्तविक कर्तव्यों को भूल बाकी सब कुछ करना,यही सच खाकी वर्दी के पीछे छिपे कुछ इन्सान गाहे-बगाहे कर देते है....वरना तो अब सारे दबंग ये कहते फिर रहे है कि रिपोर्ट दर्ज कराना है तो यहाँ आयें....

Saturday, December 4, 2010

आजतक की मुन्नियां!

“30 मिनट नाचोगी…
तीन करोड़ मिलेंगे…
ना बाबा ना !”
देश के सर्वश्रेष्ठ और सबसे तेज चैनल आजतक के प्रोमो ((प्रोमो मतलब किसी प्रोग्राम का एक तरह का विज्ञापन जिसके जरिये दर्शकों के अंत: मन में एक उत्सुकता जगायी जाती है ताकि वो एक तय समय पर जमा हो कर वो प्रोग्राम देखें)) की पंक्तियां हैं। ये पंक्तियां किसी शातिर दिमाग की पैदाइश होंगी। ऐसा दिमाग, जो मानता हो कि तीन करोड़ रुपये मिलें तो किसी को भी तीस मिनट नाच लेना चाहिए। ऐसे में अगर बॉलीवुड की किसी “शीला” या फिर “देसी गर्ल” ने इससे इनकार किया, तो यह ऐतिहासिक घटना है और एक ऐसी मजेदार ख़बर है, जिस पर आधे घंटे का विशेष बनाया जा सकता है। वो भी ऐसे दौर में, जब मीडिया की नैतिकता का सवाल गहरा हो रहा है। जब पत्रकारिता का दामन दागदार हुआ है। खैर पत्रकारिता गयी तेल लेने। फिलहाल बात “मुन्नी” की। “मुन्नी” अभी हॉट और सेलेबल है।
“मुन्नी” पहले मोबाइल हुई। अब “मुन्नी” बदनाम हो गयी है। चुलबुल पांडे के चक्कर में अमिया से आम हो गयी और फिर सिनेमा हॉल हो गयी। और सिनेमा तो न्यूज चैनलों की सबसे बड़ी कमजोरी है। यही वजह है कि अब टेलीविजन चैनल वाले “मुन्नी” के पीछे पागल हैं। दीवाने हैं। “मुन्नी” का जिक्र हुआ नहीं कि सिसकारी भरने लगते हैं। ऐसे में ख़बर आयी कि नये साल के मौके पर देश के रईस लोग पांच सितारा होटलों में “मुन्नी” का मुजरा देखना चाहते हैं। फिर क्या था… पांच सितारा होटलों में अपने-अपने लिए “मुन्नी” तलाशने को होड़ मच गयी। एक होटल ने देसी गर्ल (प्रियंका चोपड़ा) को तीन करोड़ का ऑफर दिया। तीस मिनट नाचने के लिए। लेकिन देसी गर्ल ने इससे मना कर दिया। फिर ऑफर शीला यानी कैटरीना कैफ को दिया गया। उन्होंने भी “मुन्नी” बन कर मुजरा करने से इनकार कर दिया। बताइए भला, किसी को तीन करोड़ रुपये तीस मिनट के लिए मिले और वो मना कर दे… है न हैरानी की बात।
इसी से हैरान परेशान आजतक के कर्ताधर्ताओं को स्पेशल का आइडिया मिल गया। लेकिन आधे घंटे का प्रोग्राम बनाने के लिए रिसर्च की जरूरत पड़ती है। उनकी खोजी टीम इस मुहिम में जुट गयी। इतिहास के पन्ने खोले गये। पता लगाया गया कि जिस्म को लेकर हिट हुईं सेक्सी बिपाशा ने आइटम सांग के लिए कितने पैसे लिये थे… बेबो ने कितने और जहरीली मल्लिका ने अपने-अपने दौर में “मुन्नी” बनने के लिए कितने पैसे लिये थे! फिर बताया गया कि बाजार गर्म है और तीस मिनट के लिए इतने पैसे मिले तो किसी को भी “मुन्नी” बन जाना चाहिए। लेकिन “मुन्नी” बनने से इनकार करके देसी गर्ल और शीला ने कमाल कर दिया। पूरा प्रोग्राम देखने पर बार-बार यही लग रहा था कि इतने पैसे मिले तो आजतक में कोई भी “मुन्नी” बन जाए!
ये तो हुई आजतक की बात। स्टार न्यूज तो इससे भी आगे निकल गया। उसके खोजी पत्रकार यह भी ढूंढ लाये कि एक घंटे के लिए देश के खरबपतियों को कितने पैसे मिलते हैं। ग्राफिक के जरिये एक शानदार तराजू बनाया, जिसमें एक तरफ “मुन्नी” को बिठाया और फिर मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी, जिंदल से लेकर कई अरबपतियों को तोल दिया। सारे के सारे “मुन्नी” के आगे पानी भरते नजर आये। किसी की भी इतनी औकात नहीं थी कि वो प्रति घंटा कमाई के मामले में “मुन्नी” का मुकाबला कर सकें। यहां तो उनसे यही कहने को जी कर रहा है कि ससुरे एक बार अपने मालिकों और संपादकों को भी उसी तराजू में तोल देते तो स्टोरी और दमदार हो जाती। दुनिया को भी पता चल जाता कि “मुन्नी” के आगे उनके मालिकों और संपादकों की क्या औकात है!
बहरहाल … “मुन्नी” हिट है। शीला सुपरहिट है। और अगले कुछ हफ्तों-महीनों तक आजतक और स्टार न्यूज सरीखे टेलीविजन न्यूज चैनलों पर “मुन्नी” का मुजरा और शीला की जवानी कई नये गुल खिलाने वाली है। ऐसे में देश के चौथे स्तंभ की इस बदहाली पर आंसू बहाएं, चैनलों के “फ्रस्टुआये” और “कमीने” पत्रकारों पर तरस खाएं, या फिर उनकी रचनात्मकता का लुत्फ उठाएं… ये फैसला तो आपको करना है....{आभार-मोहल्ला लाइव}

मौत पर तमाशा...


                                                                              अपराध से जुडी खबरे करते-करते मैंने अक्सर ये पाया की लोगो   को अब हादसे के बाद हल्ला मचाने में काफी मजा आता है....हादसे में कोई घायल हो जाये या फिर किसी की मौत,तमाशाई बिना कुछ सोचे समझे वो सब कुछ करते है जो इन्सान की परेशानी का कारण बन जाता है...सड़क हादसे के बाद जो मौके पर स्थिति बनती है वो देखने लायक होती है...हादसे में किसी की जान चली गई तो लोग सारा काम छोड़कर मौके पर गति अवरोधक बनाने से लेकर उचित मुआवजे की मांग करने लगते है और सड़क पर जाम लगा दिया जाता है....कभी-कभी भीड़ में ज्यादा उत्साही या यूँ कहे की शरारती तत्वों की उकसाऊ प्रवित्ति वाहनों में आग लगने की वजह भी बन जाती है...मौके पर लाश घंटो तमाशाइयो की वजह से अंतिम क्रिया-कर्म के लिए उन पुलिस वालो की कार्यवाही का इन्तेजार करते पड़ी रहती है जो खुद एसडीम,तहसीलदार जैसे सरकारी नौकरों का इंतजार करते तमाशाइयो का तमाशा देखती है.... मूक दर्शक की तरह खड़ी पुलिस हर परिस्थिति से निपटने तैयार दिखती है,लेकिन मौके पर होता तमाशा उनकी लाचारी को छिपा नही पता...ये तो हुआ हादसे के बाद पुलिस और उग्र भीड़ का अक्सर दिखाई पड़ने वाला किस्सा...अब मै अपने उस अनुभव को बता रहा हू जिससे अक्सर मेरा पाला पड़ता रहा है...हादसा हुआ,हादसे में किसी की मौत हो गई,उसके बाद सैकड़ो लोग सारा काम-धाम छोड़कर मौके पर प्रदर्शन के लिए जुट गए लेकिन उस भीड़ में करीब-करीब ९० फीसदी लोग नही जानते मरने वाला कौन था,क्या करता था और कहाँ का रहने वाला था...लोग एक दुसरे को देखकर आवाज बुलंद करते है...बात कल {३ दिसंबर}ही की तो है,बिलासपुर के तोरवा थानाक्षेत्र के महमंद बाइपास से थोडा आगे एक ट्रेलर ने राह चलते बुजुर्ग को इस कदर रौंद दिया था कि उसे पहचान पाना आसान नही था...मरने वाले के कुछ जान-पहचान वाले उसके पीछे-पीछे चल रहे थे,इस वजह से मरने वाले की शिनाखत्गी में ज्यादा वक्त नही लगा.... ट्रेलर के पिछले चक्के में बुरी तरह से फंसकर अकाल मौत के मुंह में समाये उस बुजुर्ग का नाम जीवराखन था...ग्राम धूमा का रहने वाला जीवराखन सब्जी बेंचकर आजीविका चला रहा था....हमेशा की तरह मौत के बाद मौके पर मुआवजा,सड़क निर्माण और कई मांगो का मुह्जुबानी पुलिंदा लिए लोगो की भीड़ जमा हो गई...हर कोई जीवराखन की मौत के बाद जागा नजर आया,सबको लगा अब ये रास्ता बड़े वाहनों के लिए बंद होना चाहिए...गाँव के जिस रास्ते पर बड़े-बड़े वाहनों के आवागमन का सिलसिला बेरोक-टोक जारी है वो पास ही एक बड़े आदमी की फेक्ट्री तक जाता है....इस वजह से कुछ{नेता टाइप} दबी जुबान,तो कुछ दुसरो से बुलवाना चाह रहे थे ताकि रास्ता भी बंद ना हो और फैक्ट्री मालिक से व्यव्हार भी बना रहे...खैर,हादसे की खबर पुलिस को लगी वो मौके पर पहुंचकर लोगो को शांत करवाने में जुट गई,हालाँकि पुलिस नाराज लोगो को शांत करवाने में नाकाम ही रही... पुलिस के कुछ अधिकारी गुस्साई भीड़ को तरह-तरह का झांसा देकर मामला शांत कराने की जद्दोजहद कर ही रहे थे कि अचानक भीड़ के बीच से आवाज आई "क्या बात करते हो साहेब हम जैसे ही सड़क से हटेंगे आप हमारी मांगे तो दूर हमको पहचानने से भी इंकार कर दोगे"....मतलब  लोग जान चुके है कि जो कुछ होगा मौके पर ही होगा...इधर पुलिस भी जानती थी कि जब तक प्रसाशन का कोई नुमाइंदा नही आएगा तब तक बात नही बनने वाली ना लोग शांत होने वाले....हादसे की खबर सुनकर कुछ पुलिस वाले सुबह से आये थे,शायद इसीलिए भूखा गए थे बेचारे....पास के एक छोटे से ठेले में भजिया,समोसा देखकर पुलिस वाले वही लपक लिए...उन्होंने सोचा मरने वाला मर गया,तमाशा करने वाले जब तक बड़े साहेब नही आएँगे तब तक शांत नही होंगे तो क्यों ना पेट पूजा कर ली जाये...इधर लोग सड़क जाम कर पास की एक गुमटी को तोड़कर आग लगाते रहे,कुछ सड़क पर खड़े होकर हंगामा मचाने वालो की हाँ में हाँ मिलाते रहे और ट्रेलर के पहिये के नीचे दबी जीवराखन की लाश करीब सात घंटे तक अंतिम क्रिया-कर्म का इन्तेजार करती रही............

Wednesday, December 1, 2010

याद रहेंगे राजीव भाई...






    मै जिनके बारे में लिखने की कोशिश कर रहा हूँ उनसे मेरी मुलाकात यू कहूँ की जान पहचान केवल पौन घंटे की है...कम वक्त की मुलाकात याद बन जाएगी नही जानता था....मंगलवार{३०नवम्बर}की दोपहर जो खबर मेरे कानो तक आई वो विश्वाश करने लायक नही थी.लेकिन उसके आगे {भगवान}किसकी चलती है....जितना मैंने जाना,उनको जानने वालो से पुछा उस लिहाज से  स्वदेशी जागरण के प्रणेता  राजीव दीक्षित ने अंतिम सांस तक विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध किया....मृत्यु के छह घंटे पहले तक डाक्टरों ने उन्हें एलोपैथी दवाएं लेने की सलाह दी लेकिन उन्होंनअपनी जान की परवाह न करते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दवाई खाने से इनकार कर दिया.....पेशे से इंजीनियर दीक्षित को सोमवार २९ नवंबर  की शाम 4.30 बजे सीने में दर्द हुआ... वे बेमेतरा से दुर्ग आ रहे थे ...दुर्ग पहुंचने पर दर्द बढ़ने से उनके सहयोगी कार्यकर्ताओं ने जिद करके उन्हें शाम 6.30 बजे बीएसपी के सेक्टर नौ हास्पिटल में दाखिल कराया...वहां डाक्टरों ने इसे हार्टअटैक का केस बताया.... तब भी राजीव दीक्षित ने होम्योपैथी दवा को प्राथमिकता दी....लगभग 10 बजे बाबा रामदेव ने दीक्षित से बात की..... उन्होंने नई दिल्ली के मेदांता मेडिसिटी के चीफ कार्डियोलाजिस्ट डा. प्रवीण चंद्र से बीएसपी हास्पिटल के डाक्टरों से बात कराई... इसके बाद दीक्षित को एक इंजेक्शन लगाया गया.... इससे उन्हें थोड़ी राहत मिली...दिल्ली के डा. प्रवीण चंद्र ने एंजियोग्राफी की सलाह दी....बाबा रामदेव ने फिर फोन पर उन्हें एंजियोग्राफी कराने का आग्रह किया, लेकिन बीएसपी हास्पिटल में यह सुविधा नहीं थी, इसलिए उन्हें रात 11 बजे भिलाई के अपोलो बीएसआर हास्पिटल ले जाया गया....वहां दो घंटे इलाज के बाद उन्होंने अंतिम सांस ली....ये खबर मेरे लिए सदमे से कम नही थी,सदमा इसलिए की मैंने एक दिन पहले ही रविवार २८ नवंबर  को राजीव भाई को पंडित देवकीनंदन दीक्षित सभा भवन में करीब से देखा और उनके विचारो को देर तक सुना...मुझे अपने चैनल के लिए खबर करना थी  इस वजह से राजीव जी को करीब से देखने,सुनने का मौका मिल गया....राजीव जी की आकस्मिक निधन की खबर उड़ते-उड़ते मेरे कानो तक आई तो मुझे एक बारगी यकीन नही हुआ,भिलाई में मेरा कोई परिचित नही था...इस वजह से जानकारी इकठ्ठी करने में परेशानी उठानी पड़ी...रायपुर के एक मित्र से पता करने पर राजीव जी के बारे में बहुत कुछ मालूम हो गया....राजीव दीक्षित का जन्म 1 दिसंबर 1966 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के एटा गांव में हुआ... उनके पिता राधेश्याम दीक्षित ब्लाक डेवलपमेंट आफिसर थे...राजीव दीक्षित आम लोगों के जीवन से जुड़ी बातों पर जोर देते थे... रायपुर के एक व्याख्यान में उन्होंने कहा था कि स्वदेशी तो एक पूरी जीवन शैली है, यह तो भारत की सभ्यता का आधार है... इसका आर्थिक पक्ष तो इसका छोटा पहलू है... सिर्फ स्वदेशी वस्तुएं खरीदने से ही स्वदेशी का पालन नहीं होता...हमारे जीवन के आचार-विचार, भाषा, भूषा, भोजन ये सभी स्वदेशी हों, तभी वह पूर्ण होता है...हम स्वदेशी भाषा बोलें, स्वदेशी वेशभूषा पहनें, स्वदेशी भोजन करें, स्थानीय औषधियों का उपयोग करें...उन्होंने अंतिम समय तक इसका पालन किया....1984 में भोपाल गैस कांड के दो साल बाद इलाहाबाद में एक संगोष्ठी हुई, जिसमें आजादी बचाओ आंदोलन की नींव रखी गई ...राजीव दीक्षित उसमें एक सदस्य थे....1988 से 1991 तक राजीव  दीक्षित ने मल्टीनेशनल कंपनियों के बारे में गहन अध्ययन किया.... इसके बाद वर्धा में आजादी बचाओ आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा किया गया... वर्धा में इसके लिए सात सदस्यीय संयोजन समिति बनी..... दीक्षित ने मल्टीनेशनल कंपनियों की जीरो टेक्नालाजी का मुखर विरोध किया... उन्होंने वैट, डब्ल्यूटीओ पर हस्ताक्षर और खड़े नमक पर प्रतिबंध लगाने का विरोध किया... 2005 में वे बाबा रामदेव के  संपर्क में आए..राजीव की भारत स्वाभिमान यात्रा अनवरत जारी रहेगी,बस उस यात्रा में अब नही दिखाई देंगे  राजीव.... 

Sunday, November 28, 2010

"कंगाल निगम" करोडपति इंजीनियर...

राजकिशोर नगर स्थित माणिक का निवास
करोड़ो का असामी इंजिनीयर माणिक 
बैंक सा सील लाकॉर जिससे ४० तोला सोने के जेवरात मिले
 वैसे तो नगर निगम की माली हालत काफी ख़राब है...कर्मचारियों को बाँटने के लिए रूपये नही है...शहर का  विकास भी तभी संभव होगा जब निगम के पास पर्याप्त राशि हो....इन दो लाइनों को पढ़कर आप भी निगम की खस्ताहाल स्थिति का आंकलन कर सकते है..."कंगाल"... जी हाँ...अगर मै ये कहू की नगर निगम कंगाल है और कंगाल निगम का कर्मचारी करोडपति है तो शायद आपको आश्चर्य हो सकता है...पर इस सच को जानकर आप और भी आश्चर्य करेगे की नगर निगम का केवल एक सब इंजीनियर ही करोडो का आसामी है...२५ नवंबर को एंटी करप्शन ब्यूरो की टीम ने सब इंजीनियर चंद्रकांत माणिक के राजकिशोर नगर स्थित आवास पर छापा मारकर करीब  साढ़े तीन  करोड़ की अघोषित संम्पति  का खुलासा किया है...सब इंजीनियर ने शहर में लाखो रूपये कीमत का आलीशान घर बनवाया,लाखो के जेवरात,कई जगह जमीन और ना जाने क्या-क्या....माणिक तो एक छोटा सा प्यादा है...इससे बड़े-बड़े मगरमच्छ है जिन्होंने नगर निगम के खजाने को अपने बाप की बपोती  समझ ली है....जनता के रुपयों से आलीशान  घर,जेवरात और ना जाने क्या-क्या बनवाने वालो की एशोअराम  भरी जिन्दगी वास्तव में देखने लायक होती है....निगम का एक बड़ा वर्ग मेहनत के बदले महीने की पगार पाने कई बार इन्ही की चोखट पर दस्तक देता है...महीने भर मेहनत करने वाले को निगम का खजाना फ़िलहाल खाली होने का बहाना कर लौटा दिया जाता है..  ऐसे कई मामले है जो साबित करते है कि नगर निगम कितनी फकीर हो चली है ? सरकार है की मदद के नाम पर कुछ करती नही,ऐसे सवालो में उलझे लोगो के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा मारते है माणिक जैसे लोग...पिछले छः-सात बरस में निगम कंगाल हो गया,विकास के नाम पर आई रकम ऊपर से लेकर नीचे तक, ओहदे के हिसाब से बाँट ली गई...शहर विकास की पूंजी भ्रष्ट अफसरों के विकास और उनके परिवार के एशोआराम पर खर्च हो गई...शहर गर्दो-गुबार की धुंधली चादर से ढका है,लोग गड्ढो में गिरकर अस्पताल के बिस्तर पर कराह रहे है,गन्दी और जाम पड़ी नालियां संक्रामक बीमारिया परोस रही है और भ्रष्टाचार के पेड़ पर अमरबेल की तरह लिपटे अफसर करोडो के मालिक बने बैठे है....एंटी करप्शन ब्यूरो ने निगम के एक प्यादे के गिरेबान को पकड़ा तो करोडो की चल-अचल संपत्ति बेनकाब हो गई...बिलासपुर नगर निगम में कई ऐसी भ्रष्टाचार की मजबूत शाखे   है जो एक विशाल पेड़ की शक्ल ले चुके है... वैसे कुछ अफसरान मलाई चाटकर प्रदेश की दूसरी जगह नए सिरे से जनता और सरकारी रूपये  अपने खातो में जमा करने की बुनियाद तैयार कर रहे है....
                                  नगरनिगमों में कई माणिक है जिन्हें  सरकार और जनता के खून-पसीने की कमाई  बिना डकार लिए हजम करने  की आदत पड़ चुकी है....जनता विकास की बाट जोह रही है,जोहती रहे...निगम के कर्मचारी मेहनत का वाजिब हक़ लेने भटक रहे है,भटकते रहें...खैर एंटी करप्शन के अधिकारियो ने चद्रकांत माणिक के यहाँ मिले जेवरात,नगद रकम  कोषालय में जमा करवा दिया है...माणिक जैसे भ्रष्ट कई सरकारी अफसरों की वैसे तो सही जगह जेल की चारदिवारी है लेकिन भारत में अब तक  करोड़ो डकारने वाले कितने बेईमान जेल गए अपने आप में बड़ा सवाल है.......

Wednesday, November 24, 2010

विकास की जीत


मैं करीब १२ साल पहले बिहार गया था...रांची में मेरे मामाजी रहते है...उस वक्त रांची बिहार का हिस्सा था...बाद में रांची बिहार से अलग होकर झारखण्ड की राजधानी बन गया...पर मै उस रांची शहर में चार दिनों तक रहा, जहाँ लालू राज था.....पत्रकारिता के मैदान का एकदम नया खिलाडी था,इस वजह से कुछ ज्यादा जानने,समझने की ललक थी....मैंने बिहार के उस रांची शहर को देखा था जहाँ लालू यादव की तूती बोलती थी....थोडा अँधेरा होते ही सड़क पर चलने वालो की जात और नियत बदली-बदली नजर आने लगती थी...सड़क के नाम पर गर्दो गुबार और गड्ढो का जाल बिछा नजर आता था....भय,आतंक,भ्रष्टाचार की सरकार {लालू}मानने को तैयार नही थी की बिहार विकास की बाट जोह रहा है...मै यहाँ-वहां घूमकर वापस बिलासपुर लौट आया...उसके बाद फिर कभी ना रांची जाना हुआ,ना बिहार के किसी शहर...हाल ही में बिहार में विधानसभा के चुनाव हुए,इस दौरान टीवी पर बिहार के बारे में काफी कुछ देखा,अखबारों में पढा...जैसा देखा,सुना काश मैं कह पाता कि नीतीश के बिहार में सब कुछ बदल चुका है और बिहार भी शाइनिंग इंडिया की चमक से दमक रहा है....परेशानियां अभी भी है,लोगों की शिकायतें भी है लेकिन काफी कुछ नया भी था जिसे जनता टीवी पर बिना "ललुआ" के डरे कह रही थी...मैंने इस चुनावी घमासान में लोगो,राजनेताओ और समीक्षकों को जितना सुना उस लिहाज से अर्थव्यवस्था तरक्की के संकेत दे रही थी.... हर दूसरा व्यक्ति कानून व्यवस्था को खरी खोटी सुनाता हुआ या अपहरण उद्दोग की बात करता नहीं सुनाई दिया.......लोगो ने खुलकर कहा अब हमारे घर की बहू,बेटिया रात के नौ-दस बजे रात तक खड़े होकर चोपाटी पर आराम से गोल्ग़पे और चाट खाती है....मतलब नितीश ने कुछ तो ऐसा किया था जिसको लोग खुलकर बताना चाहते थे....मौका भी था,जनता के पाले में एक बार फिर गेंद थी....चुनावी पिच पर लालू,नितीश की पार्टी बैटिंग के तैयार थी .....छह चरण में चुनाव बिना किसी बड़ी हिंसक वारदात के सम्पन्न हुए और आज{२४ नवम्बर}मै सुबह से ही टीवी ऑन कर नतीजे जानने बैठ गया...करीब दो घंटे के बाद बिहार की जनता जनार्दन का जनादेश देश के सामने था...नितीश की विकास आंधी लालू,पासवान को उड़ा ले गई....राबड़ी,साधू का पता-ठिकाना ही नही लगा....दावे और लालू का यशगान करने वाले औंधे मुह गिर गए....जब बिहार में विकास की  हवा चलने का नतीजा सामने आया तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को भी कहना पड़ गया की बिहार से ज्यादा उम्मीदे नही थी,नतीजे बत्ताते है की कांग्रेस को बिहार में नए सिरे से कोशिशे करनी होंगी....तीन चौथाई बहुमत लेकर नितीश ने साफ कर दिया की जनता विकास चाहती है,जो जनता की उम्मीदों पर खरा उतरेगा वोट उसी को मिलेगा...पिछले पांच साल में इतना तो वक्त बदला की लोग अब  मरीज़ों को देखने घर से बाहर निकल सकते है... उन्हें अब ये डर नहीं रहेगा कि निकलते ही कोई उन्हे अगवा कर लेगा...किसान अब खेती में पैसा लगाने से झिझकेगे नहीं क्योंकि बेहतर सड़क और बेहतर क़ानून व्यवस्था अच्छे बाज़ारों तक उसकी पहुंच बढ़ाएगी.....चारो ओर नितीश के जयकारे लगने लगे,दूसरी ओर ललुआ राबड़ी के साथ ये कहने को मजबूर हो गया की बिहार में आलू भरा समोसा तो मिलेगा लेकिन अब ना लालू होगा,ना और राबड़ी ना साधू की चलेगी....  
इस बार बिहारियों के लिए दांव पर थी उम्मीद, उम्मीद कि शायद अब बिहार का राजनीतिक व्याकरण उनकी जात नहीं विकास के मुद्दे तय करेगी, उम्मीद इस बात की भी कि बिहारी होने का मतलब सिर्फ़ भाड़े का मजदूर बनना नहीं रहेगा, उम्मीद कि भारत ही नहीं दुनिया के किसी भी कोने में बिहारी कहलाना अब मान की बात होगी...........

Friday, November 19, 2010

पुण्यतिथि और आदिवासी

बरों के इर्द-गिर्द घूमती जिन्दगी को हर दिन कुछ नया करने,सीखने और जानने की आदत पड़ चुकी है .....पिछले सोमवार को मालूम हुआ की मंगलवार {16 navmbar 2010} को  जिले की सबसे चर्चित विधानसभा मरवाही के बदरोदी गांव में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और अविभाजित मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह आ रहे है...."दिग्गी राजा" स्वर्गीय भवर सिंह पोर्ते जो की आदिवासियों के बड़े नेता रहे है उन्हें श्रधासुमन अर्पित करने पहुचेंगे .....राज्य गठन के बाद या यूँ कहू की करीब एक दशक बाद "दिग्गी राजा"को कव्हर करने का मौका मिल रहा था....मैंने अपने दफ्तर में जिम्मेदार व्यक्ति से बातचीत करने के बाद शहर से १८० किलोमीटर दूर ग्राम बदरोदी पहुँचने का कार्यक्रम बनाया.....उम्र और तजुर्बे के साथ-साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में काफी अनुभवी कमल दुबे जी{मेरे बड़े भाई,सगे नही लेकिन सगे भाई से बढकर} के साथ मै मंगलवार की सुबह "दिग्गी राजा" को कव्हर करने उन्ही की कार में मरवाही के लिए निकल पड़ा.....दुबेजी को दूरदर्शन के अलावा कुछ और राष्ट्रीय चैनलों को ये खबर देनी थी,इस कारण सफ़र और दिनों की तुलना में कुछ अलग सा था....कुछ  परेशानियों को पार कर जब हमने पेंड्रा पहुंचकर "दिग्गी राजा" का लोकेशन लिया तो पता चला की वे कुछ ही देर बाद वापस दिल्ली के लिए निकल जायेंगे........सफ़र अभी करीब ३० किलोमीटर का बाकी था,मंजिल काफी दूर लग रही थी, जिस मार्ग {सिवनी}से कार्यक्रम स्थल तक पहुंचना था उस पर ठीक से पैदल चलना भी दूभर था लेकिन दुबेजी की हिम्मत के आगे मानो वक्त ठहर सा गया था...... दुर्गम रास्ते पर उछलती-कूदती कार में जब हम गाँव पहुंचे  तो पेड़ पर लगे  लाउडस्पीकर से आती आवाज सुनकर हम दोनों की जान में जान आई...सामने बने मंच से सांसद चरणदास महंत स्व.पोर्ते के विषय में बोल रहे थे....स्वर्गीय भंवर सिंह की १७ वीं पुण्यतिथि पर केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया और उनके बड़े भाई दिलीप सिंह भूरिया ने भी उनके योगदान और राजनीतिक पृष्ठभूमि का बखान किया.....दिग्गज नेतावो की भीड़ में क्षेत्र के विधायक और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी कही नजर नही आ रहे थे....मंच पर मौजूद जोगी के सुपुत्र अमित जोगी ने बताया की स्वस्थ्गत कारणों से उनके पिता{अजीत जोगी} को केरल जाना पड़ गया है....खैर तमाम लोगो को सुनने के बाद जब बारी दिग्विजय सिंह की आई तो मै मंच के पीछे से हटकर सामने की ओर आकर खड़ा हो गया....सबसे पहले "दिग्गी" चिर-परचित अंदाज में मुस्कुराये फिर कहा छत्तीसगढ़ से उन्हें काफी प्यार-दुलार मिला.....शायद दिग्गी राजा विद्याचरण शुक्ल के घर{राज्य गठन के तुरंत बाद रायपुर में झुमा झटकी} मिली इज्जत को अब तक नही भूल पाए थे.... दिग्गी की बातो को सुनकर भोले-भाले आदिवासियों ने मंच के पास से आये इशारे को देख तालिया भी बजा दी....सबसे पहले दिग्गी ने स्वर्गीय भवर सिंह पोर्ते को श्रधांजलि दी,इसके बाद उनसे अपने रिश्तो की प्रगाढ़ता का जमकर बखान किया.....स्वर्गीय पोर्ते को अपना बड़ा भाई बताने वाले कांग्रेस महासचिव ने ये भी कहा की स्व.पोर्ते के साथ कांग्रेस में अन्याय हुआ था....दिग्गी राजा ने कहा आदिवासियों की पीड़ा,उनकी जरूरत को उन्होंने  स्व. पोर्ते से ही सीखा है...स्व.पोर्ते से पारिवारिक रिश्तो की मिसाल देते-देते दिग्गी राजा राजनैतिक बयानबाजी पर उतर आए...उन्होंने कांग्रेस पार्टी को आदिवासियों की पीड़ा समझने वाली पार्टी बताया,दिग्गी ने कहा नेहरू,इंदिरा के बाद किसी ने आदिवासियों की पीड़ा और जरुरत को समझा है तो वो है सोनिया और राहुल गाँधी...सोनिया गाँधी ने वन अधिकार कानून बनवाया, वही उद्योगों की मार से हमेशा प्रभावित होने वाले आदिवासियों के लिए कई और जरुरी  कानून बनाये गए है....दिग्गी ने आदिवासियों की वकालत करते-करते ये भी कह दिया की जिन जगहों पर खनिज कंपनिया उद्योग खोलेगी वहाँ प्रभावित होने वाले आदिवासियों को खनिज का बाजार मूल्य का एक हिस्सा देना होगा,साथ ही प्रभावित आदिवासी को ३५ बरस तक १५ से ३५ हजार रूपये प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवजा भी देना पड़ेगा....इस बयान पर भोले आदिवासियों की बांछे कुछ देर के लिए जरुर खिल उठी लेकिन आदिवासियों के हिमायती बन रहे दिग्गी राजा शायद  भूल गए की अविभाजित और विभाजित मध्यप्रदेश की सियासत पर १० बरस तक उन्होंने भी राज किया है....इस देश में सर्वाधिक वक्त तक सियासी कुर्सी उन्ही की पार्टी {नेहरू,इंदिरा,सोनिया}के पास रही...फिर क्यों आदिवासी आज भी नंगे,भूखे और बुनियादी जरुरतो के मोहताज है ? खुद को आदिवासियों का रहनुमा बताने वालो को आधी सदी बीत जाने के बाद भी उस व्यक्ति का ख्याल नही रहा जिसकी वकालत वे अक्सर सियासी मंच से करते रहे है....पुण्यतिथि के बहाने खुद को आदिवासियों का शुभ-चिन्तक बताने वाले राजा बाबु ने भले ही किसी को एहसास ना होने दिया हो लेकिन वो जोगी विरोधी खेमे के लिए बंजर हो चुकी सियासी जमीन को सींचने आये थे...जोगी विरोधी खेमे की बात करे या फिर काग्रेस को नमस्ते कर चुकी हेमवंत पोर्ते की....कही ना कही जोगी के किले में सेंधमारी की कोशिश बड़े ही सुनियोजित तरीके से की गई....दिग्गी बाबु के बारे में कम ही लोग जानते है की वो मृदुभाषी और विनम्र सियासी जमात के लोगो में खासी पैठ रखते है....कुछ पीड़ा,कुछ सवाल मेरे जहन में कौधने लगे...मैंने अपने आप से सवाल किया  दिग्गी बाबु १० साल तक मुख्यमंत्री रहते आपने कितने आदिवासी गांवो को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा ?आप तो उस समय भी सीएम थे जब छत्तीसगढ़ अलग राज्य नही बना था, उस वक्त कितने आदिवासियों की जरुरतो का आपने ख्याल रखा ? अरे भोले भाले आदिवासी तो बरसो से अपने हित संवर्धन की बाते सुनते आये है परन्तु आदिवासियों का विकास नही हुआ,वो तो आज भी जमीन पर बैठकर सुनहरे भविष्य के सपने देख रहे है...
                                                                                                        सियासी मंच के जरिये,पुण्यतिथि के बहाने एक बार फिर आदिवासी याद आये ....भाषण खत्म हुआ तो दिग्गी,भूरिया और महंत के अलावा कुछ और नेताओ ने बंद कमरे में साथ बैठकर खाना खाया......खाने के बाद कुछ लोगो से भेंट मुलाकात की कोरी ओपचारिकता पूरी करते-करते दिग्गी राजा हेलीपेड पहुँच गए...चारो ओर सुनहरे भविष्य के सपने संजोये आदिवासी अपने कथित रहनुमा को जाते देख रहे थे....कुछ ही देर में आदिवासियों का रहनुमा आकाश की उचाइयो को छूने लगा और जमीन पर खड़े आदिवासी सिर उठाये विकास की बारिस का इंतजार करने लगे........

असल भारत "पीपली लाइव"में...


१३अगस्त को "पीपली लाइव" रिलीज हुई, मैंने फिल्म का प्रोमो देखा और लोगो की जुबानी काफी कुछ सुना....कुछ लोगो को फिल्म अच्छी लगी,कुछ ने इंटरवल के पहले ही टॉकीज से वापसी कर ली...."महंगाई डायन" को देखने की कई बार इच्छा हुई लेकिन वक्त की बेवफाई हमेशा मेरे पीछे साये की तरह होती....काम की वयस्तता कहे या फिल्म के लिए अलग से मुहूर्त नही निकाल पाया... आख़िरकार कुछ दिनों बाद "महंगाई डायन"परदे से उतर गई....पूरे तीन महीने सात दिन बाद {१९नव्म्बर} मै बिना काम के दफ्तर में बैठा था,कोई ऐसा था नही जिससे बातचीत करता मै तत्काल पड़ोस की सीडी दुकान पर गया और कुछ घंटे की उधारी पर "नत्था" को ले आया.....अपने लैपटॉप पर ही मैंने बड़े परदे का मजा लेने की कोशिश की.....'पीपली लाइव' को देखकर लगा जैसे वो  पत्रकारिता पर चोट करती है, फिर लगा है कि शायद अफ़सरशाही इसके निशाने पर है या फिर राजनीति....सच कहू तो यह फ़िल्म पूरी व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है........ऐसी व्यवस्था जिसके पास मरे हुए किसान के लिए तो योजना है लेकिन उसके लिए नहीं जो जीना चाहता है.......ये उन पत्रकारों पर तमाचा है जो लाइव आत्महत्या में रुचि रखते हैं ,तिल-तिल कर हर रोज़ मरने वाले में नहीं..........फ़िल्म न तो नत्था किसान के बारे में है और न ही किसानों की आत्महत्या के बारे में. ये कहानी है उस भारत की जहां इंडिया की चमक फीकी ही नहीं पड़ी है बल्कि ख़त्म हो गई है....उस भारत की जो पहले खेतों में हल जोतकर इंडिया का पेट भरता था और अब शहरों में कुदाल चलाकर उसी इंडिया के लिए आलीशान अट्टालिकाएं बना रहा है...फिल्म में जहां तक नत्था के मरने का सवाल है जिसे केंद्र में रख कर आमिर ख़ान ने पूरा प्रचार अभियान चलाया है,उसके बारे में इतना ही कहूंगा कि नत्था मरता नहीं है उसके अंदर का किसान ज़रुर मरता है जो आज हर भारतीय किसान के "घर-घर की कहानी"बन चुकी है.......अनुषा रिजवी निश्चित रूप से बधाई की पात्र हैं जो उन्होंने ऐसे मुद्दे पर फ़िल्म बनाई. अंग्रेज़ी में जिसे ब्लैक ह्यूमर कहते हैं...उसकी भरमार है और यही इसकी थोड़ी कमज़ोर स्क्रिप्ट का अहसास नहीं होने देती.......यह फ़िल्म एक बार फिर इस बात का अहसास दिलाती है कि हम कैसे भारत में रह रहे हैं. वो भारत जो न तो हमारे टीवी चैनलों पर दिखता है और न ही हमारे नेताओं की योजनाओं में...
                                         मुद्दा ग़रीबी नहीं है...मुद्दा जीने का है..चाहे वो मिट्टी खोदकर हो या मर कर. क्या फ़र्क पड़ता है गांव की मिट्टी खोद कर मरें या कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए मिट्टी खोदते-खोदते ........फ़िल्म को अंतरराष्ट्रीय सर्किट में पसंद किया जा रहा है और किया जाएगा. हो सकता है लोग कहें कि इसमें भारत की ग़रीबी को ही दिखाया गया (जैसा कि स्लमडॉग मिलियनेयर के बारे में कहा गया था) मैं तो यही कहूंगा कि यही सच्चाई है........पत्रकार, अफ़सर और राजनेता ये फ़िल्म ज़रुर देखें और अपनी कवरेज योजना और व्यवहार में थोड़ी सी जगह इस असली भारत को दें तो शायद अच्छा होगा.

Wednesday, November 17, 2010

शादी की उम्र

मै ये मानता हू की बदलते वक्त के साथ युवा वर्ग की सोच में भी बदलाव आया है खासकर शादी के मामले को लेकर....आज शादी की उम्र और उसके बारे में युवावो की राय बिलकुल ही भिन्न है,हालांकि दो दशक पहले यह उम्र सीमा और भी कम थी। अगर आजादी के पहले की बात करें तो उस समय हमारे यहां बाल-विवाह की प्रथा थी। आज भी कई इलाकों में यह प्रथा विद्यमान है। ऐसे में तमाम लोगों को बड़ी उम्र में शादी की बात सुनना अटपटा-सा जरूर लगता हैं। लेकिन समाज का एक वर्ग बड़ी उम्र में शादी को स्वीकार रहा है। लोग 30-35 की उम्र में शादी को आम मानने लगे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि बड़ी उम्र में शादी करनी उनकी मजबूरी है या शौक। शहरी परिवेश में बड़ी उम्र में शादी करना लोगों का शौक तो नहीं कह सकते बल्कि समय के बदलने के साथ लोगों की सोच में भी बदलाव आया है।
कुछ लोग पढ़ाई के बाद अपने कैरियर पर पूरा ध्यान देते है। ऐसे में कुछ कर दिखाने की होड़ में शादी के बारे में सोचने का भी वक्त नहीं होता। यह वर्ग अपने व्यवसाय और सामाजिक गतिविधियां में इतना व्यस्त है कि उनके पास विवाह के लिए सोचने के लिए समय ही नहीं है। शादी करना न करना हर किसी का व्यक्तिगत फैसला हो सकता है। आज के परिवेश में शादी की सही उम्र बताना बहुत कठिन है। युवावर्ग के पास करियर बनाने की आपाधापी में विवाह के लिए सोचने का वक्त ही नहीं बचता।
आज के युवा शादी के बंधन में बंधने से डरते भी हैं। लड़कों की मानसिकता यह होती है कि अभी ऐश-मौज कर लें, फिर पूरी जिदंगी तो पारिवारिक बंधन में बंधना ही है। वहीं लड़कियां इस बात से डरती है कि उन्हें नए घर में जाना है, पता नहीं वहां का माहौल कैसा होगा। लड़के एवं लड़कियां दोनों ही इसके चलते लम्बी उम्र तक शादी नहीं करना चाहते। वे अपने को किसी बंधन में डालने से कतराते हैं। लड़कियों के लिए शादी का मसला उनके  करियर से भी जुड़ा होता है। वे आशंकित होती हैं कि ससुराल वाले पता नहीं किस सोच के होंगे। कहीं शादी के बाद मुश्किल से मिली जॉब छोड़नी न पड़े।
आज की युवा पीढ़ी पढ़ी-लिखी है। वह अपने जीवन से जुड़े निर्णय खुद लेने लगी है। इसमें अपने साथी का चुनाव भी शामिल है। इसी के चलते लिव-इन-रिलेशनशिप का नया चलन चला है। लोग अपने जीवन साथी का चुनाव खुद करते हैं। इसमें अपने साथी को सोचने-समझने के लिए वक्त मिल जाता है। यह एकदम शादी जैसा ही है। इसमें दोनों एक साथ ही रहते है, बस शादी के बंधन में बंधना नहीं चाहते। साथ रहने के दौरान यदि उन्हें लगता है कि हमारी जिदंगी एक-दूसरे के साथ गुजर सकती है तो फिर वे शादी कर लेते हैं।
युवावर्ग को समझना होगा कि करियर के बारे में सोचना अच्छी बात है लेकिन शादी में देरी से कई परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। देर से शादी से जहां पुरूष में पिता बनने की क्षमता में कमी होती दिख रही है वहीं महिलाओं को भी मां बनने में परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं। शादी के बाद पुरूष तथा महिलाओ में शारीरिक बदलाव आता है। लेकिन बड़ी उम्र में शादी करने से शरीर को इन बदलावों से तालमेल बिठाने में दिक्कत होती है। शादी की कामयाबी का एक अहम तत्व पति-पत्नी के बीच का तालमेल भी होता है। लेकिन अधिक उम्र में शादी करने के बाद पार्टनर से तालमेल बिठाना आसान नहीं होता क्योंकि बढ़ती उम्र में अपनी सोच में बदलाव लाना काफी कठिन होता है।
समाज में हमेशा से बदलाव होता रहा है। आज आर्थिक युग में युवावर्ग के लिए करियर सर्वोच्च प्राथमिकता है। जिसके चलते शादी की उम्र का बढ़ना लाजमी है। ऐसे में मां-बाप को भी चाहिए कि उनका साथ दे। जो मां-बाप अपने बच्चों को कम उम्र में या उसे अपना करियर बनाए बिना शादी की बात करते है उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए मां-बाप को भी अपने सोच में बदलाव लाना चाहिए। 

जागा मंत्रालय ...

केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने दो टीवी रियलिटी शोज पर गाज गिरा दी है। कलर्स चैनल पर प्रसारित होने वाले ‘बिग बॉस’ और एनडीटीवी इमैजीन पर आने वाले ‘राखी का इंसाफ’ को रात 11 बजे से पहले और सुबह 5 बजे के बाद कभी भी प्रसारित करने से मना किया गया है। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इन कार्यक्रमों के निर्माताओं को निर्देश दिए हैं कि वे  कार्यक्रम के दौरान एक पट्टी भी चलाएं, जिस पर लिखा हो कि यह कार्यक्रम बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं है.......मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि दोनों शो आम दर्शकों के लिए नहीं हैं और उनका प्रसारण देर रात में ही किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन शो को फिर से भी नहीं दिखाया जा सकता और न ही न्यूज चैनल खबरों में इसके फुटेज का इस्तेमाल कर सकेंगे। इसके अलावा मंत्रालय ने अश्लीलता के आरोप में एसएस म्यूजिक चैनल पर 7 दिनों के लिए प्रतिबंध लगा दिया है........इन दो ‘एडल्‍ट’ शो को लेकर हाल में विवाद काफी बढ़ गया था। शो में भड़काऊ, उत्‍तेजक और अश्‍लील दृश्‍य दिखाए जाने व संवादों का इस्‍तेमाल करने का आरोप लगता रहा है। यही नहीं, टीआरपी के लिए तमाम हथकंडे अपनाए जाने और रियलिटी शो बता कर सब कुछ प्रायोजित दिखाने के आरोप भी लगते रहे हैं।
                                                                       राखी का इंसाफ और बिग बॉस कई कारणों से चर्चा में आ चुके हैं। राखी का इंसाफ में राखी सावंत होस्ट की भूमिका में लोगों को ‘इंसाफ’ दिलाने का दावा करती हैं। लेकिन इसमें नाच-गाना, मारपीट, गाली-गलौच, अश्‍लील टिप्‍पणी सब कुछ दिखाया जा चुका है.......उत्‍तर प्रदेश में झांसी के एक परिवार ने तो यहां तक आरोप लगाया कि शो में गए उनके परिजन को राखी सावंत ने ‘नामर्द’ कह दिया, जिसके बाद वह अवसादग्रस्‍त हो गया और अंतत: उसकी जान चली गई। राखी पर इस सिलसिले में मुकदमा भी दर्ज हो चुका है ........बिग बॉस में भी जमकर अश्लीलता परोसी जा रही है और कलाकार कई मौकों पर अभद्र भाषा का प्रयोग करते देखे गए हैं...........चलिए देर से ही सही कम से कम सूचना प्रसारण मंत्रालय ने ये तो मान ही लिया कि "बिग बॉस" और "राखी का इंसाफ" परिवार के साथ बैठकर देखने लायक प्रोग्राम नही है....मंत्रालय की आँखे कब तक खुली रहती है ये तो वक्त बताएगा लेकिन एक व्यक्ति की मौत और तमाम विवादों के बाद कुछ लोगो ने जागरूकता जरुर दिखाई है.........

Saturday, November 13, 2010

ये क्या जगह है दोस्तों ?

" जिंदगी आ तुझे कातिल के हवाले कर दूं, मुझसे अंजामे तमन्ना नहीं देखा जाता" ये दास्तां उन जिंदगियों की है जिनके नाम रोज बदलते हैं। ये कहानी उनकी है जिनका पता उनकी पहचान बताता है, उनका पेशा बयां करता है। ये वह बस्ती है जो अरसे से मौजूद होकर भी कभी बसी नहीं। यहां रहनेवाला हर बाशिन्दा और यहां आनेवाला हर मुसाफिर बस एक ही सवाल पूछता है..................ये क्या जगह है दोस्तों ?
आपने अखबारों के इश्तिहार में गुमशुदा लोगों के नाम देखे होंगे, लेकिन क्या कभी किसी बस्ती के लापता होने की बात आपने सुनी है।छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बाद संस्कारधानी,न्यायधानी यानि बिलासपुर का ही नाम आता है.......पिछले एक दशक में काफी कुछ बदला,जमीन पर नजर आने वाली इमारते आकाश चूमने लगी,सडक पर यातायात का दबाव कई गुना बढ़ा पर इसी चकाचौंध के पीछे एक ऐसा दाग भी है जो कई दशक से संस्कारधानी के लिये ही नही पूरे जिले के लिए नासूर बना हुआ है और वह है जगह-जगह अघोषित  रेड लाईट एरिया........शहर के तालापारा का नाम भी कुछ उसी रूप में लोग जानते है...वक्त के साथ ठिकाने जरुर बदले,छोटी-छोटी खोलियो की जगह फ्लेट्स,काले शीशे लगी गाडियों और फार्म हॉउस ने ले ली... देश की आज़ादी के पहले अंग्रेजों के जमाने में  मुजरे सुनने का चलन था.... उस समय जिस्म का कारोबार सीमित ठिकानो पर संचालित था...मुंगेली के पड़ाव चौक की तंग गलियों की बात हो या फिर शहर के तालापारा की ८बाई ८ की खोलिया..
दुनिया के सबसे पुराने पेशे जिस्मफरोशी के कारोबारी बरसों से कारोबार कर रहे हैं। यहां से कभी नाबालिग तो कभी जबरन लाई गई लड़कियां जिस्म बेच रही हैं और सफ़ेद पोश तबका इन  इलाको  में जाने से भी कतराता है। पर इतना तय है कि इस अंधेरे कोने को कभी भी रोशनी नसीब नहीं हुई.......कहते हैं जिस्म रूह का लिबास है, लेकिन जब जिस्म पेशा बन जाता है तो उसके जख्म रूह से भी रिसने लगते हैं........... फिर बस ये आरजू रह जाती है कि मंजिल न दे चिराग न दे हौसला तो दे तिनके का ही सही कोई आसरा तो दे...... कुछ पते ऐसे होते हैं जो नाम को गुमनाम बना देते हैं.... ऐसे ही कुछ पते इस शहर और आस-पास के इलाको में.... यहां बस्ती तो है लेकिन जिंदगी यहां सिर्फ कटती है बसती नहीं......ये कहानी यहां रह रहे किसी बाशिन्दे के नाम से शुरू होती तो भी कहानी कुछ ज्यादा अलग नहीं होती .... मान लीजिए एक का नाम है रोशनी........नाम नकली है लेकिन दर्द असली.............22 साल पहले रोशनी को पति ने घर से निकाल दिया था। बच्चे को पालने की मजबूरी उसे जिस्म के बाजार में ले आई....... 22 साल से खिड़की से हाथ बाहर निकालकर सड़क पर चल रहे अजनबी मुसाफिरों के साथ चंद पल बिताने को अगर जिंदगी कहते हैं तो जिंदगी रोशनी ने भी जी......तिल- तिल कर सुलगती जिंदगी काठ हो गई और अब उम्र है कि कटती नहीं काटने को दौड़ती है। कहां जाएं ? क्या करें ? 22 साल पुराना सवाल एक बार फिर रोशनी को डरा रहा है। एक वक्त था कि निगाहें किसी का इंतजार करती थीं, फिर थक गई सड़कें और दूर तलक जाके एक दिन लौट आई......अब न ख्वाब रहे, न दर्द और न ही दर्द का एहसास, रोशनी ने मौत की मानिंद जीना सीख लिया। रोशनी की जिंदगी में अब रोशनी नहीं, उसका इंतज़ार भी नहीं। पल- पल का हिसाब मांगती जिंदगी से शर्मसार रोशनी के जेहन में है तो बस एक सवाल कि ये क्या जगह है दोस्तों ?
जिस बाजार में जिस्म बिकता है वहां सिर्फ इंसानियत नहीं बिकती, यहां छिन जाती है बच्चों की अनमोल मासूमियत......... यहां रहनेवाले और पलनेवाले बच्चों का अक्सर न कोई वर्तमान होता है और न ही कोई भविष्य........बच्चों के साथ पिता का नाम नहीं जुड़ा होता.... सिर्फ 4- 5 साल पहले तक ये एक बड़ी मुसीबत थी....... भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसके आदेश से अब सिर्फ मां के नाम से भी बच्चों को स्कूलों में दाखिला मिल जाता है..... वरना 5वीं के बाद बिन बाप के बच्चों के सपने दो कमरे के स्कूल में ही दम तोड़ देते..... इस ओर किसी एनजीओ की कोशिशे सराहना के लायक नजर नही आई.... स्कूलों में अघोषित  कोठों की ज़िंदगी से निकले बच्चों को जगह नहीं मिल पाती ऐसे में सैकड़ों बच्चों की तक़दीर या तो कोठों में या फिर सड़कों पर दम तोड़ देती है..........जिस नरक की बात अक्सर कहानियों में सुनते आए हैं उसे देखने के लिए कहीं और जाने की जरूरत नहीं। वह नरक शहर के ब्रहस्पति बाजार,शनिचरी बाजार,तालापारा की कई गलियों में ही मौजूद है.....एक ऐसा नरक जिसमे हर दिन सैकड़ों सैक्स वर्कर्ज़ करती हैं अपने जिस्म का सौदा.....एक जमाना था गांव के  जमींदार हर शाम महेफिल सजवाया करते थे.....पैर में बंधे घुंघरू की आवाज उस महिला या यु कहें की उस तवायफ के दर्द को जेहन से बाहर निकलने ही नही देती थी....वक्त बदला,लोग बदले तो फिर तवायफो का अंदाज कैसे नही बदलता.....धीरे- धीरे जिस्म के कारोबार में बदली जिंदगी के वही जख्म आज शहर का  नासूर बन कर सामने है......अब तो लगता है कई कमसिन लडकियों,महिलाओ को जिस्म बेचकर रूपये कमाना सबसे आसान तरीका लगता है.....मैंने देखा है कई सफेदपोश,इज्ज़तदारो को जो बाजार में उपलब्ध बेटी की उम्र की लडकियों से सौदा करते है.....रूपये की गर्मी उन्हें उम्र के लम्बे अन्तराल का अहसास नही होने देती.....बाजार में अलग-अलग ठिकानो पर दिखाई दे जाने वाली सेक्स वोर्करस को लोग देखते ही शब्दों के बाण चलाने लगते है....लेकिन उनके दिल में जो दर्द छुपा है उस को कोई मानने या समझने को तैयार ही नहीं है....वजह है कालगर्ल्स ......महंगे मोबाईल सेट,कार या फिर दोपहिया वाहनों पर अयासियो के लिए फर्राटे भरती वो कालगर्ल्स लोगो की खास और आसानी से उपलब्धता का सामान बन चुकी है....यहाँ-वहां ग्राहक की तलाश तो उसे होती है जिसके घर का चूल्हा जिस्म बिक जाने के बाद ही जलता है .......उनकी  ज़िंन्दगी में बस एक ही सच है,लोगों की हवस को निगल कर भी खुश रहने और जीवन जीने का सच.... जिस्म के बाज़ार में लोगों के अरमानों की केवल बोलियां लगती हैं.......फिर चाहे उसका नाम राधा हो या शबनम...... किसी के अपने नहीं रहे ,तो किसी के अपनो ने धोखा दे दिया और फिर पेट की भूख इन्हें खींच लाई जिस्म के बाज़ार में.......इतना कुछ खोने और झेलने के बाद भी उन्हें विश्वास हैं दुनिया बनाने वाले पर.......शायद इसीलिए उनके घर की दीवारों  पर कैटरीना, करीना, प्रीती ज़िन्टा के साथ भगवान की तस्वीर भी दिखाई देती है...... किसी भी त्योहार का इनके लिए कोई मायने नहीं है ......शायद यही विश्वास है जो उन्हें हर वक्त की घुटन भरी जिन्दगी के बावजूद जिन्दा दिल बनाये रखता है......उसी होसले ने  इन्हें और इनके मासूम बच्चों को ज़िन्दा रखा है.....इन तमाम जिल्लतो के बावजूद अगर खुदा के आगे इनके हाथ उठते हैं तो केवल इस दुआ के लिए कि............. "मेरे बच्चे कभी इन गलियों का हिस्सा न बनें"

राखी तुने ये क्या किया रे...

टीवी चैनल्स अब किसी भी स्तर तक  गिर सकते  है...हालत इतनी बिगड़ चुकी है की टीवी प्रोग्राम अब लोगो की जान तक लेने लगे है.... प्रोग्राम के जरिये अश्लीलता परोसने वालो को शायद वो सब कुछ अच्छा लगता है और जनता भी वो सब खुशी-ख़ुशी देखती है या ये कहे की जनता अब वो ही देखना चाहती है जिसमे सब दिखे....शायद इसीलिए अश्लीलता पसंद लोगो को इन दिनों "राखी का इंसाफ''काफी लुभा रहा है....अश्लील बाते,गन्दी गालिया सुनकर लोग ठहाके लगा रहे है....प्रोग्राम में इंसाफ की देवी {राखी सावंत} को तंग कपड़ो में देखने वालो की ख़ुशी का ठिकाना नही होता...पिछले पाँच साल में राखी ने अलग-अलग हथकंडो के जरिये खूब पब्लिसिटी बटोरी,फिर वो मिका के किस का मामला हो या फिर "राखी का स्वयम्बर"....इस आइटम गर्ल ने वो सब कुछ किया जो भारतीय संस्कृति एक औरत को करने की छुट नही देती...बाजार में नग्नता पसंद लोगो की खास पसंद बनी राखी अब इंसाफ की देवी बन बैठी है...."राखी का इंसाफ"कुछ इस तरह का होता है की लोग आपस में मारपीट तक करते देखे जा सकते है...पिछले दिनों एक एपिसोड में राखी के  इंसाफ ने प्रेमनगर[भिंड] के लछमण अहिरवार को मौत की नींद सुला दिया...एपिसोड में लक्षमण  की मर्दानगी पर सवाल खड़े कर दिए गए,राखी के इंसाफ में "इंसाफ" मिलने की उम्मीद लिए पंहुचा लछमण अब इस दुनिया में नही है.....मौत के दो दिन बाद लक्ष्मण  की माँ ने थाने में राखी के खिलाफ अपराध दर्ज करवाया ....विभिन्न धाराओ   के तहत पुलिस ने मुकदमा भी दर्ज कर लिया ...मगर सवाल यहाँ ये खड़ा होता है की क्या सम्बंधित चैनल उस व्यक्ति की मौत के लिए  जिम्मेदार नही है ? क्या इस समाज को ऐसे कार्यक्रमो के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा नही खटखटाना चाहिए जो लोगो की जान लेने तक को उतारू हो गए है  ?
                                             सवाल कई है लेकिन जवाब कोई खुलकर नही देना चाहता....एक वक्त था जब टीवी पर "जनता की अदालत" और किरण बेदी की " कचहरी " लगती थी....उन कार्यक्रमों ने कई ज्वलंत मुद्दों को बेबाकी से उठाया,लोगो का विश्वाश टीवी और इंसाफ के उन कार्यक्रमों से बढ़ा ....हालाँकि मै जिस " जनता की अदालत" और "कचहरी" का जिक्र कर रहा हू उसकी तुलना " राखी के इंसाफ " से करना गलत होगा....राखी नाम की आइटम गर्ल इंसाफ के नाम पर अश्लीलता परोस रही है,लोग टीवी के सामने मजमा लगाये इंसाफ का नंगा नाच देख रहे है...इंसाफ,न्याय जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर न्यायिक व्यवस्था पर करारा तमाचा मारने वाले कई टीवी प्रोग्राम धडल्ले से चल रहे है और सूचना प्रसारण मंत्रालय है की सब कुछ जान कर भी अनजान बनने  का नाटक कर रहा है....बदन पर सब कुछ दिखा देने वाले कपडे,घडी की सुई की तरह चेहरे के बदलते भाव बताते है राखी आखिर क्या है?....खुद का स्वयम्बर रचाने से लेकर कथित पति को छोड़ने तक राखी ने काफी कुछ ड्रामा किया....टीवी  पर स्वयम्बर रचाने वाली आइटम गर्ल ने चंद दिनों में ऐलान भी कर दिया की उसका पति कुछ ऐसा करने को कहता है जो वो नही कर सकती,राखी ये भी कहती है की उसमे[पति]काफी कमी थी....राखी की अपने चंद दिनों के पति के खिलाफ इस तरह की बेबाक टिप्पणी मैंने स्टारन्यूज़ पर देखी थी.... खुद के घर परिवार की उलझी कड़ीयो को आज तक ना सुलझा पाने  वाली राखी अब लोगो के टूटे आशियाने को बसाने,परिवार की उलझी कड़ीयो को सुलझाने के लिए इंसाफ की कुर्सी पर बैठी है, जहाँ से  इन्सान को कथित इंसाफ की देवी ऐसी मानसिक  यातना देती है जिससे ग्रसित इन्सान "लक्ष्मण" की तरह मौत को गले लगा लेता है.....
                                                                                    सबसे बड़ी बात ये रही की एक व्यक्ति मानसिक यातना से टूटकर जान दे देता है और मानवधिकार की रक्षा के लिए लड़ने वाले,टीवी चैनल्स ख़ामोशी से सब बर्दाश्त कर जाते है....प्रेमनगर में  जिस दिन  लक्ष्मण की मौत का मातम होता  है उस दिन भी टीवी चैनल पर "राखी का इंसाफ"चल रहा होता है...लोग आधुनिक वस्त्रो या यू कहें की अर्धनग्न आइटम गर्ल को जज के रूप में देखकर तालिया पीटते रहे,अपने मुंह में ऊँगली डालकर सिटी मारने वाले अश्लीलता पसंद लोगो की जुबान पर ये नही आया " राखी तुने ये क्या किया रे....."