Tuesday, October 26, 2010

ऐसी दबंगई और कहाँ...

                 

च्छी बातो पर व्यक्ति अमल करे ना करे बुराई को जल्दी अमल में लाता है... इसका प्रमाण है अभिनेता सलमान खान की फिल्म "दबंग"..."दबंग"दरअसल एक भ्रष्ट पुलिस अफसर की कहानी है...फिल्म में दिखाई गई दबंगई और भ्रष्ट छवि को हकीकत में खाकीवर्दी वाले नही मानते..पर सिनेमा हाल में बैठकर लोगो की तालियों और सीटियो का पूरा मजा लेते है...बिलासपुर के पुलिस अधीक्षक जयंत थोरात दबंग देखकर १२ सितम्बर को निकले तो सिनेमा हाल के एक सुरक्षा कर्मी की पुलिस वालो ने हत्या ही कर दी...वजह बड़ी मामूली सी थी,उस सुरक्षाकर्मी ने बड़े साहेब{पुलिस अधीक्षक जयंत थोरात} को बिना पहचाने लाइन से चलने की सलाह दे डाली...बस साहेब की सुरक्षा में लगे जवानो ने उस सुरक्षाकर्मी को तब तक पीटा जब तक उसका दम नही निकल गया...ये खबर जब फैली तो कई रिश्तेदार,कोई शुभचिंतक बनकर पहले अस्पताल, फिर तारबाहर थाने में हंगामा मचाने पहुंच गए ...देर रात या यूँ कहें सुबह तक मजमा लगा रहा...सबकी यही मांग थी की दबंग पुलिसवालो{दोषी}के खिलाफ कार्यवाही हो...दबाव में खाकी वालो ने लीपापोती की लेकिन साहेब{पुलिस अधीक्षक जयंत थोरात} पाक साफ बच निकले,इस घटना के ठीक एक महीना चार दिन बाद ही बिल्हा के थानेदार पर साउंड सर्विस वाले की हत्या का आरोप लगा...१२सितम्बर को जीत टाकिज का हादसा,१६अक्तुबर को बिल्हा के थानेदार पर हत्या का संगीन आरोप लेकिन इन मामलो में सत्तापक्ष और विपक्ष की भूमिका निभा रही कोंग्रेस सांकेतिक हल्ला मचाने के अलावा कुछ नही कर सकी...लोग पुलिस की इस दबंगई को भूले भी नही थे की २५ अक्तुबर को सत्तापक्ष के एक पार्षद विजय ताम्रकार को यातायात के जवान ने राजनेतिक हवाला देने पर जमकर पीट दिया... बाद में भले ही कुछ सत्ताधारी लोगो ने उस सिपाही की पिटाई की,निलंबित करवा दिया और उससे माफ़ी मंगवाकर मामले को ख़ुशी-ख़ुशी निपटा लिया...लेकिन सत्तापक्ष के पार्षद की पिटाई और पूरी कार्रवाही  के बीच की जद्दोजेहद कम नही थी...प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के काफी करीबी पार्षद को पिटाई खाने के बाद करीब ढाई घंटे तक सडक पर बैठकर प्रदर्शन करना पड़ा,सबसे बड़ी बात लोगो की भीड़ जुटानी पड़ी....पार्षद की पिटाई हो गई ये सुनकर कांग्रेसी भी पहुँच गए...पुलिस की दबंगई का शिकार पार्षद लोगो की भीड़ देखकर दबंग बनने का नाटक करने लगा..

.तमाशाई और कुछ लोग पुलिस वालो को जमकर गालिंया देते रहे...इस राज्य में खासकर बिलासपुर जिले में कानून व्यवस्था की वास्तविकता का आंकलन इसी से लगाया जा सकता है की एक सिपाही के खिलाफ कार्रवाही करवाने में मंत्रीजी के खासमखास को पसीने छूट गये...प्रदेश की सरकार नौकरशाही के भरोसे चल रही है,ये यकीन से कहा जा सकता है....बिल्हा में भी जिस साउंड सर्विस वाले की हत्या कर लाश रेल पटरियों के किनारे फेंक दी गई उसके पिता बीजेपी के समर्पित कार्यकर्ता है..लेकिन जवान बेटे की मौत ने अहसास करा दिया कि दबंगो {पुलिस} के खिलाफ कारवाही करवाना आसान नही है...जब सत्ता में बैठे लोगो की बातो पर पुलिस कुछ नही कर रही, जब सत्तापक्ष के लोग सडको पर पिटने लगें तो समझा जा सकता कि आम आदमी कितना महफूज होगा.....

Sunday, October 24, 2010

...और एक डोम हो

सरकार को सुनती जनता ...

संतुष्ट  नजर आते "सरकार"....

सरस्वती योजना के तहत साइकिले दी गई...

राज्योत्सव की तैयारियां  राजधानी के साथ-साथ बिलासपुर में भी पूरी लगन के साथ की गई.....हर विभाग के मंत्री और अफसरों ने अपने लिए डोम [पंडाल] सजवाया .....बड़े-बड़े डोम में विभाग की उपल्ब्धियो की तस्वीरे,झाँकिया सजाई जाएँगी....इस मौके पर कही सलमान खान तो कही किसी और को बुलाया जायेगा.....कोई " मुन्नी बदनाम हुई तो कोई दूसरे गीत पर ठुमका लगाकर सरकार का यशगान करेगा.... छत्तीसगढ़ को राज्य बने एक दशक [१० बरस ] एक नवंबर को पूरा हो जायेगा...छत्तीसगढ़ के आवाम ने एक दशक में दो सरकारों को देखा,उनके काम करने का तरीका हो या फिर आखिरी आदमी के प्रति सरकार का रवैया....जनता सब जानती है फिर भी खामोश है.....सूबे के आवाम ने दोनों सरकारों की याद रखने लायक बातो को याद रखा,बाकी भूल गए.....जनता को बताने के लिए सरकार के पास बहुत कुछ है शायद इसीलिए बड़े-बड़े डोम सजाये गए है..लेकिन जनता बहुत कुछ जानते हुए भी सरकार को कुछ नही बता पाती क्योकि आम आवाम के पास डोम सजाने के लिए रूपये नही है.......जनता कहीं बीमारी से मर रही है , तो कहीं कानून के रखवालो की दबंगई के शिकार लोग अस्पतालों में इलाज करवा रहे है..और जिनकी सांसे थम गई उनके परिजन न्याय पाने यहाँ-वहां भटक रहे है...१२ सितम्बर को बिलासपुर के जीत टाकिज की घटना कानून के रखवालो का असली चेहरा दिखाती है....जिले के पोलिस कप्तान बीबी के साथ सलमान खान की दबंग देखकर बाहर निकलते है,टाकिज का सुरक्षा कर्मी उनको नही पह्चान पता है और लाइन से निकलने की बात कह देता है,बस साहेब के गुर्गे [पोलिस ] उस पर पिल पड़ते है...देखते ही देखते वो सुरक्षा कर्मी मर जाता है ,लेकिन सरकार के मंत्री गरीब आदमी की मौत पर बोलने की बजाय पोलिसवालो का बचाव करने में जुट जाते है....ऐसी कई घटना है जो सरकार और नौकरशाही के  आपसी तालमेल का सबूत देती है......फिर भी जनता सरकार के साथ मिलकर राज्योत्सव मनाएगी.....डॉक्टर रमन की सरकार या यूँ कहें की जनता की चुनी सरकार का काम-काज अच्छा है लेकिन  " सरकार " नाम की जो संस्था है उसका काम जनता के हित में नही दिखता....वजह है बिचोलिये...गरीबो के  हक़ पर अपना कब्ज़ा जमा चुके दलाल कोई और नही " सरकार " के काफी करीबियों में से है...ऐसे में गरीब को सरकार की योजना का लाभ मिलेगा  सोचना भी बेमानी होगा....जनता का काम है सपने देखना और सरकारे समय- समय पर सपनो के झूले पर उनको झूलाती रहती है....ऐसा तब से हो रहा है जब से इस देश में संसदीय शासन प्रणाली आई है....अखबारों में हर दिन यहाँ - वहां करीब १५ -२० शिलान्याश और भूमिपूजन की खबरे होती है...लेकिन साल में केवल १०-१२ लोकार्पण की खबरे ही पढने और सुनने को मिलती है.....चुनावी घोषणाओं पर कितना अमल हुआ इसका हिसाब जनता नही पूछती....अजीत जोगी की सरकार ने पानी बचाने के लिए प्रदेश में हजारो डबरी खुदवाई थी ...लेकिन उस " जोगी डबरी" से किसानो को कोई लाभ नही हुआ...मध्यान्ह भोजन केंद्र सरकार की योजना है लेकिन डॉक्टर रमन की सरकार उसे किस तरह चला रही है शायद अखबार रोज पढ़ने वाले जानते है....गावं-गावं में शराब की अवैध भट्टिया खु गई है जो गावं की तकदीर और तस्वीर दोनों बदल रही है....सरकार ऐसे भाग्य विधाताओ के खिलाफ कार्यवाही नही करती ,करे भी तो क्यों, लोगो को जहर{दारू}पिलाकर करोडो का राजस्व जो सरकार अर्जित कर रही है.......गरीबो के हक़ का राशन राईस मिलो में पहुँच रहा है....हजारो  लीटर मिट्टीतेल खुले बाजार में चुपके -चुपके बिक रहा है पर सरकार है की कुछ नही करती....
                              इस बार की सरकार कई मायनो में ज्यादा संवेदनशील है , ज्यादा से ज्यादा विकास के काम करवाना चाहती है....सरकार ने गांवो में बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगवाये है जिनमे कई योजनाओ का जिक्र है.....बच्चो को स्कूल भेजने से लेकर खुले में शोच नही करने का जिक्र होर्डिंग में है.....सरकार ने लडकियों को सायकिले बांटी, उसमे भी सरकार के लोगो की जेब का खास ख्याल रखा गया.... सरकारी योजनाओ की होर्डिंग्स पर सूबे के मुखिया डॉक्टर रमन के अलावा विभागीय मंत्रियो की मुस्कुराती तस्वीरे भी लगी है....गांव के बच्चे उन मंत्रियो की मुस्कुराती तस्वीरों को रोज देखते है...पर उन तस्वीरों से शिकायत नही कर सकते....गांव में स्वास्थ्य,शिक्षा का हाल वहा की सडको से भी बुरा है.....सरकार ग्राम सुराज के जरिये ग्रामीणों तक पहुंचकर समस्या हल करने का दावा करती है लेकिन समस्याओ के निराकरण की सच्चाई जानना हो तो एक बार गांव जरुर पहुँचिये.....
                                                           राज्य नक्सलवाद की भीषण समस्या से जूझ रहा है, सरकार हर घटना के बाद नक्सलियों से निपटने नई कार्ययोजना बनाती है....बावजूद इसके नक्सल इलाके में हर दिन निर्दोष लोग मारे जा रहे है....हर दिन के आंकड़े काम ज्यादा हो सकते है लेकिन लाल आतंक पर सरकार का नियंत्रण नही है...इस मसले पर सरकार और सरकार की रोटी खाने वाले बड़े-बड़े दावे करते है....पर ये लोग उस समय कुछ कह पाने की स्थिति में नही थे जब ७ जवानो को अगवा करके नक्सलियों ने ३ की हत्या कर दी और ४ जवानो को बंधक बना लिया,जिनको छुड़ाने सरकार ने कोई ठोस कार्ययोजना नही बनाई......परिवारवालों और मिडिया की मिन्नतो पर १० दिन बाद नक्सलियों ने बंधक जवानो को रिहा कर दिया..सरकार अंत तक कुछ नही कर पाई....ऐसी कई विफलताएं है जो सरकार की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करती है , लेकिन सरकार और सरकारी  तंत्र है की हर बरस विकास की झांकी सजाता  है......तमाम विफलताओ की उडती धूल को कारपेट से ढँककर उसके ऊपर सफलता के सजे डोम में सब एक साथ होंगे....सब सरकार की बड़ाई में सजी झाँकियो को निहारेगे ....इन डोमो के बीच वो डोम नही होगा जिस पर शायद लिखा होता................ "असफलता का डोम "

समर्पित शख़सियत...डॉक्टर खैरा

                                                                                                                                                                                                              आज जहाँ इस भोतिकतावादी ज़माने में चारो ओर स्वार्थ और मक्कारी का बोलबाला है..पिता-पुत्रहो या भाई-भाई,सारे रिश्ते कही-ना-कही स्वार्थपरक को प्रस्तुत करते है...वही एक शख्स ऐसा है जिसने मानवता की भावना को फलीभूत करते हुए 'वसुधेव कुटुम्बकम' के सिद्धांत को अपने आप में आत्मसात कर लिया है....आदिवासियों के दुःख में दुखी होते तो उनकी खुशियों में ही अपना आनंद तलाशने वाली इस शख़सियत का नाम......डॉक्टर प्रभुदत्त खैरा है..... करीब पौने छः फुट और प्रफुल्लित मन के डॉक्टर खैरा गरीबो,आदिवासियों के आर्थिक,सामाजिक और सांस्कृतिक उत्त्थान के लिए पूरी तरह समर्पित है....बिलासपुर  से अमरकंटक मार्ग पर ग्राम लमनी [अचानकमार अभ्यारणय] को अपनी  कर्मस्थली बना चुके इस शख्स को देखकर एकाएक किसी सूफी संत या दरवेश की याद तरोताजा हो जाती है....खादी के कुरते-पायजामे में उम्र के सात दशक से अधिक की दहलीज पार कर चुकी ये मानवकाया आदिवासियों के बीच 'खैरा गुरूजी' के नाम से आत्मीयता का पर्याय बन चुकी है......हर रोज सुबह गुरूजी दैनिक नित्य-कर्म से निपटने के बाद गाँव के ही एक छोटे से ढाबेनुमा होटल में चाय के एक गरम प्याले की चुस्की लेना नही भूलते....इसके बाद शुरू होता है गाँव की परिक्रमा का दौर ...गाँव के हर घर की चौखट पर डॉक्टर खैरा की दस्तक रोज होती है....अपनी सभ्यता-संस्कृति के अनुरूप आदिवासी गुरूजी का आत्मीयता से स्वागत भी  करते है....एक-एक व्यक्ति का हालचाल पूछते डॉक्टर खैरा गांव के नुक्कड़ पर पहुँचते है...हर रोज सुबह .नुक्कड़ पर बच्चो की भीड़ गुरूजी का इन्तेजार कर रही होती है....गुरूजी सबसे पहले बच्चो को नहलाते-धुलाते है...इसके बाद पढ़ने-पढाने का सिलसिला शुरू होता है....बिना कापी-पुस्तक के डॉक्टर खैरा बच्चो को काफी कुछ बताते है....बच्चो को कपडे सिलकर पहनने,हाथ धोकर खाने की आदत गुरूजी डलवा चुके है...इन सारी बातो में हम गुरूजी के कंधे पर टंगे खादी के झोले का जिक्र करना ही भूल गए....खादी के उस झोले में चाकलेट,बिस्किट,आंवला,चना और कुछ दवाइया होती है...खेल-खेल में पढाई,फिर झोले से खाने की चीजो को निकालकर गुरूजी सबको थोडा-थोडा बाँटते है....जंगल में रहने वालो को आंवला,हर्रा,बहेरा और अन्य वनोषधि के महत्व से रूबरू करवाना गुरूजी नही भूलते....बच्चो के बीच शिक्षा की अनिवार्यता के मद्देनजर उनकी कोशिश होती है कि उन्हें आज कि दुनिया और ज्ञानविज्ञान के साथ-साथ प्रकृति की भी जानकारी मिल सके... गुरूजी का प्रयास होता है की आदिवासी और उनके बच्चे शिक्षित होने के साथ अपने सांस्कृतिक महत्व को भी समझे.....
                                                                                            आदिवासियों के बीच जिंदगी को एक नई पहचान देने वाले डॉक्टर खैरा की अपनी पहचान कम संघर्षपूर्ण नही है...१९२८ में लाहोर[पाकिस्तान]में जन्मे गुरूजी ने प्रारम्भिक शिक्षा लाहोर में ही ग्रहण की.....सन १९४७ में देश के विभाजन का दंश झेल चुके गुरूजी परिवार समेत दिल्ली आ गए....हिन्दू विश्विद्यालय से समाजशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट और १९७१ में पीएचडी की उपाधि गुरूजी ने हासिल की....दिल्ली विश्विद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर के रूप कई साल तक गुरूजी पढाते रहे....इसी बीच सन १९६५ में माता जी के निधन की खबर से डॉक्टर खैरा टूट गए,एकदम अकेले हो गए.....माँ के गुजर जाने के बाद अविवाहित खैरा ने फिर जिन्दगी अकेले ही काटने की ठान ली....डॉक्टर खैरा पहली बार सन१९८४ में दिल्ली विश्विद्यालय के छात्रों को लेकर यहा आये...यहा की सुरम्य वादियों की गूँज डॉक्टर खैरा के मन-मस्तिष्क में घर कर गई....१९९३ में सेवानिवृति के बाद गुरूजी यहाँ आकर रहने लगे....यहाँ के आदिवासियों का भोलापन,उनकी संस्कृति में गुरूजी ऐसे घुले की यही के होकर रह गये...आज वे वानप्रस्थी के रूप आदिवासियों के साथ जंगल में जनचेतना का शंखनाद कर रहे है....


                                                                      आदिवासियों की शेक्षणिक और सामाजिक उन्नति के साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिये डॉक्टर खैरा अपनी पूरी उर्जा झोंक चुके है....डॉक्टर खैरा के मुताबिक आदिवासी विकास से कोसों दूर पाषाणयुग में जी रहे है....बीहड़ो में संवेधानिक मूल आधिकारो की बाते अब बेमानी हो चली है.....जंगलो में रहने वाले आदिवासी अब केवल उपभोग करने वाली वस्तु  बनकर रह गए है..... करीब १७ बरस से आदिवासियों के बीच रह रहे डॉक्टर खैरा मानते है की आदिवासी ही जंगलो की सुरक्षा कर सकते है लेकिन सरकारे और वन महकमा आदिवासियों को जंगल से विस्थापन  के नाम पर खदेड़ रहा है....खैर , डॉक्टर खैरा की निःस्वार्थ कोशिशे आदिवासियों के बीच शिक्षा की अलख जगा रही है और सभ्यता,संस्कृति को बचाने प्रयासरत है.......................................                                                                                         

Saturday, October 23, 2010

ये कैसी पाठशाला...





सरकारी स्कूल,सरकार की व्यवस्था और सरकारी गुरुजनों को मैंने काफी करीब से देखा है...मध्यम वर्गीय परिवार से हू इस  कारण पढाई सरकारी स्कूल में हुई...पढ़ लिखकर माता पिता के सपने भी पूरे नही कर सका,मलाल आखरी साँस तक रहेगा....हर माँ-बाप की तरह मेरे माता-पिता ने भी डॉक्टर-इंजिनियर बनाने का ख्वाब संजो रखा था... मध्यम वर्गीय परिवार ही सही पर मेरी ख्वाहिशो का पूरा ख्याल रखा गया....मै डॉक्टर-इंजिनियर तो नही बन सका लेकिन अनुभव के पहले का ग्लेमर पत्रकारिता के भवर जाल में फासता रहा....अब लगता है पत्रकारिता के अलावा कुछ कर भी नही सकता...आज के दौर में भले ही लोगो ने पत्रकारिता को केवल और केवल कमाई[दलाली]का जरिया भले ही बना लिया हो लेकिन अब भी कुछ लोगो से उम्मीदे है...शायद उसी भीड़ से अलग निकल कर कुछ करने की सोच ने मुझे "नेगेटिव"पत्रकारिता का गुर सीखा दिया...मेरी कोशिश हमेशा सच को देखने की होती..इसमें कई साथियों को तकलीफ और नुकसान [रूपये]होता...खैर मै लिखने कुछ और बैठा था लिखने कुछ और लगा....शायद यहा भी अन्दर का सच शब्दों के जरिये बाहर निकल आया... मै इक सरकारी स्कूल की बदहाली और सरकारी तंत्र के सच को शब्दों में पिरोना चाहता हू...मैंने शहर से २४ किलोमीटर की दूरी पर टाडा गाव में ऐसा स्कूल देखा ज़हा कमरे ही नही है...जिला मुख्यालय से कोटा मार्ग पर ग्राम टाडा जहा की आबादी २००० की है;यहा शिक्षा की बदहाली की जो तस्वीर मैने देखी वो सरकार और सरकार के नुमाइंदो का झूठ से लबरेज गन्दा और काला चेहरा नही छिपा सकी...शिक्षा की अनिवार्यता का कानून बन गया शायद इसीलिए बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर भविष्य के सपने संजो  रहे है...गाँव  वालो से पूछा तो मालूम हुआ कि सन २००८ जुलाई महीने में ४ लाख ६५ हजार रूपए स्वीकृत हुआ था....सरकारी फंड खर्च हो गया लेकिन स्कूल का भवन नही बन सका.....सरकारी रुपयों को जिला से लेकर गाँव के सरपंच तक ने पचा लिया, डकार भी नही ली...आलम ये है कि बच्चे आग उगलती धूप,तेज हवा यहाँ तक कि बारिश के थपेड़ो को अब  सहजता से बर्दास्त कर लेते है....वैसे तो गाँव की स्कूल में कभी बच्चे तो कभी गुरूजी नहीं आते लेकिन मुद्दा ये नही है...मुद्दा ये है की बच्चे तमाम दावों को चिढाते खुले आसमान के नीचे शिक्षा ग्रहण कर रहे है....सरकारी तंत्र की जड़े कितनी खोखली और गन्दी है ये मुझे टाडा में समझ आया...वैसे १५ साल की पत्रकारिता में मैंने कई बदहाल स्कूल देखे,कई खामिया देखी इस कारण टाडा में आसमान के नीचे बैठे बच्चो को देखकर बहुत ज्यादा आश्चर्य भी नही हुआ..मुझे ये भी लगा कि गाँव के लोग स्कूल को लेकर ज्यादा चिंतित और गंभीर नही है...गाँव में जिसने भी स्कूल के अभाव का जिक्र किया उसे केवल सरकारी रुपयों को दूसरो के द्वारा डकार लिए जाने मलाल था....मतलब बच्चो के सर पर छत हो,वो खुले आसमान की जगह कमरों में बैठे इसके लिए कम ही लोगो ने आवाज उठाई ..फँला-फँला लोग रूपये पचा गए....उस  कोलाहल के बीच पेड़ के नीचे गाँव की सरकारी पाठशाला चलती रही................... .

Friday, October 22, 2010

.............ऐसा राजकुमार





बात १४अक्तुबर की है.....मै और मेरा केमरासहयोगी खबर की तलाश में रोज की तरह निकले....वैसे तो मेरे दफ्तर से कुछ ही दूरी पर कई खबरे होती है जिन्हें खोजना नही पड़ता,लेकिन हर दिन कुछ नया करने की चाह में मै कही दूर निकल जाता .....आज अचानक मन रायपुर रोड की ओर जाने का हो गया ....चलते -चलते २३ किलोमीटर दूर बिल्हा पहुच गये ....बिल्हा से एक रास्ता ग्राम केसला की ओर जाता है......हम उसी ओर चल पड़े;गाव पहुचे ही थे कि अचानक एक विकलांग कुछ बेचता नज़र आया; जिज्ञासावस् हम उसी व्यक्ति के पास रुक गए ......नाम पूछने पर पता चला कि वो "राजकुमार" है .....वैसे इस नाम से राजकुमार को गाव में कम ही लोग जानते है...."पकलू" के नाम से राजकुमार को हर कोई जानता है.....विकलांग पकलू को गाव में चलती फिरती दुकान के नाम से भी जाना जाता है......मौसम मूंगफली का है इस कारण पकलू की ट्रेसिकल पर एक सिगड़ी सुलग रही है.....गाव की एक-एक गली से पकलू की दुकान गुजरती है.....शाम तक इतना मिल जाता है कि एक जून की रोटी परिवार का पेट भर देती है....पकलू भुट्टे के सीजन में भुट्टा भुन्जता है.......कभी मनिहारी तो कभी फल की दुकान ट्रेसिकल पर सज जाती है...मतलब विकलांगता, पकलू के बुलन्द इरादों के सामने नतमस्तक है....पकलू शादीशुदा है और तीन बेटियों का पिता है....एक बेटी स्कूल भी जाती है;बेटियों के भविष्य को लेकर नाम का राजकुमार काफी चिंतित भी रहेता है लेकिन पत्नी है की पकलू के बुलंद इरादों को कम नही होने देती.....सरकारे गरीबो,जरुरतमंदो तक सहायता पहुचने का दंभ भरती है लेकिन पकलू आज भी सरकारी मदद को मोहताज है......ना सरकार की इंदिरा आवास योजना का लाभ मिला ना स्थाई ठिकाने के लिए किसी जनप्रतिनिधि ने मदद की उम्मीद दिलाई .....संघर्ष भरी जिन्दगी को हसकर गुजार रहा पकलू रियल लाइफ का हीरो है.....विकलांगता के नाम पर तो कभी विकलांग बनकर भीख मांगने वालो को पकलू जैसे इन्सान से सबक लेने की जरुरत है....करीब ढाई घंटे पकलू के साथ रहकर मै उन कामचोर लोगो की सोचने लगा जो बिना कुछ किये बहुत कुछ करने का नाटक करते है..... खैर...... जैसी करनी वैसी भरनी ........

Thursday, October 21, 2010

हे राम ..........





हे राम .......... शायद नही गाँधी होते तो अब कहते हाय राम..........२अक्तुबर को एक बार फिर जयंती के नाम पर महात्मा गाँधी याद किये गये ......बिलासपुर के कलेक्टोरेट परिसर में बापू कि प्रतिमा एक समारोह के जरिये लोकार्पित करवाई गई .....विधानसभा अध्यछ की मौजूदगी में बापू को याद करने की रस्म पूरी हुई .......सबने बापू के बताये आदर्शो पर चलने की कसमे खाई ....सत्य,अहिंसा के मार्ग पर चलकर गाँधी को हमेशा याद करने का भरोसा एक दूसरे को दिलाया लेकिन बापू की उस दुर्दशा का ख्याल किसी के जेहेन में भी नही आया जो शहर के समारोह स्थल से महज १८ किलोमीटर की दूरी पर ग्राम गनियारी में है ........यहा बापू की प्रतिमा खुद की बदहाली पर आंसू बहा रही थी .... प्रतिमा देख कर यकीन हो गया की बापू को इस गाव के लोग याद नही करते ......सडक के किनारे ग्राम पंचायत के परिसर में लगी प्रतिमा पर यक़ीनन हर गुजरने वाले की नजरे पड़ती होंगी लेकिन भीड़ की राजनीती करने वालो ने कभी रूककर ये आवाज नही लगाई की महात्मा की सूरत इतनी बिगड़ी बिगड़ी सी क्यों है......शायद यहा आवाज लगाते तो सुनने के लिए ना तमाशाई थे ना मिडिया वालो का मेला....हां गाव की जगह प्रतिमा शहर में होती तो कुछ लोगो को हल्ला मचाकर मिडिया में छपने का अवसर जरुर मिल जाता .....मैने गाव के कुछ जागरूक लोगो से बातचीत की तो पता चला की बरसो से बापू की ओर किसी ने नही देखा ......बताने वाले को भी शायद शर्म नही आई .....गाव का जागरूक उपसरपंच जितेन्द्र राज बापू की दुर्दशा पर बेबाकी से बोलता रहा ......बापू के प्रति खुद के कर्तव्यो को भूल चूका उपसरपंच विरोधी सरपंच की बातो बातो में बखिया उधेड़ता रहा ....चंद रुपयों की माला खरीदकर बापू की  बदहाल प्रतिमा के गले में उपसरपंच नही डाल सका .....हम सारी दुर्दशा को देखकर वापस शहर लौटने लगे तो उपसरपंच ने हमे चाय पिला दी ...जेब से पर्स निकालकर उस जागरूक इन्सान ने दुकानदार को रूपये दिए .....रास्ते में हमने सोचा जिस उपसरपंच ने बापू को १० रूपये की माला खरीदकर नही पहनाई उसने हमको १८ रूपये की चाय केसे पिला दी ...? थोड़ी देर में उस सज्जन का स्वार्थ भरा चेहरा हमारी आँखों के शामने था....बापू पर खर्च किये गए १० रूपये का रिटर्न नही था....हम १८ रूपये की बदले उसे पब्लिसिटी देते .....सोचते सोचते हम वापस शहर लौट आये .....ये ही बापू के प्रति उन लोगो की सही श्रदांजली है...........................................सत्यप्रकाश

Monday, October 4, 2010

भीख नहीं नौकरी दो!

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छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिला मुख्यालय से करीब-करीब ५०  किमी दूर छोटे से गांव हथिनीकला में धीरपाल नाम का एक शख्स रहता है. माँ की कोख से विकलांगता लेकर जन्मा धीरपाल दो बच्चों का पिता है--विकलांगता  के साथ-साथ मुफलिसी की दोहरी मार से धीरपाल के................
हौसले नहीं टूटे लेकिन बच्चों के होश सम्हालते ही बीबी साथ छोड़ कर चली गई. बच्चे हर हाल में पिता के साथ खुश हैं. एक बेटी और एक बेटा दोनों गाँव के सरकारी स्कूल में मुफ्त की शिक्षा ले रहें हैं. घर के नाम पर गाँव में एक टूटी हुई झोपड़ी है, जो शायद सिर छिपाने के लिए ही काफी है. टूटी झोपड़ी के भीतर खाली पड़े अनाज के डिब्बे और बुझे चूल्हे के पास रखे दो अदद बर्तन गवाही देते हैं कि इस घर में रोज़ खाना नहीं पकता.------  वैसे तो धीरपाल भीख नहीं मांगना चाहता पर बच्चों के पेट की आग बुझाने के लिए बैसाखी के सहारे काफी दूर-दूर तक जाना पड़ता है. चंद रुपये और कुछ पुराने कपडे भीख में पाकर धीरपाल खुश तो नहीं होता लेकिन बच्चों के चेहरों पर कुछ देर के लिए आई ख़ुशी, सुकून देती है.----- मुंगेली से कुछ दूर पहले ग्राम हथ्निकला मे  रहने वाला धीरपाल इस देश का अकेला गरीब या फिर विकलांग नही है -- परन्तु इस विकलांग में देशभक्ति का जो जज्ज्बा है शायद वो कम ही लोगो में रहता है -- खाली पेट बापू भारतमाता या फिर सुभाष चन्द्र बोश को हर दिन याद करते इस परिवार को देश से काफी प्यार है --घर में दोनों वकत चुल्हा नही जलता लेकिन शहीदों  को दोनों वक्त अगरबत्ती जलाकर याद किया जाता है-- हमने धीरपाल से काफी कुछ जाना --बातो बातो में उसने बताया कि कही रोजगार मिल जाता तो बच्चो को अच्छी तालीम दिला देता --उसने बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और रास्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को हाथ से लिखा पत्र भेज चूका है लेकिन आशा कि कोई किरण अब तक नजर नही आई --मेहनत की रोटी खुद और बच्चो को खीलाने की सोच विकलांग को धीरे धीरे खाए जा रही है -- हर दिन रोजगार की तलाश-- शायद किसी दिन तो इंतजार ख़त्म होगा---- मै सलाम करता हु ऐसे देशभक्त धीरपाल को जो खाली पेट रहकर बापू भारतमाता और सुभाष को याद करता है ----                                                       सत्यप्रकाश