Thursday, April 28, 2011

कोई और दरवाज़ा देखिए...

ही कोई तीन चार दिन पहले मेरा दिल अचानक टूट गया है. शायद बहुत से लोगों का टूट गया हो,खबर ही ऐसी थी...मेरी जगह कोई भी होता वो ये ही कहता दिल क्यों न टूटे जब राहुल गांधी कह दें कि वे हीरो नहीं बनना चाहते....भारत का मीडिया ज़्यादातर उन्हें भारत के अगले प्रधानमंत्री के रुप में देखता है....कांग्रेस का इतिहास और वर्तमान राजनीतिक समीकरण बताते हैं कि इस राह में कोई बाधा भी नहीं है.नेहरु-गांधी परिवार ने आज़ादी के बाद सबसे लंबे समय तक भारत की कमान संभाली है....उसी विरासत के स्वाभाविक उत्तराधिकारी कह रहे हैं कि भारत की व्यवस्था में बहुत कुछ सड़ गया है, जीर्ण-शीर्ण हो गया है और वे उसे ठीक करना चाहते हैं.....सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश वीआर कृष्णा अय्यर ने उनसे पूछा था कि अन्ना हज़ारे का मामला इतना क्यों बढ़ा और वे क्यों ख़ामोश हैं? एक अच्छे राजनीतिक की तरह राहुल गांधी ने उन्हें चुप करवा दिया है और कहा है कि वे एक विचारशील भारतीय की तरह मनन कर रहे हैं और वे (जस्टिस अय्यर की तरह) पत्र लिखकर मुक्त नहीं हो सकते.....अभी-अभी भारतीय समाज को अपना नया हीरो मिला है. अन्ना हज़ारे के रूप में....बहुत से विवादों के बीच भी वह अन्ना हज़ारे से अभिभूत है.भारतीय मिथक और इतिहास दोनों में प्रमाण मौजूद हैं कि भारत अनिवार्य रुप से एक व्यक्ति पूजक समाज है..... वह रास्ते से पहले रास्ता दिखाने वाले की तलाश करता है.... वह किसी प्रतीक पुरुष (और यदाकदा नारी भी) के साए में अपने को सुरक्षित महसूस करता है. वह अपने लिए एक हीरो चाहता है.....ऐसे में राहुल गांधी कह रहे हैं कि वे हीरो नहीं बनना चाहते.....ख़ामोशी से काम करना चाहते हैं.
                                                 फिर मै ये भी सोचता हूँ की राहुल गांधी इससे पहले क्या करते रहे हैं? वे किसी दलित के घर खाना खाने गए तो ये सुनिश्चित कर लिया कि मीडिया इस ख़बर को प्रकाशित ज़रुर करे....उन्होंने सर पर दो धमेला मिट्टी ढोई तो पहले सुनिश्चित कर लिया गया कि टेलीविज़न वाले इसे देश को दिखा ज़रुर दें....यहाँ तक कि ट्रेन में सफर किया तो उनके मैनेजरों ने ये ख़बर मीडिया को पहुँचाने का पूरा इंतज़ाम किया..... वे किसी खेल के आयोजन में पहुँचे तो आम दर्शकों के बीच बैठकर लोगों को यह दिखाने की कोशिश ज़रुर की कि वे आम लोगों के भी क़रीब हैं...... विपक्षी दलों को लगा कि यह सब हीरो बनने की कोशिश है.लेकिन अब उन्होंने साफ़ कर दिया है कि वे हीरो नहीं बनना चाहते.... लोगों को जवाब मिल गया होगा कि राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले पर, 2जी स्पेक्ट्रम के घोटाले पर, सीवीसी की नियुक्ति पर और अन्ना हज़ारे के अनशन पर वे चुप क्यों रहते हैं.....अब लोगों को शक करना चाहिए कि अन्ना हज़ारे और उनके साथ जुड़े नागरिक समाज के लोग क्या सचमुच इस देश से भ्रष्टाचार को ख़त्म करना चाहते हैं या फिर उनकी मंशा हीरो बनने की है.....शायद वो कहावत ठीक हो कि जो गरजते हैं वो बरसते नहीं. इसलिए राहुल गांधी गरजते नहीं. शायद किसी दिन एक साथ बरसें, घनघोर घटा के साथ बरसें.....सीधे प्रधानमंत्री बनकर इस देश का उद्धार करें.राहत की बात सिर्फ़ इतनी है कि राहुल गांधी ने ये नहीं कहा है कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते..... मनमोहन सिंह इस बात के गवाह हैं कि अब भारत का प्रधानमंत्री ज़रुरी नहीं कि देश का हीरो भी हो.....तो देशवासियो अगर आपको सड़ी गली या बदबूदार या जीर्ण शीर्ण व्यवस्था को ठीक करने के लिए किसी हीरो की तलाश है तो माफ़ कीजिए राहुल गांधी उपलब्ध नहीं हैं.....कोई और दरवाज़ा देखिए.....और हाँ वो दरवाजा मिले तो मुझे खबर जरूर करें....

Saturday, April 23, 2011

इंसानियत की अर्थी...

 इस पोस्ट पर लगी अखबार की कतरन,उसकी हेडिंग और उसमे दिखाई देती धुंधली तस्वीर...यक़ीनन इंसानियत के मुंह पर करारा तमाचा है...मानवीय संवेदनाओं,इंसानियत और न जाने कितने शब्द होंगे जो हमारे इन्सान होने का सबूत देते है,लेकिन तीन कालम की खबर,उसकी हेडिंग और दिखाई पड़ती तस्वीर उन तमाम शब्दों की परिभाषा को बदल कर रख देती है...अगर हम इन्सान होते तो या फिर हमारे भीतर की इंसानियत जिन्दा होती तो यक़ीनन ये खबर नहीं होती...मेरे जिले{बिलासपुर}के पेंड्रा नगर में २० अप्रैल की देर रात स्वामीनाथ नाम का ७६ साल का बुजुर्ग जीवन संघर्ष की यात्रा में दम तोड़ देता है...पेंड्रा के बाजारपारा में महेत्तर मोहल्ले में रहने वाला स्वामीनाथ पेशे से मिस्त्री था....न जाने कितने लोगो के घरो की ईंट  परत-दर-परत जोड़ कर आशियाने खड़े किये होंगे लेकिन जिन्दगी ने जीवन भर सिर्फ उतना ही दिया जिससे उसका पेट खाली न रहे...स्वामीनाथ ने गुरूवार को आखरी सांसे क्या ली ऐसा लगा मानो पेंड्रा इलाके में इंसानियत की मौत हो गई हो....स्वामीनाथ की मौत की खबर उसके दोनों बेटो को लगी तो वो पेंड्रा पहुँच गए.... टूटी झोपडी में स्वामीनाथ की लाश कोने में अंतिम क्रिया-कर्म की राह तकती रही,बेटो ने जोड़ा-जन्गोड़ा तो भी कुछ कम पड़ रहा था....बेटे वहां की नगर पंचायत गए और कुछ लोगो से बाप के क्रिया-कर्म के लिए मदद स्वरुप लकड़ी दिला देने की गुहार करने लगे....कई लोगो से कहा लेकिन सब इंसान की शक्ल में जिन्दा मुर्दे की तरह बर्ताव करते रहे....इधर झोपडी में लाश पड़ी थी दुसरे मौसम की बेवफाई का सबूत तेज हवाओ और काली घटाओ से मिल रहा था....बेटो ने सोचा दिन ढलने से और मौसम बिगड़ने से पहले बाप की चिता को आग दे दी जाये,क्योंकि जिनके पास लकड़ी के लिए पैसे नही थे वो दुसरे दिन तक बाप की लाश सुरक्षित रखने बरफ की सिल्ली कहाँ से लाते,सो लोगो से लकड़ी मिलने की उम्मीद छोड़ दोनों घर लौट आये....आस-पास में इंसान रहते है ये सोचकर बेटो ने बाप की अर्थी को कंधा देने आवाज लगे...घर-घर जाकर मदद की भीख मांगी गई लेकिन किसी का कलेजा नही पसीजा...इसी बीच पड़ोस में रहने वाला एक शख्स मानवता जिन्दा होने की मिसाल देने आगे आया....अब भी अर्थी को एक कंधे की जरुरत थी लेकिन बेटो के पास वक्त नही था....बेटो ने पडोसी उस शख्स के साथ अर्थी को अंतिम सफ़र के लिए काँधे पर उठा लिया....स्वामीनाथ की अंतिम यात्रा तीन कंधो पर शमशान की ओर बढती रही...जो देखते वो देखते-देखते आगे बढ़ जाते...किसी को शायद पल भर के लिए भी नही लगा की तीन कंधो पर गरीबी के कफ़न से ढंकी अर्थी एक इंसान की ही है....
                                          स्वामीनाथ का अंतिम संस्कार तो हो गया लेकिन इंसान की शक्ल में वहां रहने वाले आखिर ये क्यों भूल रहे है की बारी सबकी आनी है...कल स्वामीनाथ की बारी थी,कल किसी और की होगी....कुछ लोगो से मैंने अखबार में खबर पढने के बाद फ़ोन लगाकर बातचीत भी की...किसी ने कहा छुआ-छूत के चलते लोग दूर से तमाशा देखते रहे.....किसी ने कहा स्वामीनाथ हरिजन था और महेत्तर मोह्ल्ले में रहता था इस कारण लोगो ने कन्नी काट ली...हद तो तब हो गई जब एक ग्रामीण नेताजी से दूरभाष पर बात हुई....उन्होंने कहा ग्राम-सुराज में पास के गाँव गया था वरना मै जरुर कुछ ना कुछ मदद करता...मैंने पूछा आज दूसरा दिन है आपने उसके बेटो से मुलाक़ात की...जवाब आया अब वहां जाने का कोई मतलब नही है भाई साहेब...मुझे लगा बेकार में मोबाइल के पैसे खर्च कर मुर्दों से बात कर रहा हूँ....फोन काटकर मै सोचता रहा आखिर हम किस समाज में रहते है....वो समाज जो इंसान को मरने के बाद भी इंसान नही मानता...? क्या वो समाज जो मौत पर भी अमीरी गरीबी का कफ़न चढ़ाता है..? ऊँच-नीच,अमीर-गरीब सामाजिक व्यवस्था है...होनी भी चाहिए लेकिन क्या किसी की मौत के बाद मांगी जा रही मदद भी सामाजिक बन्धनों के दायरे में आती है...? अगर हाँ तो मै मानता हूँ की हम सबको तैयार रहना चाहिए हर दिन इंसानियत की अर्थी देखने के लिए...जिसे पेंड्रा के लोगो ने पिछले दिनों काफी करीब से देखा है.....

Friday, April 22, 2011

ग्राम-सुराज के बहाने...

 बैसाख की गर्म हवाओ के बीच सूबे के मुखिया डॉक्टर रमन सिंह इन दिनों ग्राम-सुराज के जरिये प्रदेशव्यापी दौरे पर है...सूबे का मुखिया आवाम की नब्ज टटोलने उड़न-खटोले में घूम-घूम कर देख रहा है की उसकी जन कल्याणकारी योजनाओ का असल लाभ जनता-जनार्दन को मिल रहा है या फिर केवल सरकारी कागजो पर ही सरकारी घोड़े दौड़ लगा रहे है ...ये कोशिश डॉक्टर २००५ से कर रहें है...साल में एक बार ग्राम-सुराज के जरिये रमन सिंह गाँव-गाँव जाकर जरुरतमंदो की नब्ज पर अपना अनुभवी हाथ रखकर उनकी समस्याओ के इलाज की तमाम कोशिशे कर रहे है....जनता से सीधा संवाद,समस्याओ के त्वरित निराकरण की कोशिश और कई बाते जो डॉक्टर की संवेदनशीलता का परिचय देती है...आयुर्वेद चिकित्सक के रूप में जीवन की शुरुवात करने वाला डॉक्टर चाहता है उसके राज्य में सब खुशहाल रहें...तभी तो राज्य के ३२ लाख से अधिक परिवार सरकारी खाद्यान्य को खाकर अघाए हुए है...ये सरकार और सरकारी तंत्र कहता है...सूबे का मुखिया चाहता है वो छत्तीसगढ़ को देश के अग्रणी राज्यों की सूचि में सबसे ऊपर लाकर खड़ा कर दे...राज्य में चिकित्सा सुविधा,शिक्षा,सड़कें,बिजली,पानी और सिंचाई के पर्याप्त संसाधन हो....उस दिशा में सरकार और सरकारी तंत्र की कोशिशे जारी है...सत्ता में आने के बाद मुफ्त के चावल ने डॉक्टर की छवि  जनता के बीच "चाउर वाले बाबा"के रूप में बनी जिसे अजीत जोगी जैसे तेज-तर्रार नेता ने दारु वाले बाबा के रूप में प्रचारित करने की कोशिश की...नतीजतन डॉक्टर ने इस साल राज्यं में २५० दुकाने बंद कर २०० करोड़ रुपये का घाटा सहन किया और इस बार गाँव-गाँव में दारु के मुद्दे पर खूब तालियाँ बटोर रहे है..
                                                                               ग्राम सुराज अभियान के तीसरे दिन यानि आज {२१ अप्रैल}डॉक्टर प्रदेश के अलग-अलग जिलो में जनता के बीच करीब ७ घंटे रहे...कई अधिकारीयों पर कारवाही की गाज गिरी तो कुछ चेतावनी देकर बख्श दिए गए...ग्राम सुराज के जरिये गाँव-गाँव पहुँचते डॉक्टर कभी पीपल पेड़ की छाँव के नीचे तो कभी किसी गरीब की चौखट पर बैठकर आने वाले समय की तस्वीर तैयार कर रहें है ....सरकारी मशीनरी सरकार की योजनाओं का कितनी ईमानदारी से क्रियान्वयन करवा रही है इसका आंकलन भी किया जा रहा है...कोरबा जिले के पुटा ग्राम में जनता की शिकायतों को गंभीरता से लेते डॉक्टर ने तत्काल एक भ्रष्ट तहसीलदार को निलंबित करके सन्देश दे दिया की जनता से बढकर कोई नही है..   
                                                      मैंने बिल्हा विकासखंड के ग्राम मंगला-पासिद में आयोजित वृहद् किसान सम्मलेन को देखा,तपती धूप में सैकड़ो लोगो की उम्मीद भरी निगाहे सूबे के मुखिया का इन्तेजार कर रही थी...दोपहर १२ बजे से ढोकर लाये गए लोगो का इन्तजार ३ बजकर ५२ मिनट १३ सेकेंड में ख़त्म हुआ...धूप में झुलस रहे लोगो के ऊपर से घूमता हुआ हेलीकाप्टर पास बने हेलीपेड पर उतर गया...हेलीकाप्टर के उतरने से गर्दो-गुबार की आंधी में कुछ देर के लिए सब खोया-खोया नजर आया...जब धुल का गुबार ख़त्म हुआ तो सूबे के मुखिया सहयोगी अफसरों के साथ नीचे आये....लोगो की भीड़ का हाथ हिलाकर डॉक्टर ने अभिवादन किया और बारी-बारी से औपचारिकतायें पूरी करते मंच पर आ गए....सरकार मंच पर महंगे पंखो की हवा और धूप की दिशा के विपरीत बनाये गए मंच की छाँव में थी...सरकार जिनकी खुशहाली और जरुरतो को जानने निकली है वो आम-आदमी सामने धूप में सर और चेहरा ढंके जमीन पर बैठा था...बैठते नही तो जाते कहाँ,क्योंकि भीड़ जो राज्य के मुखिया को दिखाई दे रही थी वो आई नही ढोकर लाई गई थी...फिर भी नेता खुश थे की चिलचिलाती धूप में जनता उनका इन्तेजार करते बैठी है....बड़े नेताओ के कार्यक्रमों में भीड़ जुटाने का काम आज से नही हो रहा है....दशको बीत गए,नेता के कद-काठी के मुताबिक भीड़ की जिम्मेवारी दे दी जाती है...खैर मंच पर मुख्यमंत्री का बड़ी-बड़ी मालाओ से स्वागत किया गया...छोटी मालाएं मंत्रियो के लिए थी...स्वागत करने वाले भी नए नही थे...पार्टी के वही चेहरे जो हर सभा में खुद खरीद कर लाई गई मालाओ से स्वागत करते है वो यहाँ भी दिखे...नौकरशाहों को भी माला पहनाने का बराबरी से मौक़ा मिला,बस माला नही पहना सकी तो सामने धूप में बैठी जनता...माला पहनाने वाले,पहनने वाले मंच पर सूखे गले की प्यास ठडे जूस से एक साथ बुझाते रहे और जनता धूप में पानी की तलाश में नजरे यहाँ-वहां घुमती रही...
                                                स्वागत-सत्कार और गला तर होने के बाद बारी जनता से अपनी उपलब्धिया बताकर उनकी मनह स्थिति जानने की थी....मंच संचालन करने वाले नेताजी ने सबसे पहले राज्य के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री कृष्ण मूर्ति बाँधी को बुलाया...किसी दुर्घटना में पैर की हड्डी टूट गई थी सो बैसाखी के सहारे माइक तक पहुंचे...जमकर सरकार की तारीफ...बोलते-बोलते बोल गए सरकार ने मस्तुरी विधानसभा में करोडो के काम करवाएं है,लेकिन कई समस्याएं आज भी है...कई ऐसी मांगे है जिनके पूरा होने से जनता राहत महसूस करेगी... ५ साल सरकार में मंत्री रहे बाँधी जी बोले बरसो से उनके इलाके में नए ट्रांसफार्मर नही भेजे गए जिसके चलते लो वोल्टेज की समस्या बनी हुई है...उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया की मस्तुरी नगर पंचायत को एक जे.सी.बी.मशीन दे दी जाये रोजगार गारंटी के काम की जरुरत नही पड़ेगी...मतलब नेताजी साफ तौर पर ये कह गए की लोगो को रोजगार मत दीजिये एक अदद मशीन दे दीजिये सारा काम हो जायेगा...बाँधी जी मंत्री रहते काफी सुर्खियों में रहे,लगातार दूसरी बार जीते भी तो डॉक्टर{रमन}ने उन पर भरोसा नही जताया...अब बेचारे यहाँ-वहां मौक़ा मिलते ही भड़ास निकाल लेते है....
                                         समय कम था इसलिए दो मंत्रियो को बोलने का मौक़ा नही मिला,बारी जब विधानसभा अध्यक्ष की आई तो वो सरकार का यशगान ऐसे करने लगे जैसे कोई हनुमान चालीसा का पाठ करता हो....रमन गान करते धरम लाल कौशिक ने भी कुछ मांगे रखी ....सबके बोलने के बाद डॉक्टर की बारी आई...उन्होंने सबसे पहले अपने चिर-परचित अंदाज़ में बोलना शुरू किया,सिंचाई,खाद्यान,रोजगार गारंटी,स्वास्थ्य के मुद्दों पर सरकारी आंकड़ो के दम पर खूब बोले...हाँ इस बार जनता चावल,नमक पर तालियाँ पीटने की बजाय शराब के मुद्दे पर रमन जिंदाबाद के नारे लगाती रही...डॉक्टर रमन जनता की नब्ज टटोल रहे थे,तालियाँ बजी तो समझ गयें की यहीं से कोई उम्मीद की किरण निकल सकती है....रमन सिंह ने कहा की सरकार के जिम्मे परिवर्तन नही हो सकता...जनता को,समाज को जागरूक होना पड़ेगा...सबकी जिम्मेवारी है समाज से बुराई को मिटायें....मतलब रमन जी अभी से समझने की कोशिश में जुट गयें है की मिशन २०१४ को कैसे फतह किया जाये....
                     ग्राम-सुराज के जरिये समस्या जानकर सुलझाने की कोशिश में एक बार फिर गांव-गाँव घुमती सरकार क्या उन समस्याओ को जान रही है जिनके आवेदन पिछले बरस आये थे...? उन समस्याओ का क्या हुआ जिसके लिए कल तक कलेक्टर के दफ्तर में लोग कागजी पुलिंदा लिए खड़े थे...? नौकरशाह या फिर सरकार उन गांवो में क्यूँ नही जा रही जहाँ पिछली बार गई थी...? ऐसे कई सवाल जिसे पूछने पर सरकार और नौकरशाह दोनों नाराज हो जाते है....मिडिया थोड़ी बहुत कोशिश कर रहा है सच सामने आये...मिडिया की परेशानी है वो सरकार से विज्ञापन की खुराक ले रही है सो ज्यादा नही लिखा सकती....आम जनता बोले तो किससे बोले....खासकर वो भीड़ जो आई नही जुटाई गई हो...जिस भीड़ के लिए नेताओ ने नाच-गाने के जरिये मनोरंजन की व्यवस्था की हो उससे कुछ उम्मीद करना भी बेमानी है....वो जनता क्या बोलती जो चिलचिलाती धूप में छोटे-छोटे बच्चो को लिए सूबे के मुखिया के जाने के बाद सुबह से बनी पुड़ी-आलू के पैकेट का  इन्तजार कर रही थी..इन तमाम बातो को धूप में बैठी खामोश जनता समझ रही है,जनता मंच पर हो रहे नाच को देखकर सफेदपोशो और नौकरशाहों के चेहरे पहचान रही है....नेता जी भूल रहे है की जनता की बदौलत ही लाल बत्ती,सुरक्षा,और तमाम संसाधन मिले है....जमीन पर बैठे पुड़ी-आलू की सब्जी और मंच पर नेताओ को जूस पीते देख पानी की तलाश करते लोग ही आने वाले समय में तकदीर का फैसला करेंगे...वैसे ढोये उस दिन भी जायेंगे, ढोये आज भी गए है...

Tuesday, April 19, 2011

गांधी,अन्ना के देश में...

टेलीफोन बिल पटाने वालो की कतार में आज मै डेटा कार्ड का बिल पटाने खड़ा हुआ...ज्यादा तो नही फिर भी आधे घंटे तक खड़े रहने लायक लाइन लगी हुई थी...एक आदमी बड़े जोर से नमस्ते भैया बोलकर पास आया,मैंने सोचा मुझे जनता होगा लेकिन भ्रम चन्द सेकेंडो में दूर हो गया...उसने मेरे पास आते ही कहा बेकार गर्मी में खड़े है २० रूपये लगेंगे २ मिनट में काम हो जायेगा...मतलब जिसने मुझे नमस्कार किया वो दरअसल मुझे नही अपने ग्राहक को सलाम ठोंक रहा था...पीछे के दरवाजे से टेलीफोन का बिल पटाकर वो मुझे रसीद देता और बीस रूपये लेता...जब तक मै कुछ समझ पाता तब तक खिड़की के पास तक मै सरकता हुआ पहुँच चूका था...वो शख्स भी पीछे वालो को सलाम ठोकता दिखा लेकिन इन सब के बाद मै सोचने लगा की भारत के भ्रष्टाचार पर जलवायु परिवर्तन की ही तरह अकादमिक चर्चा अक्सर होती है...कभी कोई अति-उत्साही सुझाव देता है- 'चीन की तरह मौत की सज़ा होनी चाहिए'...फिर अति-व्यावहारिक सुझाव आता है-'रिश्वत का रेट फ़िक्स होना चाहिए...'अकादमिक यानी हमारा कोई 'लेना-देना' नहीं है, 'हम तो देश भविष्य के लिए चिंतित हैं'. भ्रष्टाचार पर चर्चा में हमारा अपना आचरण कितना 'भ्रष्ट' है इसका एहसास न होना एक बड़ी समस्या है.संयोगवश 'लेने' लायक़ हालत मेरी कभी नहीं रही, लेकिन 'देने' का दर्द भूला नहीं हूँ, इसमें 'देने' से मना न कर पाने की ग्लानि भी शामिल है, यानी मैं नहीं कह सकता कि मेरा कोई 'लेना-देना' नहीं है.भ्रष्टाचार लोकाचार है, ये एहसास पहली बार १७ साल की उम्र में हुआ जब नए बने मकान में पानी का कनेक्शन जुड़वाने के लिए अपने हाथों से घूस दी, अपने उबलते ख़ून से ज्यादा परवाह पीने के पानी की थी. उसूलों की लड़ाई में नया घर करबला बन सकता था.
                               अक्सर सोचता हूँ कि भ्रष्टाचार को लेकर भारतीय लोग इतने सहनशील क्यों हैं? क्यों ऐसा होता है कि टेलीफ़ोन घोटाले में पकड़ा गया नेता टेलीफ़ोन चुनाव चिन्ह के साथ चुनाव लड़कर भारी बहुमत से जीत जाता है...बचपन में हमें सिखाया जाता था-- 'जो मिल-बाँट खाए, गंगा नहाए'... कहीं ये उसका असर तो नहीं? रोटी के आटे में से कुछ मछलियों के लिए, एक रोटी गाय के लिए, एक रोटी कुत्ते के लिए, एक कौव्वे के लिए...यानी सबका थोड़ा-थोड़ा हिस्सा...कहीं भ्रष्टाचार को 'सर्वजन सुखाय' की तरह देखने की हमारी आदत तो नहीं. थोड़ी-सी तकलीफ़ सिर्फ़ तब होती है जब 'देना' पड़ता है (बिल्कुल दहेज की तरह) वर्ना यह भी एक व्यवस्था है जिसे कोई अकेले नहीं बदल सकता, और यहाँ आकर महान लोकतंत्र के सभी नागरिक अकेले हो जाते हैं....भ्रष्टाचार ख़त्म करने के नारे कभी-कभी लगते हैं,अभी अन्ना जोर मार रहे है लेकिन ये कोई नहीं सोचता कि अगर सदाचार आ गया तो क्या होगा, इसलिए नहीं सोचता क्योंकि ऐसा होने का यक़ीन किसी को नहीं है,देखते है अन्ना की लड़ाई कितनी राहत देती है...अभी तो ऐसा है की घूस लेते हुए पकड़े गए तो देके छूट जाएँगे, इस बात का पूरा यक़ीन है....मेरे ही न जाने कितने दोस्त-रिश्तेदार उसी के सहारे अपना घर चला रहे हैं. सरकारी और प्राइवेट की तरह यह रोज़गार देने वाला तीसरा बड़ा सेक्टर है, हर दफ़्तर में जितने कर्मचारी नियुक्त होते हैं वे अपने तीन-चार एजेंट तैनात करते हैं, ये एजेंट कभी एप्लायमेंट एक्सचेंज पर नहीं जाते, बेरोज़गारी के आंकड़े में वे शामिल नहीं हैं, उनका घर भी चलता रहता है, आपका काम भी हो ही जाता है...भरष्टाचार से बहुत दुखी होकर एक बार मैं अपने एक अनुभवी और व्यावहारिक मित्र के पास गया. उन्होंने कहा, "तो दे दो न, इतना परेशान क्यों हो रहे हो, दोगे भी और ऊपर से परेशान भी हो".
                                 मेरा मन नहीं माना तो उन्होंने मुझे शांत करने के लिए वही कहा जो गौतम बुद्ध ने पुत्रशोक में विह्वल महिला से कहा था. 'ऐसे घर से एक मुट्ठी चावल ले आ आओ जहाँ कभी कोई न मरा हो...' वे बोले, "मुझे एक ऐसे आदमी से मिलवा दो जिसने घूस न ली हो, न दी हो."

Monday, April 18, 2011

सुख-दुःख और मेरे माँ-पापा

 आज सुबह से ही पता नही क्यों अच्छा नही लग रहा है,रह-रहकर माँ पापा की याद जहेन में उफान मारती  रही...किसी काम में मन नही लग रहा था,पर ऑफिस आया हूँ तो काम करना ही पड़ेगा ये सोचकर बिना मन के काम में जुट गया...आज हनुमान जी की जयंती है सो भगवान के श्री चरणों में नमन करके उन्ही की एक खबर बनाने में जुटा   ...कुछ देर बाद मैंने अपने सबसे अच्छे मित्र{लेपटॉप}को बैग से बाहर निकला और मन में चल रही बातो को शब्दों की शक्ल देने लगा...
                                                   ज़िंदगी मां के आँचल की गांठों जैसी है...गांठें खुलती जाती हैं,किसी में दुःख और किसी में से सुख निकलता है...हम अपने दुःख में और सुख में खोए रहते हैं. बढ़ती उम्र के साथ न तो मां का आँचल याद रहता है और न ही उन गांठों को खोलकर मां का पापा से छिपाकर वो चवन्नी अठन्नी देना....याद नहीं रहती वो मां की थपकियां...चोट लगने पर मां की आंखों से झर झर बहते आंसू....शहर से लौटने पर बिना पूछे वही बनाना जो मुझे पसंद है...माँ शहर आते समय लाई, चूड़ा, बादाम और न जाने कितनी पोटलियों में अपनी यादें निचोड़ कर डाल देती है...याद रहता है तो बस बूढे मां बाप का चिड़चिड़ाना...उनकी झिड़कियां और हर बात पर उनकी बेजा सी लगने वाली सलाह...आज सोच रहा हूँ याद नहीं कब मां को फोन किया था...कभी ऑफिस में फोन आया तो यह कहते हुए काट दिया कि बिज़ी हूं बाद में करता हूं...वैसे मेरी माँ को फोन करना नहीं आता...घर में टेलीफोन भी लगा है और पापा ने मोबाईल भी खरीद कर दे रखा है...सरकारी टेलीफोन पर ज्यादा भरोसा नही है उन्हें...वैसे भी वो महीने में २० दिन आउट ऑफ़ आर्डर रहता है...माँ को पापा ने जो मोबाईल दिया है उसका बस एक बटन उसे पता है जिसे दबा कर वो फोन रिसीव कर लेती है... मुझे अच्छे से याद है जब भी पैसे चाहिए रहते थे कहीं से किसी से भी फ़ोन,मोबाईल मांगकर उनको याद कर लेता था...जरुरत आज भी पड़ती है लेकिन अब पैसे मांगने में शर्म आती है...मै आज भी नही भुला हूँ पिताजी की चिंता को,कुछ साल पहले तक हर पहली तारीख को नियम से ३००० रुपये का एक डी.डी. बिलासपुर भेज दिया करते थे...शायद ही कभी फोन पर कहना पडा हो मां-पापा पैसे नहीं है...जब मैंने अपनी मर्जी से प्रेम विवाह किया तो भी कुछ दिनों की नाराजगी के बाद उन्होंने मेरी खुशियों के लिए अपने अरमानो को हमेशा के लिए मन में दफ़न कर दिया...यक़ीनन हर माँ-बाप की इच्छा होती है उसका बेटा पढ़ लिखकर कुछ बने,वो धूम-धाम से उसकी शादी कर उसका घर बसायें.. अब मेरी माँ को मेरी बिटिया से बेहद प्यार है,उसके लिए वो किसी से कुछ भी नही सुन सकती...वैसे माँ-पापा ने मुझसे कभी कोई डिमांड नही की,आज भी फ़ोन करने पर सबसे पहला सवाल कैसे हो,घर कब आओगे...? मै जल्दी आऊंगा कहकर फ़ोन कट देता...यक़ीनन उस सवाल का जवाब मेरे पास नही होता...मै जिस चैनल में काम करता हूँ वहां शायद लोग मेरी काबिलियत से चिढ़ते है,मुझसे काम के दम पर नही निपट सकने वाले मेरे साथी दूसरी लगाई-बुझाई में व्यस्त रखने की कोशिश किये रहते है...जाहिर तौर पर मै सारे दिन का बड़ा हिस्सा उन लोगो की उलझन भरी बातो के बीच काटता हूँ...मेरा दिमाग स्थाई नही है तभी तो क्या-लिखने जा रहा था क्या लिख रहा हूँ...खैर वक्त के साथ मेरे बच्चे बड़े होते जा रहे है और माँ-पापा बूढ़े....कई माँ-बाप की इच्छा होती है उनकी औलाद उन्हें चारो धाम की यात्रा करवाए परन्तु मेरे माँ पापा को कभी किसी धाम घुमने की इच्छा नही हुई...माँ बहुत संकोची और रिजर्व स्वाभाव की है,कहीं भी आना-जाना पसंद नही करती...पापा सरकारी नौकरी में है सो उन्हें अपने काम-धाम में ही चारो धाम नजर आता है....मै उनसे करीब ४०० किलोमीटर दूर रहता हूँ चाहूँ तो कम से कम महीने में एक बार समय निकालकर उनके पास जा सकता हूँ लेकिन अब बड़ा हो गया हूँ,माँ-पापा से ज्यादा अच्छे दोस्त-यार लगते है...पता नही क्यों घर नही जाना चाहता...?कई-कई दिन,कई त्योहारों पर आँखे भीग जाती है उनको याद करते...अभी भी आँखों में पानी भरा है यक़ीनन लिखते हुए एक शब्द कई जगहों पर नजर आ रहे है...सोचता हूँ माँ -पापा से क्या बाते करूँगा...वही ऑफिस के बारे में कुछ बातें,तो कई बातो में आस-पड़ोस के लोगो का जिक्र....अब सोचता हूँ जाने हमने कितने सवाल पूछे होंगे मां-बाप से लेकिन शायद ही कभी डांट भरा जवाब मिला हो...लेकिन हमारे पास उन्हें देने के लिए आज भी कुछ नहीं है,जो वक्त हम उन्हें दे सकते है उसे देने से भी पता नही क्यों परहेज करते है.... मै यकीन से कह सकता हूँ की हमारे बटुओं में सिर्फ़ झूठ है...गुस्सा है...अवसाद है...बनावटी चिड़चिडापन है...उनकी गांठों में आज भी सुख है दुःख है और हम खोलने जाएं तो हमारे लिए आशीर्वाद के अलावा और कुछ नहीं है...अब नही लिखा जाता पर इन सब बातो का जिक्र करते-करते मै ये भूल क्यूँ जाता हूँ की मेरा भी एक बेटा है...

Sunday, April 17, 2011

...कहाँ से आया ११ सौ करोड़

पने बड़बोलेपन और बेबाक बयानों के लिए बदनाम दिग्गी राजा यानी  कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर से योग गुरू बाबा रामदेव पर कटाक्ष किया है... दिग्गी राजा कहते है की योग गुरु बाबा रामदेव के पास १० साल पहले तक अपनी साईकिल का पंचर जुडवाने के लिए पैसे नही थे आज वो एक हजार एक सौ करोड़ के आसामी आखिर कैसे बन गए...? दिग्विजय सिंह का यह  बयान  आज के अखबारों में पढ़कर लगा जैसे वो अपनी खीझ मिटा रहे हो या फिर बाबा के बार-बार काला धन वापस लाओ की मांग से परेशान है....वजह जो भी हो दिग्गी बाबू बड़ी ही बेबाकी से बाबा रामदेव के खिलाफ बोल रहें है...उनका बयान पढ़कर लगता है की बाबा की फजीहत का दौर जल्द शुरू होने वाला है....पिछले कई महीनो से काला धन वापस भारत लाने और भ्रष्टाचार ख़त्म करने के लिए आवाज उठाते योग गुरु को हालाँकि अपेक्षित जनसमर्थन नही मिला जबकि अन्ना हजारे ने ९८ घंटे में ही  आमरण अनशन के जरिये  देश का व्यापक जनसमर्थन हासिल कर लिया...जाहिर है योग गुरु के विरोध और अन्ना के विरोध का तरीका और मकसद दोनों अलग है....तभी तो सैकड़ो सभाओ में गला फाड़ने के बाद भी बाबा रामदेव जनता का विश्वास हासिल नही कर सके...हालाँकि पिछले दिनों बाबा ने अन्ना के मंच से खूब भड़ास निकली...जब तक राजनेता रामदेव को केवल योग गुरु मान रहे थे तब तक उनके सम्मान में कोई भी बयान देने से बचते रहे लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से बाबा ने राजनीती में आने के संकेत दे दिए तो नेताओ ने दिल में उनके खिलाफ भरा गुबार  बाहर निकलना शुरू कर दिया.. तभी तो दिग्गी राजा ने इंदौर में मिडिया के समक्ष कहा कि आज से 10 साल पहले योग गुरू के पास साईकिल का पंचर बनवाने के लिए पैसे नहीं थे, और आज वो करोड़ो-अरबों के मालिक है आखिर उन के पास कोई जादू की छड़ी आ गई है क्या जिसके चलते वो रातों रात राजा बन गये, उन्हें अपनी संपत्ति का ब्यौरा हर हलात में सार्वजनिक करना चाहिए....कालेधन पर नकेल कसने के लिए तैयार बाबा रामदेव पहले अपने गड़े धन के बारे में बतायें, सबको पता है कि अगर कोई ईमानदारी से कमाये तो उसे दस साल क्या बीस से पच्चीस साल लगेंगे करोड़ो कमाने में...दिग्गी ने ये भी कहा कि इस बात की जांच होनी चाहिये कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ़ बडी-बडी बातें करने वाले योग गुरु को दान में कहीं काला धन तो नहीं मिला...? 
                                 बिल्कुल,बाबा रामदेव को अपनी सारी संपत्ति और ट्रस्ट का लेखा-जोखा सार्वजनिक कर देना चाहिए...लेकिन ये तब संभव होगा जब बाबा सफ़ेद और काले धन में अंतर स्पष्ट कर देंगे...मतलब बाबा पहले ये साफ़ कर दे की ट्रस्ट में दान के रूप में आने वाली हजारो-करोडो की राशि कौन से धन{काला-सफ़ेद}में शामिल है..? बाबा ने राजनेताओ पर निशाना साधा तो भला दिग्गी जैसे चालाक राजनीतिज्ञ का खामोश रहना शायद संभव नही था...तभी तो दिग्गी बाबू ने योग गुरु से पूछ ही लिया कि बाबा जी आपके पास तो साईकिल का पंचर बनाने राशि नही थी तो भला १० साल में ऐसा कौन सा जादू हो गया कि आप ११०० करोड़ के मालिक बन बैठे...? जवाब में बाबा जो भी कहें लेकिन ये तय हो गया है कि बाबा की राजनीति में आने की लालसा उनके कपडे कम करती चली जाएगी...
                     मुझे आज भी याद है अविभाजित मध्यप्रदेश के ज़माने में छत्तीसगढ़ के संत पवन दीवान का काफी नाम हुआ करता था...मै उस वक्त स्कूल में पढ़ता था,पापा और उनके परचितो से संत पवन दीवान की कभी कभार चर्चा कानो में सुने दे जाया करती थी,आज जब मै जानने समझने लायक हुआ तो उन्ही पवन दीवान का नाम दूर-दूर तक कानो में नही सुनाई पड़ता...वजह सिर्फ राजनीति लालसा...मुझे लगता है बाबा की हालत भी कुछ वैसी ही होने वाली है हालाँकि अभी ना तो बाबा ने किसी राजनैतिक पार्टी का एलान किया है ना किसी राष्ट्रीय पार्टी को खुलकर समर्थन देने की घोषणा...परिस्थितिया उन दिनों क्या होंगी जब योग गुरु राजनीति के दलदल में खुले तौर पर छलांग लगा देंगे,क्योंकि इस मुल्क के आवाम ने कई साधू-महात्माओ के कपडे फटते और उतरते देखे है...ऐसे में कांग्रेस महासचिव का योग गुरु के खिलाफ इतना सख्त बयान सही मायने में बाबा जी को वक्त बिगड़ने से पहले की चेतावनी है....  
                                                 वैसे भी योग गुरु के योग की जरुरत खाए-पीये अघाए लोगो को है...जो इस देश का श्रम वीर है उसे आज भी योग की जरुरत नही है...गरीब और मेहनतकश को करेले,लौकी के जूस की जरुरत नही है....बाबा जी ये भूल गए है की सड़क की लड़ाई या यूँ कहूँ की सड़क पर पसीना मेहनतकश लोग बहाते है ऐसे में बाबा के साथ समर्थको का संकट आने वाले  दिनों में जरुर नजर आएगा ..खैर बाबा जी ने पिछले १० बरस में आर्थिक सम्पन्त्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल करने के बाद राजनीतिक सम्मान पाने का खवाब संजो रखा है...देखते है बाबा को आने वाला वक्त कितना सम्मान और यश दिलाता है....

Friday, April 15, 2011

कान्ति और नंदू भईया से उम्मीद

                       कांग्रेस के बारे में कहा जाता है कि उसे,उसके कार्यकर्ता नहीं, नेता हराते हैं। पिछले दस सालों से मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में पस्तहाल पड़ी कांग्रेस के लिए भी यह टिप्पणी नाजायज नहीं है। लंबी खामोशी के बाद आखिरकार आलाकमान ने दोनों सूबों में नए प्रदेश अध्यक्षों को कमान दे दी है। मध्यप्रदेश में वरिष्ठ आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया और छत्तीसगढ़ में पूर्व गृहमंत्री , वरिष्ठ विधायक नंदकुमार पटेल की ताजपोशी की गयी है। दोनों राज्यों में कांग्रेस का संगठन पस्तहाल है इसलिए दोनों प्रदेश अध्यक्षों के सामने चुनौतियां कमोबेश एक सरीखी ही हैं।
मप्र और छत्तीसगढ़ दोनों राज्य कांग्रेस के परंपरागत गढ़ रहे हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेताओं रविशंकर शुक्ल,द्वारिका प्रसाद मिश्र से लेकर श्यामाचरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ल, अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा, दिग्विजय सिंह,अरविंद नेताम, कमलनाथ, स्व.माधवराव सिंधिया तक एक लंबी परंपरा है जिसने अविभाजित मध्यप्रदेश को कांग्रेस का गढ़ बनाए रखा। खासकर आदिवासी इलाकों में कांग्रेस का जनाधार अविचल रहा है। पर कहानी इस एक दशक में बहुत बदल गई है। कांग्रेस के परंपरागत गढ़ों में भाजपा की घुसपैठ ने उसे हाशिए पर ला दिया है। राज्य विभाजन के बाद के बाद नए बने छत्तीसगढ़ राज्य में भी भाजपा की तूती बोलने लगी। जबकि छत्तीसगढ़ का परंपरागत वोटिंग पैर्टन हमेशा कांग्रेस के पक्ष में रहा है। आखिर इन सालों में ऐसा क्या हुआ कि भाजपा को कांग्रेस के गढ़ों में बड़ी सफलताएं मिलने लगीं। बात चाहे छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके की हो, सरगुजा इलाके की या मप्र के आदिवासी क्षेत्रों की, भाजपा हर जगह अपना जनाधार बढ़ाती नजर आ रही है। पिछले दिनों मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कुल तीन विधानसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव में भाजपा की जीत के मायने तो यही थे कि राज्यों में उसकी सरकारों पर जनता का भरोसा कायम है। यह चुनाव भाजपा के लिए जहां शुभ संकेत हैं वही कांग्रेस के लिए एक सबक भी हैं कि उसकी परंपरागत सीटों पर भी भाजपा अब काबिज हो रही है। कांग्रेस की संगठनात्मक स्थिति बेहतर न होने के कारण वह मुकाबले से बाहर होती जा रही है। एक जीवंत लोकतंत्र के लिए यह शुभ लक्षण नहीं है। कांग्रेस को भी अपने पस्तहाल पड़े संगठन को सक्रिय करते हुए जनता के सवालों पर ध्यान दिलाते हुए काम करना होगा। क्योंकि जनविश्वास ही राजनीति में सबसे बड़ी पूंजी है। हमें देखना होगा कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में की तीन सीटों पर हुए उपचुनावों में कांग्रेस का पूरा चुनाव प्रबंधन पहले दिन से बदहाल था। भाजपा संगठन और सरकार जहां दोनों चुनावों में पूरी ताकत से मैदान में थे वहीं कांग्रेस के दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों की छग और मप्र के इन चुनावोंमें बहुत रूचि नहीं थी। इससे परिवार की फूट साफ दिखती रही। जाहिर तौर पर कांग्रेस को अपने संगठन कौशल को प्रभावी बनाते हुए मतभेदों पर काबू पाने की कला सीखनी होगी।शायद इसी के मद्देनजर इस बार मप्र कांग्रेस संगठन की कमान एक आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया को दी गयी है।
                                  मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों में भाजपा लगातार दूसरी बार सत्ता में हैं। इन राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और डा. रमन सिंह दोनों जनता के बीच एक लोकप्रिय नाम बन चुके हैं। जनता ने दोनों को दोबारा चुनकर दो संदेश दिए हैं एक तो इन मुख्यमंत्रियों की लोकप्रियता कायम है दूसरा कांग्रेस का संगठन दुरूस्त नहीं है। कांग्रेस के दोनों नवनिर्वाचित अध्यक्षों को इस मामले में बहुत काम करने हैं। दोनों राज्यों में विपक्ष की आवाज बहुत दबी-दबी सी लगती है। विधानसभा से लेकर सड़क तक एक सन्नाटा है। मध्यप्रदेश में विधानसभा के नए नेता प्रतिपक्ष बने अजय सिंह राहुल ने भी माना है कि पार्टी का प्रदर्शन विधानसभा में बहुत अच्छा नहीं रहा और इसके लिए हम सब जिम्मेदार हैं। अब यह देखना है कि मध्यप्रदेश जहां नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष दोनों पदों पर नया नेतृत्व दिया गया है, वहां किस तरह से कांग्रेस अपनी ताकत का विस्तार करती है। 
                                    इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस की स्थितियां बहुत बेहतर नहीं हैं। यहां भी कांग्रेस गुटों में बंटी हुयी है। अजीत जोगी समर्थक विधायक विधानसभा में अलग सुर में दिखते हैं तो नेता प्रतिपक्ष रवींद्र चौबे अलग-थलग पड़ जाते हैं। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे धनेंद्र साहू भी इस बिखरे परिवार में कोई उत्साह नहीं फूंक सके, बल्कि खुद भी विधानसभा का चुनाव हार गए। हाल में हुए दो विधानसभा सीटों के उपचुनावों में भी कांग्रेस को मात खानी पड़ी। ऐसे में भाजपा का उत्साह चरम पर है। अब पूर्व गृहमंत्री नंदकुमार पटेल जो पिछड़ा वर्ग से आते हैं और खरसिया क्षेत्र से लगातार पांचवी बार विधायक बने हैं, से बहुत उम्मीदें लगाई जा रही हैं। भाजपा ने इस कांग्रेस प्रभावित इलाके में तेजी से अपनी संगठनात्मक शक्ति का विस्तार किया है। खासकर आदिवासी इलाकों में उसे बड़ी सफलताएं मिली हैं, जो कभी कांग्रेस के गढ़ रहे हैं। इन दिनों चल रहा बस्तर लोकसभा का उपचुनाव भी इसकी एक परीक्षा साबित होगा। यह सीट भाजपा सांसद बलिराम कश्यप के निधन से खाली हुयी है। यहां भाजपा ने बलिराम कश्यप के बेटे दिनेश कश्यप और कांग्रेस ने अपने वर्तमान विधायक कवासी लखमा को चुनाव मैदान में उतारा है। देखना है कि इस उपचुनाव के संकेत क्या आते हैं। कुल मिलाकर नंदकुमार पटेल के सामने चुनौतियां बहुत हैं और कांग्रेस संगठन को खड़ा करना आसान नहीं है। बावजूद इसके वे अगर अपने दल में प्राण फूंककर उसे पुर्नजीवन दे पाते हैं तो ये बड़ी बात होगी। छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी यहां एक बड़ी ताकत हैं। मुश्किल यह है कि उनके विरोधी भी उतने ही एकजुट हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा भी इसी राज्य से हैं। सो दिल्ली में दोनों गुटों को पैरवीकार मिल ही जाते हैं। इस जंग में कांग्रेस आपसी सिर फुटौव्वल से काफी नुकसान उठाती है। यह साधारण नहीं था कि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के कई दिग्गज नेता महेंद्र कर्मा,सत्यनारायण शर्मा, धनेंद्र साहू, भूपेश बधेल चुनाव हार गए। जिसका श्रेय कांग्रेस की आपसी गुटबाजी को ही दिया गया। सन 2000 में नया राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ के समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। राज्य का परंपरागत नेतृत्व पूरी तरह हाशिए पर है। नए नेतृत्व ने राज्य में अपनी जगह बना ली है। कांग्रेस में अजीत जोगी और भाजपा में डा. रमन सिंह दोनों ही राज्य गठन के बाद बहुत महत्वपूर्ण हो उठे। इन नेताओं के विकास ने राज्य में सक्रिय रहे परंपरागत नेतृत्व को झटका दिया और सारे समीकरण बदल दिए। भाजपा संगठन केंद्रित दल था सो उसे तो बहुत झटके नहीं लगे किंतु कांग्रेस इस बदलाव को स्वीकार नहीं पायी और उसकी रही-सही ताकत भी दो चुनाव हारने के बाद जाती रही। अब नए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नंदकुमार पटेल के सामने चुनौतियां बहुत बड़ी हैं। एक तो उन्हें बिखरे परिवार को एकजुट करना है साथ ही भाजपा की संगठित शक्ति का मुकाबला भी करना है। नंदकुमार पटेल को जानने वाले जानते हैं कि वे कभी बहुत हाईप्रोफाइल नेता नहीं रहे, किंतु यह उनकी बड़ी ताकत भी है। कांग्रेस को इस समय राज्य में एक ऐसे नेता की जरूरत है जो राज्य भर में पहचान रखता हो, सबको साथ लेकर चल सके और कांग्रेस के खत्म हो चुके आत्मविश्वास को भर सके। नंदकुमार पटेल, जहां राज्य के ताकतवर अधरिया समाज से आते हैं,जो आता तो पिछड़ा वर्ग में है किंतु संपन्न किसान है। साथ ही मप्र और छत्तीसगढ़ में गृहमंत्री रहते हुए उनका चेहरा जाना-पहचाना है। एक विधायक के नाते लंबी पारी ने उनके संसदीय अनुभव को भी समृद्ध किया है। उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात यह है कि वे उस खरसिया इलाके से चुनकर आते हैं जो कांग्रेस का अभेद्य दुर्ग है। जहां कभी दिग्गज नेता अर्जुन सिंह और दिलीप सिंह जूदेव की चुनावी जंग हुयी है और अर्जुन सिंह को काफी पसीना बहाना पड़ा था। उसके बाद से यह सीट पटेल के पास है। भाजपा सारा दम लगाकर इस सीट को जीत नहीं पाई, उसके दिग्गज नेता स्व.लखीराम अग्रवाल भी नंदकुमार पटेल को चुनाव न हरा सके। इसलिए खरसिया का एक प्रतीकात्मक महत्व भी है और यह संकेत भी पटेल अपने इलाके से फ्री होकर बाकी राज्य में समय दे सकते हैं। जबकि पिछले विधानसभा चुनाव में तो यह हुआ कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष (घनेंद्र साहू) और कार्यकारी अध्यक्ष (सत्यनारायण शर्मा) दोनों चुनाव हार गए। विधानसभा में तो,एक विधायक के नाते नंदकुमार पटेल सरकार को अक्सर घेरने में सफल रहते हैं किंतु एक संगठन के मुखिया के तौर उनकी परीक्षा अभी शेष है। यह कहने में संकोच नहीं कि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश अभी तक प्रतिपक्ष विहीन ही हैं। यह बदलाव अगर इन प्रदेशों में प्रतिपक्ष की वापसी का संकेत बन सके तो यह दोनों राज्यों की जनता और उनके सवालों के लिए शुभ होगा। फिलहाल तो मध्यप्रदेश और छ्त्तीसगढ़ राज्यों में बदले नेतृत्व से कांग्रेस को क्या हासिल होगा इस पर अभी कुछ कहना बहुत आसान नहीं है।

बिनायक देशद्रोही नही...


खिरकार आज १५ अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकार कार्यकर्ता और चिकित्सक बिनायक सेन की ज़मानत याचिका को मंज़ूरी दे दी है...कोर्ट ने अपने निर्देश में कहा है,"बिनायक सेन के ख़िलाफ़ राजद्रोह का आरोप नहीं बनता...हम एक लोकतांत्रिक देश हैं, बिनायक नक्सलियों से सहानुभूति रखने वालों में से हो सकते हैं लेकिन इस बिनाह पर उनके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मामला नहीं लगाया जा सकता."इससे पहले सरकारी वकील ने तर्क देते हुए कहा था कि बिनायक सेन को ज़मानत न दी जाए...वकील के मुताबिक अगर बिनायक सेन को ज़मानत मिली तो वे छत्तीसगढ़ में प्रत्यक्षदर्शियों को प्रभावित कर सकते हैं जैसा कि अमित शाह ने गुजरात में किया था...इस पर जज ने कहा कि दोनों व्यक्तियों की तुलना नहीं हो सकती और फिर ज़मानत याचिका को मंज़ूरी दे दी....अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रति छत्तीसगढ़ की निचली अदालत को दी जाएगी, जिसके बाद वो ये तय करेगी कि ज़मानत किन शर्तों पर दी जाए...बिनायक सेन के घर से माओवादी समर्थक साहित्य मिलने के सबूतों के आधार पर पिछले साल छत्तीसगढ़ की एक निचली अदालत ने उन्हें राजद्रोह के लिए दोषी करार दिया था...आज बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी के पास किसी विचारधारा से जुड़ा साहित्य मिलने से उस व्यक्ति पर उसी का प्रचारक होने का आरोप नहीं लगाया जा सकता...उदाहरण के तौर पर कोर्ट ने कहा, "कई लोगों के घर में महात्मा गांधी की आत्मकथा की प्रति मिलेगी, इसका मतलब ये नहीं कि वो व्यक्ति गांधीवादी हैं."कोर्ट में बिनायक सेन की तरफ से जिरह करने वाले वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी ने कहा कि इस केस को जीतने से उन्हें निजी तौर पर खुशी हुई है....जेठमलानी ने कहा, "ये केस लोकतंत्र के मूल दर्शाता है, क्योंकि लोकतंत्र में सबको आज़ादी से अपने विचार रखने का अधिकार होता है.".उम्र क़ैद की सज़ा के खिलाफ बिनायक सेन ने बिलासपुर उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था लेकिन वहाँ उनकी अर्ज़ी ख़ारिज हो गई थी जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी...हाई कोर्ट में दाखिल की गई अपील में बिनायक सेन ने कहा था कि अभियोजन पक्ष के कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाने के बावजूद निचली अदालत ने उन्हें दोषी क़रार देकर सज़ा सुनाई है....बिलासपुर उच्च न्यायलय में भी उनके मामले की पैरवी वकील राम जेठमलानी ने की थी. जेठमलानी भारतीय जनता पार्टी के सांसद भी हैं और छत्तीसगढ़ में उन्हीं की पार्टी की सरकार है...अदालत मे दाख़िल किए गए अपने हलफ़नामे में छत्तीसगढ़ सरकार ने दावा किया था कि बिनायक सेन ने देश में नक्सलवाद के विस्तार में समर्थन दिया है और इस काम में हर तरह की मदद मुहैया करवाई है...बिनायक सेन की गिरफ़्तारी और सज़ा का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ा विरोध हुआ है और विश्व की जानी मानी हस्तियों ने भारतीय प्रधानमंत्री से उनकी रिहाई की अपील की थी...
                   बिनायक को जमानत मिलने के बाद उनकी पत्नी एलिजा ने भी कह दिया की "मै काफी खुश हूँ,बुरा सपना ख़त्म हुआ"...निश्चित तौर पर बिनायक के परिजनों और समर्थको की कठिनाइयों भरी राह अब कुछ आसान होगी...सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने ये तो साबित कर दिया की छत्तीसगढ़ सरकार ने पर्याप्त सबूतों के बिना बिनायक पर तमाम दोषारोपण कर दिया...निचली अदालत ने पुलिस के आरोपों और पेश दस्तावेजो के बिनाह पर चिकित्सक डॉक्टर बिनायक सेन को राजद्रोही करार दिया...राष्ट्रद्रोह का आरोपी मानकर बिनायक को उम्र कैद की सजा तो दे दी गई लेकिन उनके समर्थक और देश के कई वर्गों से जुड़े लोग उस फैसले से नाखुश हुए...मै भी हुआ...खैर जो भी हुआ बीता हुआ कल था,अब उम्मीद की रौशनी निकल आई है जिसके उजाले में बिनायक जैसे सेवाभावी चिकित्सक अपनी राह पर चलते हुए सच को सामने जरुर लायेंगे...
                     इधर बिनायक से जुड़े हर घटनाक्रम पर जो तारीखे गवाह रहेंगी या फिर इतिहास में दर्ज होंगी वो कुछ इस तरह से है...14 मई, 2007: व्यापारी पीयूष गुहा और नक्सली नेता नारायण सान्याल के बीच संदशों का आदान-प्रदान करने के आरोप में सेन की गिरफ्तारी।15 मई, 2007: सेन को न्यायिक हिरासत में भेजा गया।25 मई, 2007: छत्तीसगढ़ सरकार ने दावा किया कि सेन से राज्य की सुरक्षा को खतरा है। उन्हें जमानत नहीं मिली।मई-जून: मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सेन के समर्थन में देशभर में रैलियां निकालीं।तीन अगस्त, 2007: पुलिस ने सेन के खिलाफ छत्तीसगढ़ विशेष सार्वजनिक सुरक्षा कानून और अवैध गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी सत्यभामा दुबे की अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया।10 दिसम्बर 2007: सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों वाली पीठ ने सेन की जमानत याचिका खारिज की।31 दिसम्बर, 2007: 'इंडियन एकेडमी ऑफ सोशल साइंस' ने छत्तीसगढ़ में गरीब, दलित लोगों की जीवन गुणवत्ता में सुधार लाने के मकसद से प्रकृति व मानव समाज विज्ञान की उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान के लिए सेन को 'आर आर केतन स्वर्ण पदक' प्रदान किया।15 मार्च-11 अप्रैल, 2008: जेल प्रशासन ने सुरक्षा का हवाला देते हुए सेन को एकांत कारावास में रखा।21 अप्रैल, 2008: 'ग्लोबल हेल्थ काउंसिल' ने वश्विक स्वास्थ्य एवं मानवाधिकार के क्षेत्र में योगदान के लिए सेन को 'जोनाथन मैन अवॉर्ड' से नवाजा।30 मई 2008: सेन मामले में रायपुर में सुनवाई प्रारंभ।11 अगस्त, 2008: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय बिलासपुर में दूसरी जमानत याचिका दाखिल की गई।14 अगस्त, 2008: सेन की जमानत याचिका पर पहली बार सुनवाई। सुनवाई स्थागित।दो दिसम्बर,2008: जमानत याचिका खारिज।तीन दिसम्बर: पूरक आरोप दाखिल, इसमें अतिरिक्त 47 गवाहों की सूची शामिल।चार मई, 2009: सर्वोच्च न्यायालय ने सेन को हिरासत में रखे जाने को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा। अदालत ने सेन के दिल की तकलीफ को देखते हुए उन्हें बेहतर चिकित्सकीय सुविधा मुहैया कराने को भी कहा।25 मई, 2009: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति मरक डेय काटजू और न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की पीठ के आदेश पर सेन जमानत पर रिहा।23-26 नवम्बर: रायपुर सत्र न्यायालय में सुनवाई दोबरा शुरू।अगस्त के अंतिम सप्ताह और सितम्बर की शुरुआत, 2010: सर्वोच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ सरकार को सितम्बर के अंत तक सेन के खिलाफ सबूत पेश करने का निर्देश दिया।28 सितम्बर, 2010: अभियोजन पक्ष ने सभी सबूत पेश किए।25-26 नवम्बर, 2010: बचाव पक्ष ने 12 गवाहों सहित दस्तावेज पेश किए।24 दिसम्बर, 2010: रायपुर के सत्र न्यायालय ने सेन, सान्याल और गुहा को राजद्रोह और साजिश के जुर्म में आजीवन कारावास की सजा सुनाई।24 जनवरी, 2011: सेन की जमानत याचिका पर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में सुनवाई शुरू। वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी सेन के पक्ष में उतरे और निचली अदालत के फैसले को बिना सबूत के आधार वाला फैसला करार दिया।25 जनवरी 2011: एक अन्य वकील सुरेंद्र सिंह ने सेन का पक्ष लेते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ पुलिस ने सेन के नक्सलियों से सम्बंध होने के दस्तावेज फर्जी तरीके से तैयार किये हैं।नौ फरवरी, 2011: उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के वकील किशोर भादुड़ी की दलील सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रखा।10 फरवरी, 2011: न्यायमूर्ति टी. पी. शर्मा और न्यायमूर्ति आर. एल. झानवार ने सेन की जमानत याचिका को खारिज किया।11अप्रैल, 2011: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एच. एस. बेदी और न्यायमूर्ति सी. के. प्रसाद की अध्यक्षता वाली खण्डपीठ ने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा अपनी दलील पेश करने के लिए और समय मांगने पर सुनवाई स्थगित की।15 अप्रैल, 2011: सर्वोच्च न्यायालय ने सेन को जमानत दे दी है।ये तारीखे बिनायक और उनसे जुड़े हर  व्यक्ति को हमेशा याद रहेंगी,लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने छत्तीसगढ़ सरकार के मुह पर कानूनी तमाचा मार दिया है...देखना है कानून का ये करारा तमाचा कितने दिनों तक सरकार को याद रहता है...

Thursday, April 14, 2011

सपनों के साथ सही संकल्प कहां ?

आज 14 अप्रैल को बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती पर राहुल गांधी से लेकर मायावती और नितिन गडकरी तक सभी दलों के नेता बाबा साहेब के सपनों के प्रति अपनी आस्था जताते दिखे,उम्मीद है आगे भी दिखेंगे  किंतु इन सपनों के साथ सही संकल्प कहां हैं ?आज देखें तो सिर्फ दलित राजनीति ही नहीं, समूचा देश नेतृत्व के संकट में जूझ रहा है। बौनों के बीच आदमकद तलाशे भी नहीं मिलते, जाहिर है, छुटभैयों की बन आई है। बाबा साहब आंबेडकर के बाद दलितों को सच्चा और स्वस्थ नेतृत्व मिला ही नहीं। चुनावी सफलताओं, कार्यकर्ता आधार के सवाल पर जरूर मायावती जैसे नेता यह दावा कर सकते हैं कि वे बाबासाहब के आंदोलन को आगे ले जा रहे हैं, परंतु सच यह है कि आंबेडकर जैसी वैचारिक तेजस्विता आज दलित राजनीति के समूचे परिवेश में दुर्लभ है। राष्ट्रीय आंदोलन की आंधी में दलित प्रश्न को, छुआछुत, जातिप्रथा के सवालों को जिस तरह से उन्होंने मुद्दा बनाया, वह खासा महत्व का प्रसंग है।
पेरियार, ज्योतिबा फुले, शाहूजी महाराज से लेकर बाबासाहब की वैचारिक धारा से आगे कोई बड़ी लकीर खींच पाने में दलित राजनीति असफल रही । सत्ता के साथ पेंगे भरने का अभ्यास और सत्ता से ही दलितों का भला हो सकता है, इस चिंतन ने समूचे दलित आंदोलन की धार को कुंद कर दिया तथा एक सुविधाभोगी नेतृत्व समाज का सिरमौर बन बैठा। बाबासाहब यदि चाहते तो आजीवन पं. नेहरू के मंत्रिमंडल में मंत्री रह सकते थे, लेकिन वे आंदोलनकारी थे । उन्हें जगजीवनराम बनना कबूल नहीं था । सत्ता के साथ आलोचनात्मक विमर्श के रिश्ते बनाकर उन्होंने व्यक्तिगत राजनीतिक सफलताओं एव सुख की बजाए दलित प्रश्न को सर्वोच्चता दी। उनकी निगाह से राजसत्ता नहीं, औसत दलित के खिलाफ होने वाला जुल्म और अन्याय रोकना ज्यादा महत्वपूर्ण था। यह सारा कुछ करते हुए भी बाबासाहब ने तर्क एवं विचारशक्ति के आधार पर ही आंदोलन को नेतृत्व दिया । सस्ते नारे-भड़ाकाऊ बातें उनकी राजनीति का औजार कभी नहीं बनीं। आजादी के इन 6 दशकों में दलित एक संगठित ताकत के रूप में न सही, किंतु एक शक्ति के रूप में दिखते हैं तो इस एकजुटता को वैचारिक एवं सांगठनिक धरातल देने का काम पेरियार, बाबासाहब जैसे महापुरुषों ने किया । उनके सतत संघर्ष से दक्षिण में आज दलित राजनीति सिरमौर है, महाराष्ट्र में बिखरी होने के बावजूद एक बड़ी ताकत है। उ.प्र. में बहुजन समाज पार्टी के रूप में उसकी महत्वपूर्ण उपस्थिति है। मुख्यधारा के राजनीतिक दलों में आज दलित की उपेक्षा करने का साहस नहीं है। आरक्षण के प्रश्न पर लगभग राष्ट्रीय सहमति है, वंचितों को सत्ता-संगठन में पद एवं अधिकार देने में मुख्यधारा की राजनीति में ‘स्पेस’ बढ़ा है। 
सही अर्थों में दलित राजनीति के लिए यह समय ठहरकर सोचने और विचार करने का है कि इतनी स्वाकार्यता के बावजूद क्या वे समाज, सरकार एवं प्रशासन का मानस दलित प्रश्नों के प्रति संवेदन शील बना पा रहे है। दलित, आदिवासी, गिरिजनों के प्रश्न क्या देश की राजनीति की भूल चिंताओं में शामिल हैं ? सत्ता में हिस्सेदारी के बावजूद क्या हम औसत दलित की जिंदगी का छोड़ा भी अंधेरा, छोड़ी भी तकलीफ कम कर पा रहे हैं ? दक्षिण में करुणानिधि से लेकर उ.प्र. में मायावती जैसों के शासन का धर्म किस प्रकार दलितों के प्रति अन्य शासकों से अलग था या है । क्योंकि यह बात दलित राजनिति को भली प्रकार समझनी होगी कि दलित नौकरशाहों की गिनती, महत्वपूर्ण पदों पर दलितों की नियुक्ति से सामाजिक अन्याय या दमन का सिलसिला रुकने वाला नहीं है। दलित राजनीति के सामने सत्ता में हिस्सेदारी के साथ-साथ दलित मुक्ति का प्रश्न भी खड़ा है। दलित मुक्ति जरा बडा प्रश्न है। यह सही अर्थों में तभी संभव है जब सवर्ण चेतना भी अपनी काराओं तथा कठघरों से बाहर निकले। निश्चय ही यह लक्ष्य सवर्णों को गाली-गलौज कर, उनके महापुरुषों के अपमान से नहीं पाया जा सकता। जातियों का मामला वर्ग संघर्ष से सर्वथा अलग है। वर्ग संघर्ष में आप पूंजीपति के नाश की कामना कर सकते हैं, क्योकिं तभी वर्ग विहीन समाज बन सकता है, जबकि जातिविहीन समाज बनाने के लिए जाति युद्ध का कोई उपयोग नहीं है। दलित आंदोलन के निशाने पर सवर्ण नहीं, सवर्णवाद होना चाहिए। समतायुक्त समाज, जातिविहीन समाज का सपना बाबासाहब आंबेडकर ने देखा था तो उसे साकार करने के अवसर आर बदलते परिवेश ने हमें दिए हैं। दलित राजनीति के प्रमुख राजनेताओं को चाहिए कि वे दलितों, मजलूमों के असली शत्रु की पहचान करें। यह खेदजनक है कि वे ऐसा कर पाने में विफल रहे हैं। दलितों, मजलूमों एवं गरीबों की सबसे बड़ी शत्रु है ताजा दौर की बाजारवादी व्यवस्था । दलित राजनीति के एजेंडे पर बाजारवादी ताकतों के खिलाफ संघर्ष को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इस उदारीकरण की आंधी ने पिछले दो दशक में दलितों, कामगारों आम लोगं के सामने रोजी-रोटी, रोजगार, महंगाई का जैसा संकट खड़ा किया है, वह सबके सामने है। सच कहें तो दलित राजनीति वैचारिक तौर पर गहरे अंतर्विरोधों का शिकार है। उसके सामने निश्चित लक्ष्य एवं मंजिलें नहीं हैं। किसी प्रकार सत्ता की ऊंची दुकानों में अपने लिए जगह बनाना दलित राजनीति का केंद्रीय विचार बन गया है। एक बेहतर मानवीय जीवन के लिए संघर्ष, अशिक्षा, बेकारी और अपसंस्कृति के विरुद्ध जेहाद, बाजारवादी शक्तियों से दो-दो हाथ करना एजेंडे में नहीं । इन चुनौतियों के बावजूद दलितों के आत्मसम्मान को बढ़ाने, उनमें ओज भरने, अपनी बात कहने का साहस जरूर इन दलों ने भरा है। यह अकेली बात दलित राजनीति की उपलब्धि मानी जा सकती है। महाराष्ट्र के संदर्भ में दलित साहित्य की भूमिका को भी नहीं नकारा जा सकता है। कई बार तो यह लगता है कि महाराष्ट्र में दलित साहित्य आगे निकल गया, दलित राजनीति पीछे छूट गई है। ऐसा ही आभास दलित आंदोलन के कार्यकर्ता कराते हैं कि कार्यकत्ता आगे निकल गए, नेता पीछे छूट गए । समूचे देश में बिखरी दलित राजनीति की शाक्ति के यदि सामूहिक रूप से जातिवाद, बाजारवाद, बेकारी, अपसंस्कृति, अशिक्षा के खिलाफ संघर्ष में उतारा जाए तो देश का इतिहास एक नई करवट लेगा। आजादी की एक नई जंग की शुरुआत होगी। वह लड़ाई सिर्फ ‘सत्ता संघर्ष’ की नहीं ‘दलित मुक्ति’ की होगी। हर लड़ाई में मजबूत विरोधी, कमजोर प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ता आया है। दलितों की सामूहिक चेतना ने आम लोगों के सवालों को अपने हाथ में लेकर यह लड़ाई लड़ी तो इस जंग में जीत कमजोर की होगी। अब यह बात दलितों के रहनुमाओं पर निर्भर है कि क्या वे इस चुनौती को स्वीकारेंगें ?

वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता

        आज सुबह अखबार के पन्ने पलट रहा था एक खबर पर नजर पड़ी,खबर थी देहव्यापार में लिप्त कोलकाता की दो कालगर्ल्स पुलिस के हत्थे चढ़ी...नई बात या फिर खास समाचार नही था फिर भी लिखने वाले ने खबर में तेज़ तडका डालकर काफी मसालेदार बना दिया था...छत्तीसगढ़ के अमूमन अधिकाँश शहरो में जिस्म के कारोबार को रुपयेवालो ने पोषक तत्व दे रखा है तभी तो देश के बड़े महानगर कहलाने वाले दिल्ली,मुंबई.कोलकाता जैसे राज्यों से गर्म गोस्त की आवक तेजी से बढ़ी है...खबर को पढने के बाद मुझे संसद प्रिया दत्त की पिछले महीनो की वो बाते याद आ गई जिसमे उन्होंने वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देने की वकालत की है...   
                                                                    कांग्रेस की सांसद प्रिया दत्त ने वेश्यावृत्ति को लेकर एक नई बहस छेड़ रखी  है, जाहिर तौर पर उनके विचार को गौर करें तो  विचार बहुत ही संवेदना से उपजा हुआ है। उन्होंने अपने बयान में कहा है कि "मेरा मानना है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता प्रदान कर देनी चाहिए ताकि यौन कर्मियों की आजीविका प्रभावित न हो।" प्रिया के बयान के पहले भी इस तरह की मांगें उठती रही हैं। कई संगठन इसे लेकर बात करते रहे हैं। खासकर पतिता उद्धार सभा ने वेश्याओं को लेकर कई महत्वपूर्ण मांगें उठाई थीं। हमें देखना होगा कि आखिर हम वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहनाकर क्या हासिल करेंगें? क्या भारतीय समाज इसके लिए तैयार है कि वह इस तरह की प्रवृत्ति को सामाजिक रूप से मान्य कर सके। दूसरा विचार यह भी है कि इससे इस पूरे दबे-छिपे चल रहे व्यवसाय में शोषण कम होने के बजाए बढ़ जाएगा। आज भी यहां स्त्रियां कम प्रताड़ित नहीं हैं। सांसद दत्त ने भी अपने बयान में कहा है कि - "वे समाज का हिस्सा हैं, हम उनके अधिकारों को नजरअंदाज नहीं कर सकते। मैंने उन पर एक शोध किया है और पाया है कि वे समाज के सभी वर्गो द्वारा प्रताड़ित होती हैं। वे पुलिस और कभी -कभी मीडिया का भी शिकार बनती हैं।"
सही मायने में स्त्री को आज भी भारतीय समाज में उचित सम्मान प्राप्त नहीं हैं। अनेक मजबूरियों से उपजी पीड़ा भरी कथाएं वेश्याओं के इलाकों में मिलती हैं। हमारे समाज के इसी पाखंड ने इस समस्या को बढ़ावा दिया है। हम इन इलाकों में हो रही घटनाओं से परेशान हैं। एक पूरा का पूरा शोषण का चक्र और तंत्र यहां सक्रिय दिखता है। वेश्यावृत्ति के कई रूप हैं जहां कई तरीके से स्त्रियों को इस अँधकार में धकेला जाता है। आदिवासी इलाकों से लड़कियों को लाकर मंडी में उतारने की घटनाएं हों, या बंगाल और पूर्वोत्तर की स्त्रियों की दारूण कथाएं ,सब कंपा देने वाली हैं। किंतु सारा कुछ हो रहा है और हमारी सरकारें और समाज सब कुछ देख रहा है। समाज जीवन में जिस तरह की स्थितियां है उसमें औरतों का व्यापार बहुत जधन्य और निकृष्ट कर्म होने के बावजूद रोका नहीं जा सकता। गरीबी इसका एक कारण है, दूसरा कारण है पुरूष मानसिकता। जिसके चलते स्त्री को बाजार में उतरना या उतारना एक मजबूरी और फैशन दोनों बन रहा है। क्या ही अच्छा होता कि स्त्री को हम एक मनुष्य की तरह अपनी शर्तों पर जीने का अधिकार दे पाते। समाज में ऐसी स्थितियां बना पाते कि एक औरत को अपनी अस्मत का सौदा न करना पड़े। किंतु हुआ इसका उलटा। इन सालों में बाजार की हवा ने औरत को एक माल में तब्दील कर दिया है। मीडिया माध्यम इस हवा को तूफान में बदलने का काम कर रहे हैं। औरत की देह को अनावृत्त करना एक फैशन में बदल रहा है। औरत की देह इस समय मीडिया का सबसे लोकप्रिय विमर्श है। सेक्स और मीडिया के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है । फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चेनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों पर पसरा पड़ा है। प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए ‘प्लेबाय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था, अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है। अखबारों में ग्लैमर वर्ल्र्ड के कॉलम ही नहीं, खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का कैटवाग खासी जगह घेर रहा है। वह पूरा हल्लाबोल 24 घंटे के चैनलों के कोलाहल और सुबह के अखबारों के माध्यम से दैनिक होकर जिंदगी में एक खास जगह बना चुका है। शायद इसीलिए इंटरनेट के माध्यम से चलने वाला ग्लोबल सेक्स बाजार करीब 60 अरब डॉलर तक जा पहुंचा है। 

                                                                     मोबाइल के नए प्रयोगों ने इस कारोबार को शक्ति दी है। एक आंकड़े के मुताबिक मोबाइल पर अश्लीलता का कारोबार भी पांच सालों में 5अरब डॉलर तक जा पहुंचेगा ।बाजार के केंद्र में भारतीय स्त्री है और उद्देश्य उसकी शुचिता का उपहरण । सेक्स सांस्कृतिक विनिमय की पहली सीढ़ी है। शायद इसीलिए जब कोई भी हमलावर किसी भी जातीय अस्मिता पर हमला बोलता है तो निशाने पर सबसे पहले उसकी औरतें होती हैं । यह बाजारवाद अब भारतीय अस्मिता के अपहरण में लगा है-निशाना भारतीय औरतें हैं। ऐसे बाजार में वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहनाने से जो खतरे सामने हैं, उससे यह एक उद्योग बन जाएगा। आज कोठेवालियां पैसे बना रही हैं तो कल बड़े उद्योगपति इस क्षेत्र में उतरेगें। युवा पीढ़ी पैसे की ललक में आज भी गलत कामों की ओर बढ़ रही है, कानूनी जामा होने से ये हवा एक आँधी में बदल जाएगी। इससे हर शहर में ऐसे खतरे आ पहुंचेंगें। जिन शहरों में ये काम चोरी-छिपे हो रहा है, वह सार्वजनिक रूप से होने लगेगा। ऐसी कालोनियां बस जाएंगी और ऐसे इलाके बन जाएंगें। संभव है कि इसमें विदेशी निवेश और माफिया का पैसा भी लगे। हम इतने खतरों को उठाने के लिए तैयार नहीं हैं। विषय बहुत संवेदनशील है, हमें सोचना होगा कि हम वेश्यावृत्ति के समापन के लिए काम करें या इसे एक कानूनी संस्था में बदल दें। हमें समाज में बदलाव की शक्तियों का साथ देना चाहिए ताकि एक औरत के मनुष्य के रूप में जिंदा रहने की स्थितियां बहाल हो सकें। हमें स्त्री के देह की गरिमा का ख्याल रखना चाहिए, उसकी किसी भी तरह की खरीद-बिक्री को प्रोत्साहित करने के बजाए, उसे रोकने का काम करना चाहिए। प्रिया दत्त ने भले ही बहुत संवेदना से यह बात कही हो, पर यह मामले का अतिसरलीकृत समाधान है। वे इसके पीछे छिपी भयावहता को पहचान नहीं पा रही हैं। हमें स्त्री की गरिमा की बात करनी चाहिए- उसे बाजार में उतारने की नहीं.... 

Wednesday, April 13, 2011

उम्मीदों की मौत

देश-दुनिया में हादसे और उनमे होने वाली मौतों की खबर हर किसी के लिए आम खबर की तरह होती है,लेकिन वो लोग,वो परिवार टूटकर बिखर कर जाते है जिनके यहाँ हादसे मौत की शक्ल लिए पहुँचते है...एक तरफ हम अपनी तरक्की के पन्नो को पलटते नही थक रहे वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इंसानियत के चेहरों की कई तस्वीरे पेश कर जाती है...पत्रकारिता के पेशे से हूँ इसलिए थोड़ी बहुत जानकारियों को अपने दिमाग में डाले रखता हूँ,न जाने कौन सी जानकारी कहाँ काम आ जाये..? जानकारी का ही नतीजा रहा की मंगलवार की सुबह जब मैंने देश-दुनिया से बाखबर होने के लिए टी.वी.ऑन किया तो लाल पट्टी पर सफ़ेद रंग से लिखी ब्रेकिंग न्यूज चल रही थी...लिखा था चार दिनों से घर में बंद भिलाई में रहने वाले एक परिवार के पांच सदस्यों ने जहर खा लिया है...खबर सुबह ६ बजे सुबह की थी,सभी की हालत गंभीर बनी हुई है...करीब डेढ़ घंटे बाद जो खबर आई वो इंसानियत की हार का प्रमाण दे गई...परिवार के ४ लोग मौत के गाल में समा चुके थे और जिसे जिन्दा बचाने की कोशिशे की जा रही थी उसका सब कुछ लुट चुका था...बिस्तर पर बदहवास वो शख्स इस बात से बाखबर था की उसकी माँ और तीन बहने दुनिया से रुखसत हो चुकी है...लोगो के लिए जो महज एक खबर थी वो एक परिवार को ख़त्म कर चुकी है....
                                                     मंगलवार को जब उम्मीदों की मौत हुई तो सरकार,भिलाई इस्पात सयंत्र समेत विपक्षियो की आँखों में भिन-भीना रहा कीचड़ बहकर मुह के पास आ गया...सब बोलने लगे...सरकार ने जांच के आदेश जारी कर दिए,बी.एस.पी.प्रबंधन ने अमानवीय चमड़ी को बचाने का बहाना खोज लिया वहीँ कांग्रेसियों को मौत पर राजनीती करने का घर बैठे एक मुद्दा मिल गया....उम्मीद की मौत ने एक परिवार के चार सदस्यों को साथी बना लिया...मै मानता हूँ की हार चुकी इंसानियत के पास अब पाना तो दूर खोने के लिए भी कुछ नही बचा...कहते है परिवार का पांचवा और इकलौता सदस्य सुनील ठीक है...शायद ऊपर वाले को रहम आ गया होगा...सुनील ने अपनी माँ,तीन बहनों की चिता को आग दी...शायद किस्मत में यही लिखा था....
                                                      मै आज जिस न भूलने वाली घटना के बारे में लिख रहा हूँ वो कुछ इस तरह की है...भिलाई के सेक्टर-४,स्ट्रीट-३४,आवास क्रमांक-८-ऐ में रहने वाले सुनील साहू ने २ मांगो को लेकर ८ अप्रैल से माँ मोहिनी देवी,बहन शीला,शोभा और रेखा समेत खुद को घर में कैद कर लिया था...सुनील का कहना था भिलाई इस्पात सयंत्र में कार्यरत उसके पिता ने ख़ुदकुशी नही की थी बल्कि उनकी हत्या कर लाश फेंक दी गई थी...पिता की मौत के बाद अनुकम्पा नियुक्ति और उस घर को खाली नही करवाए जाने की गुहार लगाते लम्बा वक्त बीत गया था...यक़ीनन १७ साल का इन्तेजार कम नही होता...सरकार से लेकर इस्पात सयंत्र के तकरीबन हर जिम्मेदार अफसर से गुहार लगा चूका सुनील जब परिवार समेत घर में बंधक बन बैठा तो सबने उसे गीदड़ भभकी समझा...लोगो को उम्मीद ही नही थी की एक परिवार मौत को गले लगा लेगा...करीब १७ बरस का इन्तेजार जब ख़त्म हुआ तो मौत से रिश्ता बनाना बेहतर समझा बजाय इसके की उम्मीद में ना जाने और कितने बरस बीत जाये....देश में इस्पात नगरी के रूप में जाना-जाने वाला भिलाई इस्पात सयंत्र इतना बेरहम होगा किसी को नही पता था...? इस घटना से अब लोग यकीन कर लेंगे,मै ऐसा मानता हूँ....
                                                               अब मरने  वाले परिवार के बचे  सदस्य को लोग धाडस बंधा रहे है...कुछ लोग भीड़ लगाकर साथ  होने का यकीन दिला रहे है, तो कुछ ने बीएसपी के खिलाफ  झंडा उठा लिया है...मै सोचता हूँ अब कोई किसी भी ढंग से मानवीयता का परिचय देने की कोशिश करे परिवार के बगीचे का माली और फूल अब नही लौटा सकता....

Saturday, April 9, 2011

आजादी की दूसरी जंग जीत गए


 आज मै बहुत खुश हूँ,मै ही क्यों पूरा देश आज ख़ुशी मना रहा है...हम सब सोच रहे है आजादी की दूसरी जंग जीत गए है...अंग्रेजो से गाँधी ने छुटकारा दिलाया,भ्रष्टाचार से अन्ना ने जीत दिला दी...उम्मीद की किरण तो शुक्रवार की रात को ही निकल गई थी पर रौशनी आज सुबह नजर आई जब अन्ना ने सरकार से जीत मिलने के बाद अनशन ख़त्म करने का एलान कर दिया..
                     खबर ये है की जनलोकपाल विधेयक को लेकर सरकार और अन्ना हज़ारे के बीच शुक्रवार की रात को हुए समझौते के बाद अन्ना हज़ारे ने शनिवार की सुबह अपना आमरण अनशन तोड़ दिया... अन्ना ने पहले उन लोगों का अनशन तुड़वाया जिन्होंने उनके साथ व्रत रखा था और उसके बाद अपना अनशन तोड़ा...अन्ना ने एक छोटी बच्चों के हाथों पानी पीकर अपना अनशन तोड़ा. लोगों को संबोधित करते हुए अन्ना ने कहा, "ये मेरी नहीं आप सबकी जीत है.इस आंदोलन में युवा शक्ति का शामिल होना उम्मीद की किरण है. अब हमारी ज़िम्मेदारी बढ़ गई, हमें लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करना है ये पहली चुनौती है. दूसरा संघर्ष है मसौदा बनने के बाद मंत्रिमंडल इसे मंज़ूर करे. तीसरा संघर्ष है लोक सभा में मंज़ूर करवाना. सत्ता का विकेंद्रीकरण की माँग हमारा एक और लक्ष्य है.".अन्ना ने शुक्रवार रात को घोषणा की थी कि वे शनिवार सुबह अपना अनशन समाप्त कर देंगे. हालांकि उनका कहना था कि सरकार के आदेश की कॉपी देखने के बाद ही वे ऐसा करेंगे. अनशन तोड़ने की ख़बर के मिलते ही जंतर-मंतर में जमा लोगों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई....इस अवसर पर स्वामी अग्निवेश ने कहा, "लोगों ने एकजुटता का परिचय दिया है. इस जीत का सारा श्रेय लोगों को जाता है. लेकिन लड़ाई ख़त्म नहीं हुई है बल्कि शुरु हुई है. सरकारी अधिसूचना तो कागज़ का टुकड़ा है इसमें अपने संघर्ष से जान डालनी पड़ेगी."
                     समझौते के अनुसार नए लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने के लिए सरकार 10 सदस्यीय संयुक्त समिति बनाएगी. इसमें पांच लोग नागरिक समाज के प्रतिनिधि होंगे और पांच लोग सरकार की तरफ़ से होंगे. चेयरमैन का पद सरकार के पास रहेगा तो वाइस चेयरमैन नागरिक समाज का होगा....सरकार की तरफ़ से प्रणब मुखर्जी, मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल, क़ानून मंत्री वीरप्पा मोईली, गृह मंत्री पी चिदंबरम और जल संसाधन मंत्री सलमान ख़ुर्शीद शामिल हैं.....आंदोलनकारियों की तरफ़ से ख़ुद अन्ना हज़ारे के अलावा अरविंद केजरीवाल, कर्नाटक के लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और पूर्व केंद्रीय क़ानून मंत्री शांति भूषण शामिल होंगे.शांति भूषण संयुक्त समिति के सह अध्यक्ष भी होगें...जल्द है संयुक्त समिति की बैठक होगी और उम्मीद है कि सरकार संसद के मॉनसून सत्र में इस बिल को संसद में पेश करेगी. 

इस समझौते में सरकार की ओर से सबसे अहम भूमिका निभाने वाले केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ये भारत के लोकतंत्र की ताक़त को दर्शाता है...सिब्बल ने कहा, '' मुद्दा ये नहीं है कि किसकी जीत और किसकी हार हुई है. इससे पता चलता है कि भ्रष्टाचार की लड़ाई में पूरा देश एक साथ हैं''...उन्होंने बताया कि कोशिश होगी कि 30 जून तक मसौदा तैयार करने का काम ख़त्म कर लिया जाएगा...इस अभियान में अन्ना के क़रीबी सहयोगी रहे पूर्व केंद्रीय क़ानून मंत्री और शांति भूषण ने कहा कि लोकतंत्र में कितनी शक्ति होती है ये अन्ना हज़ारे और उनके समर्थकों ने साबित कर दिया है....उन्होंने कहा,''77 के बाद से ये पहली इतनी बड़ी जीत है. अगर जनता अपनी शक्ति पहचान ले और शांतिपूर्ण तरीक़े से अपनी बात रखे तो सरकार को झुकना ही पड़ेगा."
                   इस पूरे मामले ने ये तो साफ़ कर दिया है की भ्रष्टाचार अब बर्दाश्त नही किया जायेगा...जनता इस मसले पर एकजुट हुई तो सरकार के पसीने छूट गए..सरकार को लगा वक्त रहते अन्ना की मांगे नही मानी गई तो जंतर-मंतर कही तहरीर चौक में न तब्दील हो जाये..."तहरीर" मतलब परिवर्तन की आंधी आये इससे पहले सरकार जन-लोकपाल विधेयक लागू करने पर राजी हो गई...लोकतन्त्र ने शनिवार को आजादी की दूसरी लड़ाई जीत लेने का जगह-जगह जश्न मनाया...पूरा देश तन्त्र"सरकार"की हार से जितना खुश नही था उससे कहीं ज्यादा ख़ुशी भविष्य के सुनहरे सपने को लेकर था..

Friday, April 8, 2011

उम्मीदें जाग गई हैं...

उम्मीदें जाग गई हैं...सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या हमारे यहाँ भी तहरीर चौक होगा?माहौल पूरा है. थोड़ा दिल्ली के जंतर मंतर पर, थोड़ा इधर-उधर के शहरों में और सबसे ज़्यादा टेलीविज़न के स्क्रीनों पर... अख़बारों ने भी माहौल बनाने की पूरी कोशिश की है,लेकिन जनता अभी थोड़ी दूर से देख रही है... सोच रही है कि शायद हमारे यहाँ भी तहरीर चौक हो जाएगा...जो लोग अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन के समर्थन में निकल रहे हैं उनकी संख्या अभी हज़ारों में पहुँची है....हमारी आबादी के नए आंकड़े अभी-अभी आए हैं. एक अरब 21 करोड़ यानी लगभग सवा अरब... इस सवा अरब लोगों में से अभी कुछ हज़ार लोग जंतर मंतर या इंडिया गेट पर इकट्ठे हो रहे हैं...वह कहावत चरितार्थ होती दिख रही है, देश में भगत सिंह और गांधी पैदा तो हों, लेकिन पड़ोसी के घर में...मिस्र की आबादी से तुलना करके देखें, वहाँ की कुल आबादी है आठ करोड़ से भी कम. यानी आंध्र प्रदेश की आबादी से भी कम,लेकिन वहाँ तहरीर चौक पर एकबारगी लाखों-लाखों लोग इकट्ठे होते रहे. उन्हें वहाँ इकट्ठा करने के लिए किसी नेता की ज़रुरत नहीं पड़ी...वे ख़ुद वहाँ आए क्योंकि उन्हें लगा क्योंकि परिवर्तन उनकी अपनी ज़रुरत है...भारत की जनता के लिए अन्ना हज़ारे को आमरण अनशन पर बैठना पड़ा है,फिर भी इकट्ठे हो रहे हैं कुछ हजार लोग... जिस देश में अधिसंख्य जनता सहमत है कि देश में भ्रष्टाचार असहनीय सीमा तक जा पहुँचा है...सब कह रहे हैं कि नौकरशाहों से लेकर राजनेता तक और यहाँ तक न्यायाधीश तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. हर कोई हामी भर रहा है कि इन राजनेताओं को देश की चिंता नहीं...भ्रष्टाचार के आंकड़ों में अब इतने शून्य लगने लगे हैं कि उतनी राशि का सपना भी इस देश के आम व्यक्ति को नहीं आता....इस देश में जनता इंतज़ार कर रही है कि इससे निपटने की पहल कोई और करेगा...ख़ुद अन्ना हज़ारे कह रहे हैं कि जितना भी समर्थन मिल रहा है, उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी. वह तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को भी नहीं थी और न विपक्षी दलों को...लेकिन जितने भी लोग निकल आए हैं उसने लोगों को जयप्रकाश नारायण से लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह की याद दिला दी है...लोग तहरीर चौक को याद कर रहे हैं, बिना ये समझे कि वहाँ परिस्थितियाँ दूसरी थीं...लेकिन वे मानने लगे हैं कि तहरीर चौक यानी परिवर्तन...अन्ना हज़ारे ने एक लहर ज़रुर पैदा की है. लेकिन अभी लोग उन लहरों पर अपनी नावें निकालने को तैयार नहीं हैं...भारत का उच्च वर्ग तो वैसे भी घर से नहीं निकलता. ज़्यादातर वह वोट भी नहीं देता. ग़रीब तबका इतना ग़रीब है कि वह अपनी रोज़ी रोटी का जुगाड़ एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ सकता...बचा मध्य वर्ग. भारत का सबसे बड़ा वर्ग. और वह धीरे-धीरे इतना तटस्थ हो गया है कि डर लगने लगा है...सरकार के रवैये से दिख रहा है कि वह देर-सबेर, थोड़ा जोड़-घटाकर लोकपाल विधेयक तैयार करने में अन्ना हज़ारे एंड कंपनी की भूमिका स्वीकार कर लेगी...उस दिन अन्ना हज़ारे का अनशन ख़त्म हो जाएगा. अन्ना हज़ारे रालेगणसिद्धि लौट जाएँगे. पता नहीं इन सवा अरब बेचारों का क्या होगा..?

सरकारी लोकपाल और जनता का लोकपाल...

राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं, लेकिन इस देश में लोकपाल के लिए 42 साल से इंतजार चल रहा है। किसी भी कौम के जीवनकाल में 42 साल एक लंबा वक्त होता है। जिस कानून को आजादी के वक्त ही अस्तित्व में आ जाना चाहिए था, उसको लेकर वर्ष 1969 से लगातार लुका-छिपी का खेल चल रहा है। अब जाकर उसके लिए ठोस हलचल हुई है।
स्वतंत्र भारत में पहली बार किसी कानून के लिए इतना बड़ा जन समुदाय उठ खड़ा हुआ है। अब बहस इस बात पर नहीं हो रही है कि लोकपाल कब स्थापित हो। अब तो केवल यह तय करना बाकी है कि लोकपाल कैसा हो। वह सरकारी विधेयक में प्रस्तावित एक कमजोर संस्था हो या फिर जन लोकपाल विधेयक द्वारा प्रस्तावित एक सर्वशक्तिमान निकाय हो।
ऊंचे पदों पर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासनिक सुधार आयोग की ओर से वर्ष 1967 में लोकपाल की स्थापना का सुझाव आया था। 1969 में उसे लोकसभा ने पारित भी कर दिया, लेकिन उसके बाद से अब तक वह मृग मरीचिका ही साबित हुआ। इस दौरान छोटी-बड़ी कुल चौदह कोशिशें की गयीं। आठ बार सरकारी विधेयक के रूप में और छह बार गैर सरकारी विधेयक के रूप में इसे स्थापित करने की कोशिश की गयी, लेकिन किसी न किसी बहाने उसमें रोड़ा अटकाया जाता रहा है।
शुरू में प्रधानमंत्री को इसके दायरे में रखे जाने को लेकर मतभेद थे, किंतु ऊंचे पदों पर आसीन लोगों से जुड़े भ्रष्टाचार के प्रकरण इस प्रकार उजागर हो चुके हैं और उनका आभामंडल इतना क्षीण हो चुका है कि सार्वजनिक जीवन का कोई भी पदधारक अब अपने को जांच के दायरे से अलग रखने की सिफारिश करने का साहस नहीं कर सकता।
लोकपाल की स्थापना के लिए मशहूर समाजसेवी व गांधीवादी नेता अन्ना हजारे की मौजूदा पहल ऐसे समय पर हुई है, जब देश की जनता भ्रष्टाचार से आजिज आ चुकी है। मामला केवल कॉमनवेल्थ खेलों या टूजी स्पेक्ट्रम घोटालों तक ही सीमित नहीं है। जहां कहीं भी पाखंड का सुरक्षा कवच थोड़ा-सा दरकता है, उसके नीचे भ्रष्टाचार का काला समंदर नजर आने लगता है। अदालतों से जुड़े भ्रष्टाचार के प्रकरणों के उजागर होने के बाद अब जनता के धैर्य का बांध टूटने लगा है।
अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य ने भी इस मुहिम को मजबूती दी है। मिस्र जैसे देशों में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मुबारक सरकार को कुछ समय पहले ही गद्दी छोड़नी पड़ी है। ऐसे समय में लोकपाल पर होने वाली बहस कई मामलों में बिल्कुल अलग है। अब यह बहस सिर्फ कानून बनाने तक नहीं सीमित है, बल्कि उस कानून के स्वरूप को लेकर है। लोग सरकारी विधेयक को नाकाफी मानकर उसका विरोध कर रहे हैं। उसकी जगह जन लोकपाल विधेयक का एक वैकल्पिक प्रारूप तैयार किया गया है।
सरकारी विधेयक का अधिकार क्षेत्र केवल राजनेताओं तक सीमित है। सरकारी अधिकारियों के लिए सतर्कता आयुक्त जैसी संस्थाएं हैं, जो अब तक निष्प्रभावी साबित हुई हैं। न्यायपालिका के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए कोई संस्था नहीं है। जनता के लिए राजनेता के भ्रष्टाचार, सरकारी कारकूनों की रिश्वतखोरी और न्यायाधीशों की बेईमानी में कोई अंतर नहीं है। इस पृष्ठभूमि में जन लोकपाल विधेयक के उपबंध सरकारी विधेयक की तुलना में ज्यादा प्रभावी और प्रासंगिक हैं।
लोकपाल की गठन प्रक्रिया और उसके काम करने के तरीके के मामले में सरकारी और जन लोकपाल विधेयक में बहुत बड़ा फर्क है। अब तक के सभी विधेयकों में लोकपाल के लिए जरूरी था कि वह सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश रह चुका व्यक्ति हो। उसकी नियुक्ति की प्रक्रिया भी संतोषजनक नहीं थी। उसकी नियुक्ति कुछ मंत्रियों, दोनों सदनों के अध्यक्षों और नेता प्रतिपक्ष की एक समिति की अनुशंसा पर की जानी थी।
लोकपाल के चयन को केवल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों तक सीमित कर देने के कई नुकसान हैं। इससे उस पद के लिए उपयुक्त व्यक्ति की तलाश का दायरा बहुत सीमित हो जाता है। लोकपाल जैसे पदधारक के लिए सत्यनिष्ठा का गुण सबसे अहम हैं। सत्यनिष्ठ व्यक्तियों के मामले में न्यायपालिका या किसी भी एक संस्था का एकाधिकार नहीं हो सकता, इसलिए उसके लिए योग्य पात्र की तलाश करते समय पूरे समाज के अच्छे लोगों को मौका मिलना चाहिए।
लोकपाल का काम मुख्य रूप से आरोपों की जांच करना होगा, इस काम में न्यायिक अनुभव से कोई खास मदद नहीं मिलती। इसलिए जन लोकपाल विधेयक के वे उपबंध स्वागत योग्य हैं, जिनमें लोकपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की बात की गयी है और समाज में अच्छी साख रखने वाले किसी व्यक्ति को उस पद का पात्र माना गया है।
दरअसल लोकपाल की मौजूदा मुहिम सरकारी नाकामी के खिलाफ एक जन प्रतिक्रिया है। लोग सरकारी हीला-हवाली से ऊब चुके हैं। जनता अब ऊंचे पदों पर बैठे लोगों की पैंतरेबाजी से भी धीरे-धीरे वाकिफ होती जा रही है। जन विधयेक के माध्यम से ऐसी संस्था की परिकल्पना की गयी है, जो एक स्वतंत्र तथा अलग निकाय हो। उसके पास जांच करने का व्यापक अधिकार हो और अपनी मर्जी से भ्रष्टाचार की जांच वाले प्रकरण चुनने का अधिकार हो। उसका अपना पूर्णकालिक स्टाफ हो, उसकी जांच के निष्कर्ष और उसकी संस्तुति सरकार पर बाध्यकारी हो।
यदि लोकपाल भ्रष्टाचार के आरोपों को सही पाता है, तो दोषी व्यक्ति को बरखास्त कर दिया जाए। इसके अलावा व्हिसल ब्लोअर यानी भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंतरिक रूप से शंखनाद करने वाले लोगों को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी भी लोकपाल की ही हो।
अन्ना हजारे की मौजूदा मुहिम को मिल रहे जन समर्थन से एक बात साफ हो गयी है कि जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त हो चुकी है। सरकार की नीयत पर उसका भरोसा नहीं रहा। अन्ना हजारे जैसे लोगों के बेदाग लोकजीवन से उसे उनकी बातों पर भरोसा है, लेकिन यदि जनता यह सोचती है कि लोकपाल के पद पर बैठ जाने मात्र से ही कोई व्यक्ति ऐसा देवतुल्य हो जाएगा कि वह कभी कोई गलती नहीं करेगा, तो वह कहीं न कहीं गलती कर रही है। इस पर ठंडे दिमाग से विचार करने की जरूरत है। व्यावहारिक धरातल पर हर संभावना का आकलन करने की आवश्यकता है, ताकि दोषों को कम किया जा सके।